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पश्चिम एशिया जंग: जंगबंदी और नई एटमी फिक्र

कथित 45 दिनों की फौरी जंगबंदी से कोई हल निकल भी जाए तब भी ईरान पर अमेरिकी-इज्राएली हमले ने दुनिया को एटमी हथियारों के कवच पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया
कब तकः 7 अप्रैल को तेहरान के शरीफ विश्वविद्यालय में अमेरिकी-इज्राएली हमला

इसकी उम्मीदें अभी कमजोर लग रही हैं कि युद्ध रुके क्योंकि दोनों पक्ष अपने मुद्दों पर अड़े हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्‍प होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने पर अड़े हैं, तो ईरान उस पर अधिकार न छोड़ने के साथ कभी हमला न करने की पक्‍की गारंटी चाहता है। दोनों के लिए ही ये शर्तें बहुत कठिन हैं। पाकिस्‍तान, मिस्र और तुक्रिए की ओर से फिलहाल 45 दिनों की जंगबंदी और बाद में व्‍यापक समझौते की पहल क्‍या आगे बढ़ेगी। सऊदी अरब में भारत के पूर्व राजदूत और पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ तलमीज अहमद कहते हैं, “ईरान के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य ही इकलौता ऐसा हथियार है, जिसका इस्तेमाल वह दुनिया की सबसे ताकतवर और तकनीकी रूप से सबसे उन्नत अमेरिकी सेना के खिलाफ युद्ध में सौदेबाजी के लिए कर सकता है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डालने का एक अचूक हथियार भी है।” इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि जंगबंदी होगी या जंग तेज होगी। अहमद बताते हैं, “ट्रम्‍प युद्ध से बाहर निकलने का कोई रास्ता ढूंढ़ रहे हैं, लेकिन वह रास्ता उनकी अपनी शर्तों पर होना चाहिए, जिसमें वे विजेता नजर आएं।” अब ऐसा लगता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना ट्रम्‍प की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है। ईरान भी इस जलमार्ग को खोलने के मामले में आसानी से हार मानने के मूड में नहीं है, क्योंकि वह जानता है कि इस समय तेहरान के पास यही एकमात्र प्रभावी तुरुप का पत्ता है।

अंकारा स्थित यिल्दिरिम बेयाजित विश्वविद्यालय के उमैर अनस कहते हैं, “ईरान का लक्ष्य युद्ध का सार्थक नतीजा निकालना है। उसके दो मुख्य मकसद हैं: पहला, इज्राएल और अमेरिका हमेशा के लिए जंग न करने की गारंटी देने को मजबूर हों; और दूसरा, इस क्षेत्र में अपने सुरक्षा संबंधों को नए सिरे से स्थापित करना। ईरानी पक्ष किसी भी तरह के अस्थायी युद्धविराम के सख्‍त खिलाफ है।”

क्या पाकिस्तान और दूसरे मध्यस्थ अमेरिका या ईरान, किसी एक को मनाने में कामयाब हो पाएंगे? उस इलाके से बखूबी वाकिफ दिल्ली में रहने वाले सीरियाई विश्लेषक वाएल अव्वाद कहते हैं, ‘‘अभी तो जंगबंदी की उम्‍मीद काफी कमजोर लग रही है। यह कहना मुश्किल है कि ताजा प्रस्ताव काम करेगा या नहीं। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी कड़ी मांगें रखी हैं और ट्रम्‍प सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलना चाहते हैं। लेकिन ईरान की दिलचस्‍पी टुकड़ों में होने वाले समझौते में नहीं है, वह मुकम्‍मल हल चाहता है। तेहरान तब तक किसी बात पर राजी नहीं होगा, जब तक ट्रम्‍प की तरफ से यह गारंटी न मिल जाए कि इज्राएल या अमेरिका की तरफ से अब कभी हमला नहीं होगा।’’

इज्राएल इन घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रख रहा है और ईरान को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए बड़े हमले जारी रखे हुए है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि यह युद्ध चलता रहे और ईरान को इतना ज्यादा नुकसान पहुंचे कि वह भविष्य में फिर कभी कोई खतरा न बन सके।

एटमी विकल्‍पर नई सोच

उधर, दुनिया भर की राजधानियों में एक नई सोच आकार लेती दिख रही। सवाल पूछा जाने लगा है कि अगर ईरान के पास एटमी हथियार होते तो क्‍या इज्राएल-अमेरिका उस पर हमले की सोचते और अगर परमाणु प्रतिरोधक क्षमता ही हमलों से बचने का एकमात्र जरिया है, तो क्‍यों न जरूरत पड़ने से पहले ही उसे हासिल कर लिया जाए?

तय है कि अगर ईरान ने एटमी हद लांघ ली होती, तो अमेरिका और इज्राएल हमले करने का जोखिम नहीं उठाते। इसके बजाय, तेहरान का एटमी संयम अब पीछे मुड़कर देखने पर रणनीतिक कमजोरी लग सकता है, जो 2003 में दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के फतवे पर आधारित है कि मजहब बेगुनाहों की जान लेने वाले हथियारों की इजाजत नहीं देता। दिवंगत नेता चाहते थे कि ईरान के पास परमाणु जानकारी हो, जिसका इस्तेमाल वैज्ञानिकों ने फतवे का उल्लंघन किए बिना अपनी परमाणु हथियार तकनीक को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रभावी ढंग से किया। तो, क्‍या खामेनेई की मौत के बाद ईरान एटमी हथियारों की ओर बढ़ सकता है?

इस बीच उत्तर कोरिया के रणनीतिक कदम को अब समझदारी भरा माना जा रहा है, जिसने परमाणु हथियारों के जखीरे का इस्तेमाल बाहरी हमलों से बचने के लिए ढाल के तौर पर किया है। उत्तर कोरिया ने अमेरिका के साथ दशकों तक चले टकराव के बावजूद खुद को बचाए रखा है। उसने एक छोटा लेकिन असरदार परमाणु जखीरा तैयार किया है, जिसने किम जोंग उन के परिवार के शासन को आज तक कायम रखा है।

दूसरी ओर, लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी ने एटमी महत्वाकांक्षाओं से परहेज किया था, तो पश्चिमी देशों ने उन पर हमला कर उन्हें मार डाला। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और यूक्रेन आजाद हुआ, तो उसने अपने परमाणु हथियार रूस को सौंप दिए। 2022 में पुतिन ने यूक्रेन पर हमला कर दिया।

परमाणु हथियारों को सीमित करने की इस पहल के केंद्र में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) है, जो परमाणु हथियारों के प्रसार पर रोक लगाती है और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल में सहयोग को बढ़ावा देती है। एनपीटी की निगरानी वियना स्थित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) करती है। इसके अलावा व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) और साथ ही परमाणु-हथियार मुक्त क्षेत्र जैसे उपायों ने अब तक परमाणु प्रसार को कम करने में मदद की है।

अभी सिर्फ नौ देशों के पास परमाणु हथियार हैं। इनमें रूस, अमेरिका, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं। उनके अलावा भारत, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया और इज्राएल के पास भी परमाणु हथियार हैं। दूसरों के उलट, इज्राएल सार्वजनिक तौर पर नहीं मानता कि उसके पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन यह खुला राज है, जिस पर पश्चिमी देश कभी चर्चा नहीं करते।

भारत का पहला परमाणु परीक्षण 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुआ था। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद, भारत ने परीक्षणों की एक और शृंखला की। भारत के परीक्षणों के फौरन बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए। एक समय उत्तरी कोरिया के गुप्त परमाणु कार्यक्रम में पाकिस्तान और चीन ने मदद की थी। बाद में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते किए।

दक्षिण कोरिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अमेरिका की परमाणु सुरक्षा छतरी का संरक्षण प्राप्त है। कुछ नाटो देशों को भी अमेरिका से सुरक्षा मिली हुई है। लेकिन ट्रम्प के कार्यकाल में, जब अमेरिका और नाटो के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं, तो कई नाटो देशों ने यह सवाल उठाया कि क्या मदद के लिए अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है? यही कारण है कि जर्मनी में फ्रांस के साथ एक परमाणु समझौता करने की चर्चा चल रही है।

अब बसः 6 अप्रैल को इज्राएल के हाइफा में आवासी इमारत में ईरानी हमले के बाद तबाही

अब बसः 6 अप्रैल को इज्राएल के हाइफा में आवासी इमारत में ईरानी हमले के बाद तबाही

दक्षिण कोरिया उत्तरी कोरिया के परमाणु हथियारों के साये में जीता है। वहां भी कई लोगों का मानना है कि अब सियोल के लिए अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपना खुद का परमाणु हथियार तैयार करने का समय आ गया है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क भी फ्रांस के साथ एक परमाणु सुरक्षा कवच बनाने पर विचार कर रहे हैं। पोलैंड को चिंता है कि रूस किसी दिन पोलैंड की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है। पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा ने पहले अमेरिका से देश में परमाणु हथियार तैनात करने का आग्रह किया था।

जापान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिस पर हिरोशिमा और नागासाकी में दो परमाणु बम गिराए गए थे, और जिसने दशकों तक इसके खौफ और विनाशकारी प्रभावों को झेला है। यह देश कभी भी परमाणु बम न बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन आज, यह अपने परमाणु अप्रसार सिद्धांतों में संशोधन पर बहस कर रहा है और ऐसे मुद्दे पर भी विचार कर रहा है, जो यहां के अधिकांश लोगों को बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। प्रधानमंत्री ताकाइची सनाए चीन से जापान की रक्षा के लिए परमाणु हथियारों की संभावना पर विचार कर रही हैं। जापान खुद परमाणु हथियार हासिल करने की योजना नहीं बना रहा है, बल्कि इस बात पर विचार कर रहा है कि अमेरिका अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को उसकी धरती पर तैनात करे। सऊदी अरब का परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान के साथ एक रक्षा समझौता है।

कई अन्य देश भी ईरान से सबक ले रहे हैं और परमाणु विकल्प पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह खतरनाक पुनर्विचार उन दशकों पुराने परमाणु अप्रसार मानदंडों को कमजोर कर सकता है, जिन्होंने दुनिया को परमाणु हथियारों से काफी हद तक सुरक्षित रखा है।

 

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