पश्चिम एशिया फिर एक निर्णायक ऐतिहासिक क्षण से गुजर रहा है। यह केवल सीमाओं पर हो रही सैन्य हलचल का प्रश्न नहीं है। यह उस विश्व व्यवस्था की परीक्षा है, जिसने दशकों तक इस क्षेत्र को नियंत्रित अस्थिरता के दायरे में बनाए रखा। ड्रोन और मिसाइलें अचानक प्रकट नहीं होतीं; वे कूटनीतिक विफलताओं, आर्थिक प्रतिबंधों और सामरिक अति-आत्मविश्वास की उपज होती हैं। पहला हमला किसने किया, यह अब इतिहास का फुटनोट भर है। मूल प्रश्न यह है कि किसने इस भूभाग को स्थायी प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा का अखाड़ा बनने दिया।
डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति ने इसी अस्थिर संतुलन को निर्णायक ढंग से प्रभावित किया। ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका की वापसी को केवल नीति-संशोधन कह देना अपर्याप्त होगा। वह उस बहुपक्षीय ढांचे का परित्याग था जिसने अविश्वास के बावजूद संवाद की न्यूनतम संरचना उपलब्ध कराई थी। प्रतिबंधों को रणनीति का मुख्य औजार बना देने से कूटनीति का स्थान सिकुड़ गया। जब आर्थिक घेराबंदी सामान्यीकृत हो जाती है, तब सैन्य विकल्प वैध प्रतीत होने लगते हैं। परिणाम यह हुआ कि पश्चिम एशिया में प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों की एक श्रृंखला विकसित हुई, जिसमें हर पक्ष स्वयं को रक्षात्मक और प्रतिद्वंद्वी को आक्रामक बताता है।
ईरान: प्रतिरोध की संस्थागत राजनीति
ईरान को पश्चिमी विमर्श में अक्सर अस्थिरता का स्रोत बताया जाता है। पर 1979 की क्रांति के बाद उसकी राजनीतिक संरचना ने जिस प्रकार वैचारिक ऊर्जा को संस्थागत रूप दिया, वह ध्यान देने योग्य है। वहां सत्ता का केंद्रीकरण अवश्य है, पर निर्णय-प्रक्रिया तात्कालिक भावनाओं से नहीं, दीर्घकालिक रणनीति से संचालित होती है।
ईरान जानता है कि पारंपरिक युद्ध में वह अमेरिका या इजरायल के समकक्ष नहीं ठहर सकता। इसलिए उसने प्रभाव-क्षेत्र का निर्माण किया। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में उसकी उपस्थिति विस्तारवाद से अधिक सुरक्षा-परिधि का निर्माण है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद उसका राज्य ढहा नहीं। यह तथ्य संकेत देता है कि बाहरी दबाव से सत्ता परिवर्तन की परिकल्पना राजनीतिक रूप से सरल, पर व्यावहारिक रूप से जटिल है।
इजरायल: सुरक्षा और स्थायी आपातकाल
इजरायल की सामरिक संस्कृति उसके ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित है। अस्तित्व की चिंता उसकी नीति का मूल तत्व है। पर जब आक्रामक प्रतिरक्षा स्थायी सिद्धांत बन जाती है, तब वह क्षेत्रीय संतुलन को और अस्थिर करती है। गाज़ा, लेबनान और अब ईरान तक फैला तनाव एक व्यापक सुरक्षा-दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसमें खतरे को सीमा के बाहर ही निष्प्रभावी करने का आग्रह है।
अमेरिका और इजरायल का गठबंधन नया नहीं, पर हाल के वर्षों में उसका स्वर अधिक स्पष्ट और निर्भीक हुआ है। इससे खाड़ी देशों के भीतर भी दुविधा पैदा हुई है। कुछ देश सार्वजनिक रूप से संयम की अपील करते हैं, पर रणनीतिक रूप से दूरी बनाए रखते हैं। यह दोहरा व्यवहार क्षेत्रीय राजनीति की जटिलता को दर्शाता है।
अमेरिका के भीतर की बहस
संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर भी यह प्रश्न गूंज रहा है कि क्या निरंतर सैन्य हस्तक्षेप उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है या क्षीण। न्यूयॉर्क जैसे बहुसांस्कृतिक शहरों में पश्चिम एशिया का प्रश्न केवल विदेश नीति नहीं, घरेलू राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
ज़ोहरान ममदानी जैसे जनप्रतिनिधि फिलिस्तीन के समर्थन में मुखर रहे हैं। यह अमेरिकी लोकतंत्र की विशेषता है कि वहां राज्य की नीतियों और समाज की संवेदनाओं के बीच दूरी संभव है। ट्रम्पीय शैली जहां निर्णायक सैन्य प्रतिक्रिया को प्राथमिकता देती है, वहीं अमेरिकी समाज का एक वर्ग कूटनीतिक पुनर्संतुलन की मांग करता है। यही अंतर्विरोध अमेरिकी शक्ति की सीमा भी है।
तुर्किये और प्रतीक्षा की राजनीति
तुर्किये लंबे समय से क्षेत्रीय नेतृत्व की आकांक्षा रखता है। ओटोमन अतीत और राजनीतिक इस्लाम की वैचारिकी ने उसे कई अवसरों पर मुखर बनाया। किंतु वर्तमान संकट में उसकी संयमित मुद्रा संकेत देती है कि वह परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा है। रूस, नाटो और मध्य एशिया के समीकरणों के बीच तुर्किये किसी जल्दबाजी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। यह चुप्पी रणनीतिक है।
होर्मुज: भू-राजनीति का नाड़ी-बिंदु
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था की धमनियों में से एक है। विश्व के ऊर्जा-प्रवाह का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां अवरोध उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक महसूस होगा। दक्षिण एशिया के वैचारिक रूप से उग्र संगठनों के लिए यह समझना आवश्यक है कि समुद्री सुरक्षा धार्मिक भावनाओं से संचालित नहीं होती।
जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के लिए भू-राजनीतिक यथार्थ का यह पाठ कठिन हो सकता है, पर अपरिहार्य है। युद्ध की लपटें सबसे पहले उन समाजों को झुलसाती हैं जो आर्थिक रूप से निर्भर हैं।
भारत: संतुलन या रणनीतिक अस्पष्टता
भारत की स्थिति विशिष्ट है। उसके संबंध ईरान से भी हैं, इजरायल से भी और खाड़ी देशों से भी। ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की उपस्थिति और रक्षा सहयोग उसे संतुलन साधने के लिए विवश करते हैं।
पर संतुलन और नैतिक स्थिति दो भिन्न बातें हैं। भारत प्रायः पहला विकल्प चुनता है। वह सार्वजनिक रूप से किसी पक्ष में खड़ा नहीं दिखना चाहता, पर अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करता है। भारतीय आंतरिक राजनीति इस संतुलन को और जटिल बनाती है। एक ओर फिलिस्तीन के समर्थन में भावनात्मक स्वर हैं, दूसरी ओर इजरायल के साथ रक्षा साझेदारी पर गर्व। अंग्रेजी भाषी मध्यवर्ग अमेरिकी लोकतंत्र की सराहना भी करता है और उसकी विदेश नीति की आलोचना भी। यह विरोधाभास भारतीय लोकतंत्र की बहुलता का द्योतक है।
क्या यह सभ्यताओं का संघर्ष है
इस संघर्ष को सभ्यताओं की टकराहट कहना बौद्धिक सरलता होगी। यह संसाधनों, समुद्री मार्गों, तकनीकी श्रेष्ठता और वैचारिक वर्चस्व का संघर्ष है। धर्म इसकी भाषा हो सकता है, पर निर्णायक शक्ति भू-राजनीति है।
पश्चिम एशिया में लोकतंत्र की मांग सीमित हो सकती है, पर स्थिरता की आकांक्षा सार्वभौमिक है। युद्ध किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय से समाप्त नहीं होते; वे नए संतुलन की रचना करते हैं। प्रश्न यह है कि उस संतुलन का वास्तुकार कौन होगा।
ट्रम्प की आक्रामक शैली ने यह स्पष्ट किया कि महाशक्ति होना पर्याप्त नहीं, विवेकपूर्ण नेतृत्व आवश्यक है। ईरान की रणनीतिक धैर्यता और इजरायल की सुरक्षा-चिंता के बीच का तनाव दीर्घकालिक है। अमेरिका के भीतर बहस जारी रहेगी, पर मैदान पश्चिम एशिया ही रहेगा।
भारत के लिए यह समय प्रतिक्रियात्मक भावनाओं का नहीं, परिपक्व कूटनीति का है। यदि वह संतुलन साधने में सफल होता है, तो उभरती विश्व व्यवस्था में उसकी भूमिका सुदृढ़ होगी। यदि वह किसी एक ध्रुव की छाया में सीमित हो जाता है, तो उसके विकल्प सिकुड़ जाएंगे।
पश्चिम एशिया की यह आग केवल सीमाओं तक सीमित नहीं। यह विश्व राजनीति की दिशा तय करने वाली लौ है। भारत को तय करना है कि वह इस रोशनी में अपना मार्ग निर्मित करेगा या उसकी तपिश से बचने की कोशिश में स्वयं को परिधि पर खड़ा पाएगा।
(प्रशान्त कुमार मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय विषयों के जानकार हैं।)