editorial outlook hindi 13 aug 2018 : Outlook Hindi
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हिसाब देने की घड़ी

AUG 10 , 2018

"प्रधानमंत्री को इस बार लाल किले की प्राचीर से अपनी तमाम उपलब्धियों, नीतियों, कार्यक्रमों और न्यू इंडिया व बदलते भारत की प्रगति का हिसाब भी देना चाहिए। इससे लोगों को भरोसा रहेगा कि नेतृत्व अपने वादों पर कितना गंभीर है"

इस साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से अपने पांच साल के कार्यकाल का अंतिम भाषण देने वाले हैं। 2014 के पहले संबोधन से लेकर 2017 तक के अपने चार स्वतंत्रता दिवस संबोधनों में उन्होंने हर बार नई योजनाओं और नए कार्यक्रमों की घोषणा की। इन संबोधनों में वे एक मजबूत और विकसित होते राष्ट्र की तस्वीर के साथ सामाजिक और सांप्रदायिक ताने-बाने की बेहतरी की बातें करते रहे हैं। उन्होंने किसानों, ग्रामीण भारत, महिलाओं, बच्चियों के बेहतर जीवन से लेकर लोगों को रोजगार मुहैया कराने, स्वच्छ भारत अभियान, आदर्श ग्राम योजना, जनधन योजना और हर आदमी के सिर पर छत जैसे कई अहम कार्यक्रमों की घोषणा की। उन्होंने बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर ‘मेक इन इंडिया’, ‘जीरो इफेक्ट-जीरो डिफेक्ट’ और ‘स्टार्टअप इंडिया-स्टैंडअप इंडिया’ की बात की। ये बातें देश की युवा आबादी को डेमोग्राफिक डिविडेंड में तब्दील करने के मौके के रूप में देखी गईं। पिछले साल तक उनके भाषणों में यह सब होना जरूरी था क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि ऐसे कौन-से कार्यक्रम और नीतियां हैं जिन पर सरकार ज्यादा मजबूती से अमल करने वाली है।

लेकिन अब सरकार का पांचवां और अंतिम साल है और इस सरकार में प्रधानमंत्री के रूप में उनका यह अंतिम संबोधन है। 2019 के स्वतंत्रता दिवस के पहले देश आम चुनाव के जरिए नई सरकार को चुनेगा। देश का मतदाता मोदी सरकार के कामकाज का आकलन करेगा, जो राजनैतिक और चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाएगा। ऐसे में प्रधानमंत्री फिर इस साल संबोधन के जरिए लोगों को प्रभावित करने की पूरी कोशिश करेंगे जिसके चलते कुछ लोकलुभावन और चुनावों में फायदेमंद साबित होने वाली घोषणाओं के कयास लगाये जा सकते हैं। लाल किले के भाषण में क्या होना चाहिए, उसके लिए उन्होंने लोगों से सुझाव भी मांगे हैं। देश के लोग उनको अपने सुझाव भी जरूर भेजेंगे और उनमें से कुछ के शामिल किए जाने की संभावना भी है क्योंकि लोगों से संवाद करना उनकी भाषण शैली का हिस्सा है।

लेकिन इस सबके बीच देश को कुछ हिसाब भी चाहिए। यह हिसाब है उनके कार्यकाल में किए गए वादों और घोषणाओं पर अमल का। बेहतर होगा कि प्रधानमंत्री बताएं कि देश में किसानों की हालत सुधारने के लिए कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय का नया नाम रखने के साथ जो तमाम कार्यक्रम लागू किए गए, उनका क्या नतीजा निकला। इनमें सबसे ताजा है किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम देने का फैसला। लेकिन, इसके बावजूद देश में किसानों की आत्महत्याएं कम नहीं हो रही हैं और किसान सड़कों पर उतर रहे हैं। यह भी बताना चाहिए कि स्टार्टअप और मुद्रा योजना के बावजूद रोजगार के लक्ष्य पूरे क्यों नहीं हो रहे? क्यों कुछ सौ नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आ रहे हैं? देश में रोजगार के अवसरों के आंकड़ों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं और सरकार के पास कोई पुख्ता आंकड़े नहीं हैं। मेक इन इंडिया जितना जोरशोर से लागू किया गया था उसका असर मैन्यूफैक्चरिंग की विकास दर में नहीं दिख रहा है और देश बड़े पैमाने पर निर्यात के बजाय आयात कर रहा है। विकास दर सात फीसदी तक पहुंचने के लिए हांफ रही है तो रोजगार के अवसर कैसे पैदा होंगे, क्योंकि रोजगार के सबसे ज्यादा मौके निर्यात और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र से ही आते हैं? साथ ही जिस तरह से महंगाई दर चढ़ रही है, ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रुख शुरू हो गया है, वह अर्थव्यवस्था के लिए बहुत सकारात्मक संकेत नहीं है।

प्रधानमंत्री ने कई बार कहा है कि ‘न्यू इंडिया’ में हिंसा का कोई स्थान नहीं है लेकिन अफवाहों और दूसरे मुद्दों की आड़ में भीड़ हत्या पर उतारू है। महिला सुरक्षा और उनके सम्मान की लगातार बातें होने के बावजूद मुजफ्फरपुर से देवरिया तक बच्चियों के यौन शोषण और यौन हिंसा के कांड सामने आ रहे हैं, वह किसी न्यू इंडिया की उजली तस्वीर पेश नहीं करते हैं? उसी के चलते हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बहुत तीखी टिप्पणी करनी पड़ी। मोदी लगातार टीम इंडिया की बात करते हैं जिसमें देश के 125 करोड़ लोग देश की बेहतरी के लिए काम करते हैं। लेकिन क्या सभी जगह वाकई टीम भावना दिख रही है? यह इस पर भी विचार करने का मौका है।

यह फेहरिस्त काफी लंबी है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए भाषणों की अवधि भी काफी लंबी होती रही है। इसलिए इस बार उन्हें अपनी तमाम उपलब्धियों, शुरू की गई नीतियों, कार्यक्रमों और न्यू इंडिया व बदलते भारत की प्रगति की समीक्षा भी करनी चाहिए। इससे लोगों को इस बात का भरोसा रहेगा कि जो नेतृत्व लोगों के बीच उम्मीदें जगाता है, वह उन उम्मीदों को पूरा करने में कहां खड़ा है, उसकी समीक्षा भी करता है। इससे लोगों में उन फैसलों और घोषणाओं के लिए ज्यादा भरोसा पैदा होगा, जिनके बारे में वह इस साल अपने संबोधन में बात करेंगे। 


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