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क्या सपने देखना छोड़ दे किसान?

खेती में नया करने का उत्साह ही ग्रामीण खुशहाली के रास्ते खोलेगा, बशर्ते सरकारें और निजी क्षेत्र अपनी...
क्या सपने देखना छोड़ दे किसान?

खेती में नया करने का उत्साह ही ग्रामीण खुशहाली के रास्ते खोलेगा, बशर्ते सरकारें और निजी क्षेत्र अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं।

आजादी के बाद का वह दौर भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं था जब देश का पेट भरने के लिए हमें विदेश से अनाज मंगाना पड़ता था। लेकिन साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति ने हमें कुछ ही वर्षों के भीतर न सिर्फ खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि हम अनाज के बड़े निर्यातक बन गए। किसानों ने अपनी मेहनत से अनाज उत्पादन में बढ़ोतरी के नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए। लेकिन किसान की मुश्किलें कम नहीं हुईं। खेती-किसानी के सामने नए-नए संकट पैदा होते गए।

तो, क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि हमारे किसानों और ग्रामीण आबादी को सपने देखना छोड़ देना चाहिए और निराशा के अंधेरे में चला जाना चाहिए? मेरा मानना है, नहीं! उन्हें सपने देखने चाहिए और बेहतर आर्थिक स्थिति को हासिल करने के लिए और अधिक प्रयास करने चाहिए। इसी हौसले के बूते तो देश के किसानों ने खाद्यान्न पैदावार के स्तर को पांच गुना से ज्यादा बढ़ाकर 27 करोड़ टन तक पहुंचाया है। दूध उत्पादन में हमने जो वृद्धि दर हासिल की है वह अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के बाकी देशों से अधिक है। फल और सब्जियों की पैदावार में देश के कई हिस्सों में क्रांति हो रही है। यह सब उसी जिजीविषा और उम्मीद से संभव हो रहा है, जो सपने देखने की लालसा से ही संभव है। लेकिन यह भी सच है कि हम कृषि विकास दर को देश की आठ और दस फीसदी तक पहुंची विकास दर के बराबर कुछ चुनिंदा वर्षों में ही ला पाए। आज तो यह मात्र दो फीसदी के आसपास ही है। ऐसे में हमारा किसान कैसे संपन्न हो सकता है?

कृषि क्षेत्र के सामने खड़े इन सवालों के जवाब और उम्मीद की कोई किरण खोजने के लिए हमने आउटलुक एग्रीकल्चर कॉनक्लेव एंड इनोवेशन अवार्ड्स के आयोजन की शुरुआत की। कोशिश थी कि देश के नीति-नियामक, कृषि वैज्ञानिक, अर्थशास्‍त्री, सहकारी और कॉरपोरेट जगत के जाने-माने विशेषज्ञ किसान प्रतिनि‌धियों के साथ बैठकर खेती को मुनाफे का सौदा बनाने की संभावनाओं पर विचार करें। नई सोच और नवाचार (इनोवेशन) किसानों की आमदनी बढ़ाने में कैसे मददगार साबित हो रहे हैं, इसको समझें।

एक वाजिब शिकायत लंबे समय से बनी हुई है कि मुख्यधारा का मीडिया देश की दो तिहाई से ज्यादा आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्र और किसानों की सुध नहीं लेता। इस कमी को सिर्फ एक आयोजन से पूरा करना संभव नहीं है। इसलिए हमने खेती-किसानी, गांव-देहात से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित अलग से एक पोर्टल की शुरुआत भी की है। outlookagri.com इसका नाम है। हमारी कोशिश है कि आउटलुक पत्रिका के साथ-साथ अपनी तरह के इस अनूठे पोर्टल के जरिए हम न सिर्फ खेती-किसानी की सुध लें बल्कि किसानों के लिए उपयोगी खबरें और जानकारियां भी उन तक पहुंचाएं।

आज देश के नीतिनिर्धारकों के सामने बड़ी चुनौती है कि किस तरह से खेती को मुनाफे का कारोबार बनाया जाए। शहरों में पहले ही रोजगार के अवसर सीमित होते जा रहे हैं। इसलिए बेहतर होगा कि मिश्रित खेती और कृषि उत्पादों के मूल्यवर्धन को बढ़ावा देकर ग्रामीण या अर्धशहरी क्षेत्रों में ही लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाएं।

तमाम चुनौतियों के बावजूद कई किसान अपनी समझ और सूझबूझ से खेती को फायदे का सौदा बनाने की नजीर पेश कर रहे हैं। चाहे छत पर सब्जियां उगाती छत्तीसगढ़ की किसान पुष्पा साहू हों या विदेशी सब्जियां उगाकर पांच सितारा होटलों तक पहुंचाते हिमाचल के किसान तेजराम। दिल्ली में पले-बढ़े युवा करण सिकरी हों या आंध्र के कट्टा रामाकृष्‍णा। नवाचार और नए तौर-तरीकों के जरिए खेती को मुनाफे की राह पर ले जाने वाले किसानों में भी ये कुछ चुनिंदा नाम हैं। अच्छी बात यह है कि ऐसे किसानों की तादाद भी लगातार बढ़ रही है। पहली बार दिए गए आउटलुक इनोवेशन अवार्ड्स के लिए हमें सैकड़ों की तादाद में आवेदन मिले। खेती में कुछ नया करने को लेकर किसानों का यह उत्साह उम्मीद जगाता है। यही उत्साह और उम्मीद ग्रामीण भारत की खुशहाली के रास्ते खोल सकती है, बशर्ते सरकारें और निजी क्षेत्र भी किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएं।

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