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इसकी टोपी उसके सिर

JUN 28 , 2018

केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यन की विदाई हो गई है और अगले कुछ दिनों में वे अमेरिका लौट जाएंगे। लेकिन उनका ट्विन (दोहरी) बैलेंसशीट का फार्मूला सरकार को परेशान कर रहा है, जिसकी ओर उनके पूर्ववर्ती और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इशारा किया था। असल में यह फार्मूला बैंकों और बैंकों की कर्जदार कंपनियों की खराब बैलेंसशीट को लेकर था क्योंकि एक की बैलेंसशीट दूसरे की खराब बैलेंसशीट का जिम्मेदार बनी हुई थी। यानी कंपनी की खराब वित्तीय हालत बैंक के घाटे की वजह बनी हुई थी। इसलिए यह एक चेलैंज बन गया। पहले रघुराम राजन ने बैंकों के लिए नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) के मानक बदल दिये, जिसके चलते बैंकों के डूबत कर्ज की असलियत सामने आ गई। नतीजाः जो बैंक मुनाफा दिखा रहे थे, अचानक बड़े घाटे दिखाने को मजबूर हो गये क्योंकि एनपीए के लिए अधिक प्रोविजनिंग करनी पड़ी जिसके चलते उनकी कर्ज देने की क्षमता घट गई। अब यह कहानी ज्ञान संगमों के साथ ही बड़ी होती गई और बैंकों के बड़े कर्जदारों की कतार लग गई। इसमें घाटे में सरकारी बैंक ही रहे और उनके डिपॉजिटर भी तब घबराने लगे जब पंजाब नेशनल बैंक में नीरव मोदी जैसा घोटाला सामने आया। कुछ बड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई और अब बैंकों के बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारियां सुर्खियों में हैं।

लेकिन असल मुद्दा वहीं अटका हुआ है। इस संकट का हल क्या है? पहले तो सरकार संकट को स्वीकार करने को ही तैयार नहीं थी। बिगड़ते हालात और राजनीतिक आलोचनाओं के बीच इनसोल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) लाया गया। इसके तहत कर्ज के मामलों को निपटाने की समयबद्ध प्रक्रिया शुरू हुई। एनसीएलटी में मामला जाने के बाद इसका निपटारा तेजी से होने की संभावना बनी और पहले मामले में कंपनी के मालिक बदल गये हैं क्योंकि उसे सबसे अधिक बोली लगाने वाली कंपनी को कानूनी रूप से सौंपने की प्रक्रिया पूरी हो गई। यानी यह प्रक्रिया कारगर साबित हो रही है। यही वजह है कि ताजा बयान में विजय माल्या ने कहा है कि वह बैंकों का पैसा लौटाने के लिए कानूनी देखरेख में अपनी संपत्ति बेचकर इस मुद्दे को हल करना चाहता है। उसका यह भी कहना है कि उसे बैंक डिफॉल्टर का पोस्टर ब्वाय बना दिया गया, जो ठीक नहीं है। इससे साबित होता है कि आइबीसी अब कारगर रास्ता है। फिर भी सरकारी बैंकों के संकट को हल करने का कोई साफ रास्ता नहीं दिखता है। अब चर्चा हो रही है कि एक बैड बैंक बनाया जाए, जिसमें बैंकों के एनपीए वाले एसेट डाल दिये जाएं और बाकी बैंकों की बैलेंसशीट साफ-सुथरी कर दी जाए। लेकिन, जो बैंक चलने की स्थिति में ही नहीं हैं, उनका क्या होगा? इसमें आइडीबीआइ बैंक को सबसे ऊपर रखा जा रहा है क्योंकि उसका एनपीए 25 फीसदी को पार कर जाने की आशंका है। एक ताजा रिपोर्ट में सरकारी बैंकों का एनपीए इस साल 12 फीसदी से ज्यादा रहने की बात कही गई है। आइडीबीआइ का हल खोजने के लिए सरकार को भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) ऐसी कामधेनु लग रहा है जिसे कभी भी दुहा जा सकता है। वैसे तमाम सरकारें जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग करती रही हैं। कई बार बड़ी सरकारी कंपनियों के विनिवेश के मामले फंसने पर रातोरात एलआइसी को निर्देश देकर विनिवेश के लक्ष्य पूरे किये गये। इस बार एलएआइसी को आइडीबीआइ जैसे बैंक का 40 फीसदी हिस्सा खरीदने को कहा जा रहा है। इसकी पुष्टि अभी नहीं की जा सकती, लेकिन चर्चा जोरों पर है।

अब सवाल है कि देश के करोड़ों पॉलिसीधारक एलआइसी में जीवन की सुरक्षा के कवच के साथ ही इस बात के लिए निवेश करते हैं कि उनके निवेश पर बेहतर रिटर्न मिले। एक तो वैसे ही जीवन बीमा पॉलिसी में किये गये निवेश पर रिटर्न बहुत कम होता है। लेकिन अगर किसी संस्थान को सरकार अपनी जरूरत के मुताबिक लगातार इस्तेमाल करेगी तो व्यावसायिक दक्षता से लिये जाने वाले उसके फैसलों पर असर पड़ेगा। सरकार का यह हक नहीं बनता है कि करोड़ों लोगों के निवेश को वह अपनी सुविधा के मुताबिक लिये जाने वाले फैसलों से प्रभावित करे। दिलचस्प बात यह भी है कि इस बीच देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के चेयरमैन का एक बयान भी आया है जिसमें उन्होंने कहा कि हम अभी किसी नये बैंक के विलय की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि, उनकी यह भी सफाई है कि बैंकों के विलय के विचार के वे विरोध में नहीं हैं। असल में हाल ही में एसबीआइ में उसके सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का विलय हुआ है। इससे बैंक पर कुछ दबाव भी आया है।

अब सवाल उठता है कि सरकार को चार साल से ज्यादा समय बीत चुका है और बैंकिंग, खासतौर से सरकारी बैंकों की स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। एनपीए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं। ऐसे में इसकी टोपी उसके सिर वाला फार्मूला संकट का हल नहीं है। कुछ नया सोचिये।


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