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न्यू इंडिया के लिए भारत का बजट

FEB 01 , 2018

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साल 2018-19 का बजट पेश कर दिया है। प्रावधानों के मुताबिक हिंदी और अंग्रेजी में पढ़े गये इस बजट भाषण में सबसे अधिक समय गांव, गरीब और किसान को दिया गया है। जिससे साफ है कि यह बजट भारत के लिए बजट के रूप में पेश करने की रणनीति के तहत तैयार किया गया है। खास बात यह है कि  मौजूदा एनडीए सरकार का अंतिम पूर्ण बजट होने के बावजूद इसमें शहरी मध्य वर्ग या कारपोरेट जगत को लुभाने की कोशिश नहीं की गयी है। प्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर 40 हजार रुपये की स्टेंडर्ड डिडक्शन देकर बाकी सभी खर्चों के लिए मिलने वाली छूट समाप्त कर और एक फीसदी उपकर बढ़ाकर करीब 11 हजार करोड़ रुपये का बोझ डालने के बाद करदाताओं को फायदे की बजाय इस बजट में घाटा ही होने वाला है। वित्त मंत्री ने किसानों से लेकर गरीबों और शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी घोषणाएं इस बजट में की हैं लेकिन उनका कोई फिस्कल रोडमैप इस बजट में नहीं दिखता है कि यह पैसा आएगा कहां से। वैसे अगर विनिवेश से उन्हें चालू साल में मिले लक्ष्य से अधिक राजस्व को छोड़ दें तो राजकोषीय संतुलन नहीं रख पाए हैं जिसके चलते चालू साल के साथ ही पहले से तय लक्ष्य से अधिक राजकोषीय घाटा रहने की बात उन्होंने खुद स्वीकार की है।

बजट में कोई बड़ा बिंग बैंग सुधार भी नहीं दिखता है। इससे एक बात जरूर साफ होती है कि सरकार बड़े सुधारों को बजट के बाहर रखने की रणनीति पर चल रही है। इसलिए बजट भाषण उम्मीद के अनुरूप ही चला। इसमें पहले अर्थव्यवस्था की सुधरती स्थिति के दावे के साथ ही बात खेती किसानी और ग्रामीण भारत की हुई। लेकिन अर्द्धसत्य के साथ। मोदी सरकार पर सबसे बड़ा किसानों को किया वादा निभाने का दबाव है और वह है किसानों को लागत का डेढ़ गुना दाम। जेटली ने कहा कि वह इस मुद्दे पर संवेदनशील हैं। लेकिन उन्होंने दावा किया कि रबी फसलों के लिए तो सरकार लागत का डेढ़ गुना दाम दे चुकी है और खरीफ के लिए भी ऐसा ही करेगी। दिलचस्प बात यह है कि जब यह काम इतना आसान था ताो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर क्यों कहा था कि वह इस वादे को पूरा नहीं कर सकती है। यहां पर ही पेंच है क्योंकि सरकार फसलों का समर्थन मूल्य सी-2 लागत पर तय करती है। उसके आधार पर अधिकांश फसलों का समर्थन मूल्य लागत के करीब है या कई मामलों में राज्यों की अलग-अलग लागत से कम है। साथ ही समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को मिले इसके लिए उम्मीद थी कि मध्य प्रदेश की भावांतर योजना के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर योजना घोषित की जाएगी लेकिन इस पर नीति आयोग को फार्मूला निकालने की बात कह कर मुद्दा टाल दिया गया है। हालांकि कृषि मार्केटिंग में सुधार के मोर्चे पर कुछ कदम उठाने की कोशिश की गयी है जिसमें ग्रामीण हाट और फारमर्स प्रोड्यूसर कंपनी को सहकारी समितियों की तर्ज पर कर छूट की बात कही गयी है। हालांकि कृषि कर्ज को एक लाख से बढ़ाकर 11 लाख करोड़ रुपये किया गया है लेकिन इस पर ब्याज को लेकर कोई राहत नहीं दी गई है। इसका दायरा मछली पालन और डेयरी क्षेत्र तक बढ़ाने का कदम अच्छा है लेकिन बटाईदार को इसका फायदा कैसे मिलेगा इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। इसी तरह सिंचाई के लिए खर्च पर चुप्पी साध रखी है। जबकि इकोनामिक सर्वे में क्लाइमेट चेंज से किसानों की आय में होने वाले नुकसान की आशंका पर बजट में कोई हल नहीं दिखा है।

किसानों के साथ ही बजट में एक बड़ा फोकस ग्रामीण क्षेत्र में ढांचागत सुविधाओं के विस्तार, सड़क, आवास, स्वच्छ भारत, फूड प्रोसेसिंग और मेगा फूड पार्क पर है। साथ ही पंचायतों की ब्राडबैंड कनेक्टिविटी सहित कई मसलों पर बड़ी घोषणाएं करते हुए करीब 14 लाख करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान की बात की गई है। ले‌किन कई तरह के व्यय और लक्ष्यों को 2020 या 2022 तक जोड़ने से स्थिति साफ नहीं हो रही है।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर बात की गई है और दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा देने की एक महत्वाकांक्षी घोषणा बजट में की गई है। लेकिन इसको लेकर दो सवाल हैं एक है कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा दूसरे यह स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र के हवाले करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा सकता है। हालांकि स्वास्थ्य, शिक्षा  और सामाजिक सुरक्षा पर केवल 15 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि देकर इसे 1.38 लाख करोड़ रुपये किया है। पेंशन और छात्रवृत्ति जैसे मुद्दों को लगभग अनछुआ छोड़ दिया गया है।

अगला बड़ा मुद्दा रहा है रोजगार सृजन का। इस पर वित्त मंत्री काफी समय लगाया लेकिन इसमें जहां कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए उठाये गये कदमों को दोहराया गया। वहीं स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, मुद्रा लोन योजना और उद्योगों की दी गई पीएफ और दूसरी वित्तीय छूट को ही आधार बनाया गया है। लेकिन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या निजी निवेश को बढ़ावा देने का कोई  बड़ा कदम इसमें नहीं दिखता है। लघु और छोटी इकाइयों के लिए कारपोरेट कर को 25 फीसदी करने के कदम को इसके लिए अहम बताया गया है। इसके तहत 250 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली कंपनियों को कर की घटी दर के दायरे में लाया गया है।

इऩफ्रास्ट्रक्चर और रेलवे पर अच्छे खासे निवेश की घोषणा बजट में है लेकिन इसका बड़ा हिस्सा बजट के बाहर से ही  आ रहा है.

राजकोषीय सेहत को ठीक रखने के लिए विनिवेश सरकार का बड़ा सहारा बना है। चालू साल में इससे मिलने वाले राजस्व के एक लाख करोड़ रुपये पार कर जाने की उम्मीद है लेकिन इसके बावजूद राजकोषीय घाटा  बजट लक्ष्य से अधिक रहेगा। अगले साल में विनिवेश से 80 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि सरकार बड़े विनिवेश के दावे कर रही है लेकिन अधिकांश पैसा सरकारी कंपनियों के आपस में अधिग्रहण से ही आया है। बाजार में चल रहे कयासों के मुताबिक जेटली ने एक लाख रुपये से अधिक के लांग टर्म कैपिटल गेन पर दस फीसदी का टैक्स लगा दिया है, जिस पर बाजार थोड़ा मायूस भी हुआ है।

करों के मामले में वित्त मंत्री ने बहुत  ज्यादा नहीं किया है। वैसे भी उत्पाद शुल्क और सेवा कर के जीएसटी में चले जाने से यहां काम कम रह गया है। लेकिन प्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर उन्हें राजस्व तो अधिक मिला है लेकिन यहां वह कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सके। व्यक्तिगत आय कर की स्लैब या दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। केवल 40 हजार रुपये के स्टेंडर्ड डिडेक्शन को लागू किया गया है। इसे 2005-06 में समाप्त किया गया थ्‍ाा। लेकिन इसके साथ ही टांसपोर्ट भत्ता और मेडिकल खर्च के जरिये मिलने वाली छूट को समाप्त कर दिया गया। इसके चलते विभिन्न आय वर्ग में आऩे वाले लोगों को 290 रुपये से 1790 रुपये तक की ही राहत ‌मिलेगी। हालांकि उपकर को तीन फीसदी से बढ़ाकर चार फीसदी करने के फैसले के जरिये उन्होंने 11 हजार करोड़ रुपये का कर बोझ डाल दिया है। कुछ मामलों में पेंशनरों और सीनियर सिटिजन को राहत दी गयी है। इसमें जमा पर ब्याज और मेडिकल खर्च शामिल हैं।

अप्रत्यक्ष करों में कस्टम में उन्होंने दरें बढ़ाकर टीवी, मोबाइल फोन समेत कई उपभोक्ता सामान महंगे कर दिये हैं। यह कदम मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के नाम पर उठाया गया है।

वित्त मंत्री के बजट भाषण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट के फायदे विस्तार से जिस तरह लोगों को समझाये उससे साफ ही कि जिस तरह उनका टारगेट गरीब-गांव और किसान है उसे ध्यान रखकर ही जेटली ने बड़ी सावधानी से बड़े-बड़े दावों और वित्तीय प्रावधानों वाला बजट पेश किया। हालांकि यह बात जरूर है कि आंकड़ों की बारीकी देखने के बाद इसमें बहुत सारे दावे जमीन पर टिकते नहीं दिखते है।


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