Home नज़रिया सामान्य जयंती स्पेशल- मिसाइल मैन ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने क्यों कहा था, 'सर, मेरे पास ना सूट है, ना जूते, सिर्फ चप्पल है'

जयंती स्पेशल- मिसाइल मैन ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने क्यों कहा था, 'सर, मेरे पास ना सूट है, ना जूते, सिर्फ चप्पल है'

सुषमा ‘शांडिल्य’ - OCT 15 , 2021
जयंती स्पेशल- मिसाइल मैन ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने क्यों कहा था, 'सर, मेरे पास ना सूट है, ना जूते, सिर्फ चप्पल है'

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सुषमा ‘शांडिल्य’

भारत के गौरव, महान प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की जीवनगाथा श्रमसाध्य परिश्रम के परिणामस्वरूप, उत्तरोत्तर सफलता के सोपान चढ़कर शिखर पर पहुंचने की अनूठी, प्रेरणास्पद कहानी है। स्वदेशी बैलेस्टिक मिसाइल प्रणालियों का विकास, लॉन्चिंग तकनीक में भारत की आत्मनिर्भरता, कलाम की अभूतपूर्व उपलब्धियां हैं जिनके लिए वो सदैव स्मरणीय रहेंगे। उन्होंने उच्च प्रौद्योगिकी के माध्यम से मिसाइल कार्यक्रम द्वारा राष्ट्रीय सशक्तिकरण के लिए बेदाग दृष्टि विकसित की। राजनेता कलाम ने भारत को विश्वपटल पर विकसित राष्ट्र के तौर पर स्थापित करके राष्ट्रनिर्माण में प्रमुख योगदान दिया, जिसके कारण विश्व ने एक सुर से उन्हें ‘‘मिसाइल मैन’’ के ख़िताब से नवाज़ा। पर कलाम युद्ध की परिकल्पना नहीं बल्कि देश के चहुंमुखी विकास और शांति के लिए प्रयासरत रहे। 

कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम के धनुषकोडी गांव में हुआ। उनका पूरा नाम ‘अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम’ था। उनके पिता जैनुलाब्दीन नाविक, माता अशिअम्मा गृहिणी थीं और वो दस बहन-भाई थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने से बचपन अभावों में बीता। पिता मछुआरों को नावें किराये पर देते थे। कलाम के गणित शिक्षक प्रत्येक वर्ष पांच बच्चों को मुफ्त पढ़ाते थे, शर्त थी कि बच्चे स्नानोपरांत आएं, आठ वर्षीय कलाम सुबह 4 बजे नहाकर पढ़ाई करने जाते, वापस आकर रेलवेस्टेशन, बस अड्डे और सड़कों पर अख़बार बेचते। बिजली ना होने से केरोसिन का दीया जलाकर पढ़ाई करते। इन संघर्षों ने लाड़ले कलाम को बचपन में ही दायित्वों का बोध कराकर आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया।

कलाम की शिक्षा पंचायत विद्यालय में हुई जहां शिक्षक सुब्रमण्यम अय्यर की शिक्षाप्रद बातों ने प्रभावित किया। अय्यर एक दिन छात्रों को समुद्र किनारे ले गए और पक्षियों की शारीरिक बनावट तथा उड़ने के बारे में बताया। उनकी समझाइश का कलाम के बालमन पर गहरा असर हुआ, उनके जीवन की दिशा, उद्देश्य, लक्ष्य निर्धारित हो गए, उन्होंने उड़ान को करियर बनाने का निश्चय किया। तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज से स्नातक किया, मद्रास प्रौद्योगिकी संस्थान में वैमानिकी अभियांत्रिकी में विशेषज्ञता हासिल की, तदुपरांत हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने हेतु ‘भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान’ में प्रवेश लिया। 

‘सादा जीवन-उच्च विचार’ के हिमायती, सादगीपसंद, अनुशासनप्रिय कलाम की दिनचर्या मुख्यतः पढ़ना-लिखना थी। उन्होंने गुरु के गुरुमंत्र, ‘जीवन में सफल होने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, आशा, इन शक्तियों को समझकर उनपर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए’ का अक्षरशः पालन किया। कलाम का शानो-शौकत या दिखावों में यकीन नहीं था, घर में टेलीविजन ना रखकर रेडियो सुनते थे। कलाम हमेशा नीली कमीज़ और स्पोर्ट्स शूज़ पहनते थे, सूट और टाई में असहज रहते। एक मार्च, 1998 को राष्ट्रपति भवन में भारतरत्न पुरस्कार समारोह में असहज कलाम, टाई को बार-बार छू रहे थे क्योंकि उससे उनका दम घुटता था। एक बार टाई से चश्मा साफ करते देख सचिव ने टोका कि ऐसा नहीं करिए तो कलाम बोले कि ‘टाई उद्देश्यहीन वस्त्र है जिसका कुछ तो इस्तेमाल कर रहा हूँ।’ राष्ट्रपति बनने पर दर्जी ने कलाम का नाप लेकर बंद गले के चार सूट सिले लेकिन कलाम ख़ुश नहीं थे। उनको सूट में घुटन होती थी इसलिए दर्जी को सलाह दी कि गर्दन के पास थोड़ा खोल दे, इस तरह वो ‘कलाम सूट’ कहलाए। कलाम को 1980 में इंदिरा जी ने मिलने बुलाया तो सतीश धवन से बोले, ‘‘सर, मेरे पास ना सूट है, ना जूते। मेरे पास चेर्पू है (तमिल में चप्पल)।’’ धवन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘कलाम, तुम पहले ही सफलता का सूट पहने हो।’’ कलाम का वाजपेयी जी से परिचय कराया गया तो उन्होंने हाथ मिलाने की बजाए उनको गले लगा लिया। 

कलाम अक्सर गीता, कुरान और प्रतिदिन नमाज़ पढ़ते थे। वो शुद्ध शाकाहारी थे, शराब छूते नहीं थे, जहां जाते वहां निर्देश रहते कि उन्हें शाकाहारी भोजन परोसा जाए। कलाम धर्मनिरपेक्ष थे जो मानवता को सब धर्मों से ऊपर मानते थे। कलाम ने राष्ट्रपति भवन के आतिथ्य विभाग को निर्देश दिया कि इफ्तार में जो ढाई लाख रुपए खर्च होते हैं, उनसे अनाथालयों के बच्चों के लिए आटा-दाल, कंबलों और स्वेटरों का प्रबंध हो और 28 अनाथालयों के बच्चों में सामान वितरित किया गया। कलाम ने सचिव से कहा कि सामान सरकारी पैसों से खरीदा गया है, जिसमें उनका योगदान नहीं है अतः उन्होंने एक लाख का चेक देकर कहा कि उसका सार्थक इस्तेमाल किया जाए लेकिन किसीको ख़बर ना हो कि रुपए उन्होंने दिए हैं। कलाम के 52 परिजन एक बार नौ दिन राष्ट्रपति भवन में ठहरे, उनके प्रस्थान के पश्चात सिद्धांतवादी कलाम ने ‘तीन लाख बावन हज़ार रुपए’ का बिल स्वयं के अकाउंट से राष्ट्रपति कार्यालय भेजा। कलाम का सत्य साईं से मिलने पुट्टपर्थी जाना वामपंथियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों को अखरा क्योंकि उनके अनुसार वैज्ञानिक कलाम ने गलत उदाहरण पेश किया था। 

1962 में अंतरिक्ष विभाग से जुड़ने पर कलाम को विक्रम साराभाई, सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जैसे वैज्ञानिकों का सान्निध्य मिला। साराभाई, कलाम के गुरु, मार्गदर्शक थे। साराभाई द्वारा परिकल्पित प्रक्षेपण यान परियोजना ‘एसएलवी-3’ के निदेशक थे कलाम, जिसको प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे और मानव संसाधनों के साथ सफल बनाना चुनौती थी। कलाम के रॉकेट परिज्ञापन प्रयोग के परिणामस्वरूप, सोडियम वाष्प क्लाउड के मूल्यांकन के लिए बनाए नाइके-अपाचे परिज्ञापी रॉकेटों में दो विफल हो गए तो कारण पता लगाने और योजना तैयार करने के आदेश हुए क्योंकि कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय होने से चिंताएं बड़ी थीं।

साराभाई तिरुवनंतपुरम आये तो असफलता से चिंतित कलाम, साराभाई से मिलने गए, उन्होंने मुस्कुराकर कलाम को एक कागज़ दिया। कलाम ने कागज़ खोला तो उनका पदोन्नति आदेश था। साराभाई ने कलाम की क्षमताओं का उल्लेख करके अच्छे भविष्य की कामना की और कलाम ने साराभाई से दो उड़ानें विफल होने की माफी मांगी, जिसको खारिज़ करके साराभाई बोले कि ‘‘असफलताओं से ही सीखा जाता है, आप सही दिशा में काम कर रहे हैं, सफल होंगे।’’

कलाम ने ‘एसएलवी-3’ के लिए उद्योगों के साथ साझेदारी की और विश्वविद्यालयों की वैज्ञानिक प्रतिभाओं का उपयोग किया। ‘एसएलवी-3’ के लिए विकसित प्रौद्योगिकियों ने बड़े प्रक्षेपण वाहनों, ‘पीएसएलवी’ और ‘जीएसएलवी’ के लिए ठोस आधार प्रदान किया। उन्होंने सर्वाधिक लागत प्रभावी प्रक्षेपण यान ‘पीएसएलवी’ को समनुरूप बनाकर ‘इसरो’ की प्रगति और साराभाई द्वारा निर्धारित दृष्टिकोण साकार किया।

कलाम ने प्रबंधन योजना तैयार की, प्रौद्योगिकियों के साथ 44 प्रणालियां विकसित कीं, प्रक्षेपण वाहन में एकीकरण पूरा किया, यान की प्राप्ति हेतु आगामी वर्षों में किए जाने वाले कार्य निर्धारित किए, विभिन्न परियोजनाओं में क्षमताएं साबित कर चुके वैज्ञानिकों की टीम बनायी। स्वदेशी तकनीकों द्वारा 10 अगस्त, 
1979 को वाहन लॉन्च किया पर लॉन्चिंग विफल रही। कलाम के निर्देशन में 18 जुलाई, 1980 को सुबह आठ बजे, श्रीहरिकोटा से ‘एसएलवी-3’ ने सफल उड़ान भरी। 1980 में ही ‘रोहिणी’ उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के समीप स्थापित किया गया और भारत अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बना।

‘पृथ्वी’ मिसाइल का प्रथम प्रक्षेपण 25 फरवरी 1988 को हुआ। 150 किलोमीटर रेंज की ‘पृथ्वी-1’, 1000 किलो बारूद ले जाने में सक्षम और 250 किमी रेंज की ‘पृथ्वी-2’, परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। ‘पृथ्वी-3’ की रेंज 350 किमी  है। 

कलाम लंबी दूरी की मारक मिसाइल बनाकर भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाहते थे। ‘इसरो’ प्रमुख धवन के साथ अगला प्रयास ‘पीएसएलवी’ बनाना था पर धवन ने कहा कि ‘‘इसरो का हथियारों से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए।’’ तब कलाम ‘डीआरडीओ’ में शामिल हुए और ‘एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम’ के अंतर्गत, अत्याधुनिक उच्च प्रौद्योगिकियों में भारत की रणनीतिक प्रणाली को आत्मनिर्भर बनाने की दृष्टि से ‘अग्नि’ और ‘पृथ्वी’ कार्यक्रम शुरू किए। विशेष अभियान ‘अग्नि’ प्रक्षेपण, तकनीकी, प्रबंधकीय, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों से भरा था। कलाम ने कई संगठनों को शामिल करके ४५० वैज्ञानिकों, तकनीशियनों की टीम का नेतृत्व किया। 

छह वर्षों के श्रमसाध्य प्रयास और कई ज़मीनी परीक्षणों के बाद, पहली परीक्षण उड़ान भरने को तैयार ‘अग्नि’ का प्रक्षेपण अभियान 31 मार्च को शुरू हुआ। चांदीपुर में मिसाइल परीक्षण रेंज में ट्रैकिंग और टेलीमेट्री उपकरणों के साथ विशेष लॉन्च कॉम्प्लेक्स शुरू हुआ। मिशन कंट्रोल सेंटर लिंक्ड रेंज सेफ्टी, ब्लॉक हाउस, शार रेंज, डाउन-रेंज स्टेशन और नौसैनिक जहाज मिशन की निगरानी पर थे, उलटी गिनती 20 अप्रैल को शुरू हुई। टी-माइनस-7 मिनट पर मिसाइल को बैटरी के सक्रियण के माध्यम से आंतरिक शक्ति पर रखा गया, पायरोस निकालकर गर्भनाल कनेक्टर बाहर निकाला गया लेकिन टी-1 सेकेंड में ‘होल्ड मैनेजमेंट’ प्रक्रिया का सहारा लेकर प्रक्षेपण निरस्त किया गया। आगे बढ़ने से पहले पावर पैकेजों की विस्तृत समीक्षा आवश्यक थी। रक्षामंत्री, सचिव, रक्षा सचिव, तीन चीफ ऑफ स्टाफ और महत्वपूर्ण आगंतुक, सभी निराश थे लेकिन कलाम ने विफलता के विश्लेषण और सुधार का आश्वासन दिया।

दस दिनों के भीतर फिर सिस्टम तैयार करके 1 मई को लॉन्चिंग का प्रयास किया पर T-3 सेकंड में, SITVC इंजेक्शन सर्वो वाल्वों में एक विफल हुआ, मिसाइल ने उड़ान नहीं भरी जिससे सरकार बहुत नाखुश हुयी। कलाम शांत, दृढ़संकल्पित थे क्योंकि उनके समक्ष 10 अगस्त, 1979 को ‘एसएलवी-3’ की विफलता को सफलता में बदलने के अनुभव थे। कलाम ‘अग्नि’ का नियंत्रण प्रणाली पैकेज लेकर, लॉन्च पैड से 2000 किमी दूर तिरुवनंतपुरम पहुंचे और बारह दिनों तक चौबीसों घंटे काम किया। डिज़ाइन संशोधनों को घटकों और असेंबली में शामिल किया, नए घटकों का निर्माण किया, एकीकृत पैकेजों को शामिल किया। परीक्षण माध्यमों और विशेषज्ञ समिति से स्वीकृति मिलते ही नई प्रणाली, उसी विमान में लॉन्च पैड पर भेजी जो बारह दिनों से प्रतीक्षारत था।

तमाम दबावों, पत्रकारों की आलोचनाओं के बीच लॉन्च अभियान फिर शुरू हुआ। उन दिनों अख़बार ‘अग्नि’ को ‘इंटरमिनेबली डिलेड बैलिस्टिक मिसाइल’ के रूप में दर्शाने वाले व्यंग्यात्मक कार्टूनों से भरे थे। खतरनाक चक्रवात, प्रतिकूल मौसम, परिवेश की चिंताजनक स्थिति के मद्देनज़र, अंतिम लॉन्च की तारीख़ तय हुयी, जिसमें मौसम विभाग और सहयोगी संस्थान साथ थे। सभी कार्य केंद्र सैटकॉम और एचएफ लिंक के माध्यम से जुड़े थे।

भारतीय रेलवे द्वारा बिना अग्रिम आरक्षण यात्रा सुविधा प्रदान करने से टीम ने 50 दिनों तक लगातार यात्राएं कीं। इंडियन एयरलाइंस ने विमान, हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराए। नौसेना ने शिपबोर्न स्टेशनों और चिकित्सा सुविधाओं द्वारा मदद की। आईटीआर रेंज में, लॉन्च पैड से 3.5 किमी के दायरे से, सुरक्षा कारणों से 12,000 लोग हटाए गए। स्थानीय प्रशासन ने भोजन, आश्रय, सुरक्षा तथा लोगों के आने-जाने का प्रबंध किया। कलाम और उनकी टीम सफलता के प्रति आश्वस्त थी। 22 मई 1989 को ‘अग्नि’ ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी तो आलोचनाएं, गालियां, तारीफ़ों और तालियों की गड़गड़ाहट में बदल गयीं और समूचा देश प्रसन्नता से झूम उठा। 

‘अग्नि’ समूह में ‘मध्यम रेंज’ से ‘अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल’ तक है और ‘अग्नि’ के पांच संस्करण प्रक्षेपित हुए हैं। ‘अग्नि’ 700 किलोमीटर क्षमता वाली, 15 मीटर लंबी, 12 टन वजनी, एक क्विंटल भार ढोने और परमाणु हमले में सक्षम, मध्यम बैलिस्टिक मिसाइल है। ‘अग्नि-1’, 700 किमी तक 1000 किलो प्रक्षेपास्त्र ले जाने में सक्षम, लंबी दूरी तक मार करती है। ‘अग्नि-2’, 2000 किमी तक 1000 किलो प्रक्षेपास्त्र ले जाने वाली, आधुनिक दिशानिर्देशन प्रणाली पर आधारित है। ‘अग्नि-3’ और ‘अग्नि-4’, 3500 किमी तक 1500 किलो प्रक्षेपास्त्र ले जाने में सक्षम हैं जो सड़क किनारे से छोड़ी जा सकती हैं। ‘अग्नि-5’, 5000 किमी तक 1000 किलो प्रक्षेपास्त्र ले जाने में सक्षम है।

नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में कलाम, रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और परमाणु परीक्षण विभाग के प्रमुख रहे। ‘डीएई’ के साथ थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण, प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता और सारी तैयारी होने पर भी दबाव के कारण रद्द हुआ। 1996 में प्रधानमंत्री वाजपेयी को राव ने परीक्षण करने की सलाह दी, लेकिन बहुमत ना होने से वाजपेयी को जाना पड़ा। अगले प्रधानमंत्रियों, देवगौड़ा और आई.के. गुजराल ने कुछ नहीं किया। 1998 में दोबारा प्रधानमंत्री बनने पर वाजपेयी ने कलाम को मंत्रिमंडल में शामिल होने हेतु आमंत्रित किया तो कलाम ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करके कहा कि, ‘वे परमाणु परीक्षण के लिए तैयार हैं अतः मंत्री बनने के बजाए, उसमें सफल होना चाहेंगे।’ सहमत वाजपेयी ने चिदंबरम को बुलाकर 20 दिनों में परीक्षण करने को कहा। पोखरण-द्वितीय परीक्षण में अहम भूमिका और परमाणु विस्फोट के बाद जगजाहिर हुआ कि कलाम का निर्णय उचित था। पांच परमाणु परीक्षणों के बाद उन्हें सर्वश्रेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक माना गया और भारत परमाणु हथियार बनानेवाले देशों में शामिल हो गया।

1998 में भारत ने रूस के साथ मिलकर सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ का निर्माण किया, जिसका पहला परीक्षण 12 जून 2001 को हुआ। ‘ब्रह्मोस’ धरती, आकाश, समुद्र, कहीं भी दागी जा सकती है। इसे पनडुब्बी, पानी के जहाज, विमान या ज़मीन, कहीं से भी छोड़ा जा सकता है। इसे सेना और नेवी के लिए बनाया गया है।290 किमी रेंज और 300 किलो बारूद ले जाने में सक्षम ‘ब्रह्मोस’, हवा में मार्ग बदलकर, चलते-फिरते लक्ष्य को भेद सकती है। ‘आकाश मिसाइल’ 25 किमी तक हवा से सतह में मार करती और 60  किलो हथियार ले जा सकती है। ‘आकाश’ मानव रहित विमानों, लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों को निष्क्रिय करने में सक्षम है। ‘नाग’,  42 किलो हल्के वजन वाली, चार किमी तक मार करनेवाली, टॉपअटैक-फायर, सभी मौसमों में फायर करने की क्षमता वाली ‘टैंक भेदी मिसाइल’ है जिसे हमला करने, हवा से ज़मीन पर मार करने के लिए हल्के वजनी हेलिकॉप्टर में लगाया जा सकता है। 

कलाम बेहद खुश थे क्योंकि भारत सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल वाला पहला देश बन गया था। कलाम ने ‘लक्ष्यभेदी प्रक्षेपास्त्र’ डिज़ाइन किए, उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में ‘डीआरडीओ’ की क्षमता बढ़ाई, राजस्थान में दूसरे परमाणु परीक्षण ‘शक्ति-2’ को सफल बनाया, संगठन को नवोन्मेष किया और नए लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु गतिशीलता पर जोर दिया। नेतृत्व शैली, संघर्ष समाधान और टीम भावना बढ़ाने में माहिर कलाम का विश्वास था कि समस्याएं दोनों पक्षों की जीत के रूप में सुलझनी चाहिए। कलाम में असफलताओं से निराश मातहतों को ख़ुश करने की अद्भुत प्रतिभा थी। कलाम ने राष्ट्र को परमाणु संपन्न बनाकर शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, विकसित भारत का स्वप्न साकार करने हेतु भारतीयों के दिल-दिमाग जोड़े। 

कलाम ने 25 जुलाई, 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में, राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो प्रत्येक वैज्ञानिक अतीव गौरवांवित हुआ था क्योंकि वे ‘सर्वस्वीकार्य विभूति’ थे जो हर भारतीय के ‘आदर्श’ थे। कलाम ग्यारहवें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे, जिन्हें भाजपा समर्थित एनडीए घटक दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया था, जिसका वामदलों के अलावा समस्त दलों ने समर्थन किया। कलाम ने 25 जुलाई, 2002 से 25 जुलाई 2007 तक राष्ट्रपति पद सुशोभित किया। उनको ‘महामहिम’ या ‘हिज़ एक्सेलेंसी’ कहलाना पसंद नहीं था। कलाम ‘आम लोगों के राष्ट्रपति’ यानि ‘पीपुल्स प्रेसीडेंट’ कहलाते थे, पत्रों के जवाब स्वयं लिखते थे। कलाम राष्ट्रपति बने तो दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन गए, कार्यकाल समाप्त होने पर वही दो सूटकेस लेकर विदा हुए। 

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कलाम, कविताएं लिखते, रूद्रवीणा बजाते और अध्यात्म से गहरा जुड़ाव रखते थे। राष्ट्रपति भवन के उद्यानों में मयूर नृत्य और हिरणों की अठखेलियों के दृश्यों ने उनका लेखन निखारा। कलाम सुनिश्चित करते थे कि पक्षियों, जानवरों की तस्वीरें लेते समय वे परेशान ना हों। उन्होंने एक बार बाग में टहलते वक़्त देखा कि एक मोर मुंह नहीं खोल पा रहा। पशु चिकित्सक से जाँच कराने पर पता चला, मुँह में ट्यूमर होने से वो मुँह खोलकर खा नहीं पा रहा। कलाम के निर्देश पर चिकित्सक ने आपात सर्जरी करके ट्यूमर निकाला और स्वस्थ करके मोर को बाग में छोड़ा। ऐसे ही कलाम ने देखा कि सुरक्षागार्ड ठंड में ठिठुर रहा है, उन्होंने उसके केबिन में जाड़े में हीटर और गर्मी में पंखे की व्यवस्था करायी। कलाम फ़रवरी 2007  में 1971 के युद्ध के हीरो, फील्डमार्शल सैम मानेकशॉ से मिलने ऊटी गए। उन्हें पता चला कि मानेकशॉ को फील्डमार्शल की पदवी दी गयी पर भत्ते और सुविधाएं नहीं मिले। उन्होंने मानेकशॉ के साथ, मार्शल अर्जन सिंह के भी सारे बकाया भत्तों का भुगतान कराया। कलाम की मानवीयता और अन्तर्निहित रचनाकार ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कवियों-लेखकों, पाठकों को प्रभावित किया, सभीने उन्हें सराहा। सत्कर्मों पर आस्था वाले कलाम की उत्कृष्ट सोच, प्रेरणादायी विचारों से भरपूर आत्मकथा ‘द विंग्स ऑफ फायर’, अंग्रेज़ी में छपी, फिर फ्रेंच, चीनी सहित 13 भाषाओं में अनुवादित हुयी। कलाम लिखित ‘इंडिया 2020’, ‘इग्नाइटेड मांइड’, ‘माइ जर्नी’, ‘विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘मिशन ऑफ इंडिया: ए विज़न ऑफ इंडियन यूथ’ तथा ‘अ जर्नी थ्रू द चैलेंजेज़’ अन्य किताबें हैं।

कलाम का बच्चों से लगाव सर्वविदित है, वे विद्यार्थियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे, बच्चों-युवाओं से मुलाकात और चर्चाओं के दौरान सदैव उत्साहित, मिलनसार, विनोदी और दयालु रहते थे। कलाम युवाओं को विज्ञान का महत्व समझाते, ऊंचे लक्ष्य, कड़ी मेहनत, बड़े सपने देखने, प्रगति करने, सफल होने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित करते थे। बच्चों के प्रति प्रेम देखकर, संयुक्त राष्ट्र ने कलाम के जन्मदिवस को ‘विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। 

‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ की अवधारणा मानने वाले कलाम, विश्व नागरिकता में विश्वास के चलते समस्त विश्व को परिवार मानकर विभिन्न आयु-समूह के लोगों से सहज बातचीत करते थे। उन्हें ग्रामीण भारत की यात्रा करना, छात्रों-शिक्षकों, कृषकों से मिलना भाता था। बकौल राष्ट्रपति पुतिन, ‘‘कलाम सर को उत्कृष्ट वैज्ञानिक और बुद्धिमान राजनेता के रूप में उच्च अंतर्राष्ट्रीय अधिकार प्राप्त थे।’’ सद्भावना और बड़े स्वप्नों के पक्षधर कलाम अक्सर कहते थे कि, ‘ताकत, ताकत का सम्मान करती है।’ 

कलाम ने ‘अग्नि’ के लिए विकसित सामग्री से, पोलियो प्रभावित बच्चों के लिए हल्के कैलिपर्स बनाए, जिनका वजन 3 किलो से घटाकर 300 ग्राम किया। उन्होंने हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. सोमा राजू के साथ सस्ता कोरोनरी स्टेंट बनाया, नाम रखा ‘कलाम-राजू स्टेंट’, जिसकी मदद से लाखों हृदय रोगियों की धड़कन बदस्तूर जारी है। कलाम ने डॉ. सोमा राजू के साथ ग्रामीण इलाकों के लिए ‘कलाम-राजू’ नामक छोटा टैबलेट तैयार किया, जिससे ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो।

कलाम साहसी, ईमानदार, दार्शनिक, महान विचारक थे जिन्होंने आत्मनिरीक्षण करके अंतरात्मा पर भरोसा किया। वो कठिनतम समय के दौरान भी अध्ययनरत, मौन, शांत रहते थे, त्वरित निर्णय लेने के बीच भी दीर्घकालीन लाभ के लिए चिंतित रहते थे। कलाम अपने कर्मचारियों की क्षमताएं बखूबी जानते थे पर अपूर्णता से निराश होते थे। उन्होंने सारी ऊर्जा और ध्यान अनुसंधानों में लगाया इसीलिए विवाह और परिवार की आवश्यकता महसूस नहीं की। विश्वरूपी विशाल परिवार के साथ घनिष्ठता से जुड़े, अच्छाइयों की साक्षात प्रतिमूर्ति कलाम को सभी बेशर्त प्रेम करते थे। आदर्शवादी कलाम में खामियां नहीं थीं, उन्होंने साबित किया कि कुछ भी असंभव नहीं।

कलाम, भारत की चुनिंदा हस्तियों में हैं जिन्हें विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्टतम योगदान, देशहित और समाजोत्थान हेतु किए गए कार्यों के लिए सर्वोच्च पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1981 में ‘पद्मभूषण’, 1990 में ‘पद्मविभूषण’ और देश-विदेश के 48 विश्वविद्यालयों, संस्थानों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की, अन्ना यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया। कलाम तीसरे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही, 1997 में सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया।

कलाम 27 जुलाई, 2015 को आईआईएम, शिलॉन्ग में, ‘रहने योग्य गृह’ पर व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें हृदयाघात हुआ, वे बेहोश होकर गिरे और उनका देहांत हो गया। प्रखर मेधा के धनी, ओजस्वी वक्ता, ‘थिंक टैंक’, कलाम के जाने से जो शून्य उत्पन्न हुआ, उसकी भरपाई असंभव है। कलाम चले गए मगर आज भी करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं और भारतभूमि ऐसे महान, विलक्षण सुपुत्र के लिए सदा गौरवांवित रहेगी।

(ये विचार लेखक के निजी हैं।)

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