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“कश्मीर का समाधान होकर रहेगा”

JUN 30 , 2018

भाजपा के पीडीपी से नाता तोड़ने और महबूबा मुफ्ती सरकार को अलविदा कहने के बाद कश्मीर में केंद्रीय गृह मंत्रालय की भूमिका बहुत बढ़ गई है। भाजपा के कद्दावर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की मानें तो रमजान के महीने में पीडीपी की सलाह पर सीजफायर नहीं, बल्कि कार्रवाई सस्पेंड की गई थी। लेकिन आतंकवादियों की हरकतें कम नहीं हुईं तो गृह मंत्री अब कोई नरमी न बरतने का संकेत देते हैं। उनसे कश्मीर समेत देश में नक्सलवाद, मॉब-लिंचिंग की घटनाओं, 2019 की रणनीति और विपक्ष के गठजोड़ की चुनौती जैसे तमाम मसलों पर आउटलुक के संपादक हरवीर सिंह ने बात की। गृह मंत्री ने हर सवाल का जवाब विस्तार से दिया। कुछ अंश:

सीजफायर के बावजूद कश्मीर में हिंसक घटनाएं बढ़ीं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और अंदरूनी उपद्रवों को रोकने के लिए अब किस तरह की रणनीति अपनाई जाएगी?

रमजान के दौरान एक महीने के लिए जो कार्रवाई रोकी गई, उसे सीजफायर न कहकर सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन कहा जाना चाहिए। कश्मीर की जो अमनपसंद जनता है, उसे अफेंसिव ऑपरेशन के कारण किसी तरह की परेशानी न हो, इसे ध्यान में रखकर यह फैसला किया गया था। मुसलमानों के लिए रमजान का महीना मुकद्दस होता है। लेकिन, आतंकवादी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए। शुरुआत में कुछ दिन तो ठीक रहे लेकिन बाद में दहशतगर्दों ने पत्रकार शुजात बुखारी, औरंगजेब जैसे बहादुर जवान और जम्मू-कश्मीर के पुलिसकर्मियों के ऊपर जिस तरीके से हमले किए, उसके बाद सेना और अर्धसैनिक बलों को पहले की तरह ऑपरेशन करने का आदेश देने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। राजनीतिक तौर पर भी राज्य सरकार से अलग होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

आने वाले दिनों में कश्‍मीर में एग्रेसिव ऑपरेशन दिखेंगे?

एग्रेसिव तो मैं नहीं कहूंगा। आतंकवाद बहुत बड़ी चुनौती है कश्मीर के लिए। इससे निपटने के लिए जिस भी प्रकार का कदम क्यों न उठाना पड़े, कठोर से कठोर कदम, उसके लिए सरकार कटिबद्ध है। आतंकवाद का सफाया होना ही चाहिए। यह पाकिस्तान प्रायोजित है। भारत की बराबर यह कोशिश रहती है कि हम अपने सभी पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते बनाकर रखें। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण में सभी पड़ोसी देशों के नेताओं को आमंत्रित करने का उद्देश्य यही था। एक बार सारे प्रोटोकॉल को तोड़कर पाकिस्तान में हमारे प्रधानमंत्री का जाना भी इसी दिशा में एक कदम था। मैं जब पाकिस्तान गया था तब भी इस दिशा में पहल की थी। लेकिन, पाकिस्तान अपनी ह‌रकतों से बाज नहीं आ रहा। पाकिस्तान का नेतृत्व कभी-कभी कहता है कि हम आतंकवाद रोकना चाहते हैं, कोशिश कर रहे हैं। मेरा कहना है कि आप अपनी धरती पर आतंकवाद को नहीं रोक पा रहे हैं तो पड़ोसी देश भारत की मदद क्यों नहीं लेते। हम सहयोग करने को तैयार हैं, क्योंकि आतंकवाद किसी भी सूरत में समाप्त होना चाहिए। पाकिस्तान यह भी नहीं कर रहा। इससे लगता है कि उसकी नीयत में खोट है।

अमरनाथ यात्रा शुरू होनी है। तमाम सुरक्षा इंतजाम के बावजूद पिछले साल श्रद्धालुओं की बस पर हमला किया गया था। इस बार सुरक्षा को लेकर किस तरह की तैयारियां हैं?

सेना, अर्धसैनिक बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस के बीच बहुत ह‌ी बेहतर तालमेल है। इनके साथ आइबी का भी बेहतर कोऑर्डिनेशन है। इस बार जो कोऑर्डिनेशन है, वह पिछले कुछ साल में सबसे बेहतर माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर पुलिस भी इसमें शामिल है। यह बहुत बड़ी कामयाबी है। केवल घटनाओं के आधार पर ही सरकार की नीयत और एक्‍शन के बारे में तुरंत कोई टिप्पणी कर देना तो आसान है, लेकिन सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस, आइबी सभी का म्युचुअल कोऑर्डिनेशन बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैं तो शायद जम्मू-कश्मीर पुलिस लाइन में जाने वाला पहला गृह मंत्री हूं।

आपने कहा था कि शांति के लिए सरकार राइट माइंडेड लोगों के साथ बात करना चाहती है। क्या हुर्रियत भी इसमें शामिल है?

बातचीत के लिए राइट माइंडेड होना कोई जरूरी नहीं है। लेकिन, बातचीत की मेज पर बैठे तो राइट माइंडेड होना चाहिए। समस्या का समाधान होने की मनःस्थिति होनी चाहिए। मन-मस्तिष्क में यदि खोट रहेगा, पूर्वाग्रह रहेगा तो समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। कुछ लोग जो खुद को नेता मानते हैं, (मैं राजनैतिक नेताओं की बात नहीं कर रहा) उन लोगों ने कश्मीर की जनता को छला है। कश्मीर के युवाओं में अद्‍भुत प्रतिभा देखने को मिली है, उसे बढ़ावा देना चाहिए। अभी मैं श्रीनगर गया था जिस तरह युवाओं ने स्वागत किया उसे अद्‍भुत माना गया। इफ्तार पर श्रीनगर में राष्ट्रगान हुआ, सभी खड़े हुए सम्मान में। लेकिन, कुछ लोगों ने इसे भी मुद्दा बनाने की कोशिश की।

दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर वार्ताकार नियुक्त किया गया है। उनके स्तर पर क्या प्रगति हुई है?

उन्होंने भी कहा कि जो बात करना चाहेंगे, सभी से बात करेंगे। जो बातचीत करना चाहते हैं करें, नहीं करना चाहते हैं न करें। लेकिन कश्मीर की समस्या का समाधान होकर रहेगा।

आपके मौजूदा कार्यकाल में कुछ हो पाएगा?

हमारी नीयत बिलकुल साफ है। उसके आधार पर ही कश्मीर में ऑपरेशन का फैसला किया। जनता ने तो स्वागत किया, लेकिन कुछ तत्व ऐसे हैं जो कश्मीर में शांति और खुशहाली नहीं चाहते। उन्होंने तरह-तरह की गलतफहमियां पैदा करने की कोशिश की। सबसे ज्यादा मायूसी उन्हीं को हुई। लेकिन यह काम होकर रहेगा। हाल की घटनाओं के पहले भी सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए हैं। हाल में राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की जिस तरीके से हत्या की गई, मैं समझता हूं कि सभी को उसकी निंदा करनी चाहिए। लेकिन, कुछ तत्व ऐसे हैं जो आतंकवादी वारदातों की भी निंदा नहीं करते। औरंगजेब जैसे हमारे जवान की हत्या की ‌निंदा नहीं की। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है।

शुजात बुखारी की हत्या में सीमा पार की संलिप्तता के संकेत मिले हैं?

कश्मीर में जो आतंकवाद है, वह सीमा पार से ही प्रायोजित है। इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता। बुखारी शांति की बात कर रहे थे। जो हुआ वह तो दुखद था।

हालात सामान्य करने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? कश्मीर पर यूएन की रिपोर्ट को किस तरह देखते हैं?

कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की कोशिश हो रही है। यूएन की जो रिपोर्ट आई है वह ठीक नहीं है। विदेश मंत्रालय ने आपत्ति दर्ज करा दी है।

पाकिस्तान से बातचीत का कोई रास्ता है? रॉ और आइएसआइ के पूर्व प्रमुखों की किताब आई है। गुप्तचर एजेंसी के स्तर पर भी कभी-कभी चीजों को दुरुस्त करने की कोशिश होती है?

किताब के आधार पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। शपथ ग्रहण में सबको आमंत्रित करना, हमारे प्रधानमंत्री का प्रोटोकॉल तोड़कर पाकिस्तान जाना यह सब हालात को सामान्य करने और मिल-जुलकर आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में ही तो प्रयत्न था। लेकिन, पाकिस्तान को जिस तरीके से प्रतिक्रिया देनी चाहिए वह नहीं कर रहा। पाकिस्तान को यह तो भरोसा दिलाना होगा कि वह अपनी धरती से आतंकवाद की इजाजत नहीं देगा। हम तो बात करने को तैयार हैं, पर कम से कम इतना तो आश्वासन दे।

पाकिस्तान की राजनैतिक व्यवस्‍था पर सेना का हावी होना तो समस्या नहीं? गुप्तचर प्रमुखों की किताब से संकेत मिलते हैं कि पाकिस्तान भी चाहता है बात कुछ आगे बढ़े?

जो भी व्यवस्‍था हावी हो, जिसे भी वे बातचीत के लिए भेजना चाहें, यह फैसला उनको करना है। लेकिन कम से कम अपनी धरती से आतंकवाद की इजाजत देना तो बंद करना होगा। सीमा पर संघर्षविराम उल्लंघन से बाज नहीं आ रहे, तो हम कैसे मान लें कि वे बातचीत चाहते हैं।

सीमा पर आम नागरिकों की मदद के लिए सरकार ने काफी प्रयास किए हैं। कश्मीरी युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए पत्‍थरबाजी के मामले भी वापस लिए गए। लेकिन इन सबसे फायदा होता नहीं दिख रहा?

कई घोषणाएं की गईं और मैं जाने के पहले अधिसूचना जारी कर के गया था। इसे लोगों ने बहुत बेहतर तरीके से लिया। सीमा पर करीब 15 हजार बंकर बनाने का फैसला किया है। इनमें साढ़े तेरह हजार इंडिविजुअल और शेष कम्युनिटी बंकर हैं। सुरक्षा भवन बनाने का फैसला किया है। जो मारे जाते थे उनके परिजनों को 75 हजार रुपये मुआवजा मिलता था, इसे बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया है। बुलेटप्रूफ एंबुलेंस उपलब्‍ध कराने का भरोसा दिलाया है। कुछ तत्व ऐसे हैं जो उकसाते हैं, गुमराह करते हैं। ये चीजें हमारे ध्यान में हैं। कश्मीर में स्थिति सामान्य बने इसके लिए अब हम शांत नहीं बैठेंगे। सरकार चुप्पी साधकर नहीं बैठेगी। सभी राजनैतिक दलों और अमनपसंद लोगों से अपील करना चाहता हूं कि वे सहयोग करें। देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता के सवाल पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए।

राज्य में भाजपा-पीडीपी सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए बेहतरीन अवसर के तौर पर देखा गया। लेकिन दोनों दलों के नजरिए में फर्क के कारण अवसर जाया हो गया?

अलग-अलग दल होने के कारण विचारधारा में थोड़ा-बहुत अंतर तो होगा ही। लेकिन, मैं नहीं मानता कि इससे हमारे फैसले प्रभावित हुए। दो राजनैतिक दल हैं तो कुछ वैचारिक मतभेद रहे। लेकिन यह कोई बाधा नहीं थी।

सोशल मीडिया पर झूठी खबरों और फर्जी वीडियो के कारण देश के कई हिस्सों में मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं हुई हैं। इसे रोकने के लिए क्या कर रहे हैं?

कानून-व्यवस्‍था की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। समय-समय पर राज्य सरकारों को इस संबंध में हम एडवाइजरी जारी करते रहते हैं। लेकिन, कहीं पर कोई घटना हो गई तो सारे देश में उसे प्रचारित करके समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की जाती है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें सोशल मीडिया का रोल है, इसे नकारा नहीं जा सकता। इस दृष्टि से गृह मंत्रालय काम कर रहा ह‌ै। साइबर सिक्योरिटी को मजबूत करने पर काम चल रहा है। पहले से स्थिति काफी बेहतर हुई है लेकिन अभी और भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। मैं हर तीन -चार महीने पर इस बारे में बैठकें करता हूं। हाल में भी इस पर बैठक हुई है।

चार साल से ज्यादा हो गए सरकार को। अपने कार्यकाल में आंतरिक सुरक्षा बेहतर होने को लेकर आप कितने आश्वस्त हैं?

यह तो सभी स्वीकार करेंगे कि हालात पहले से बेहतर हुए हैं। नॉर्थ-ईस्ट में हालात में 85-90 फीसदी तक सुधार आया है। पचास फीसदी से ज्यादा सुधार नक्सल समस्या के मोर्चे पर हुआ है। तीन-चार राज्यों में 11 जिले मुश्किल से रह गए हैं जो नक्सलवाद से ज्यादा प्रभावित हैं। पहले 145 जिले होते थे। नक्सलवाद पैदा होने के बाद से पहली बार केवल छोटी-मोटी घटनाएं हो रही हैं। एक हजार से कम घटनाएं हुई हैं। पहले जवानों की ज्यादा मौत होती थी और नक्सलियों का कम नुकसान होता था जो अब  ज्यादा हो रहा है। सुरक्षा बलों की क्षति काफी कम है। आम लोगों के हताहत होने में भी काफी कमी आई है। देश में कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई है।

दूसरे देशों से सीमा पार कर आए लोगों और रोहिंग्या के मुद्दे से कैसे निपटा जाएगा?

एनआरसी का काम पहली बार हमारी सरकार पूरा करने जा रही है। एक सूची प्रकाशित कर चुके हैं। 31 जुलाई को दूसरी आ रही है और इस दिसंबर तक एनआरसी का काम पूरा हो जाएगा। हमने सभी राजनैतिक दलों को आश्वस्त किया है कि जो भी करेंगे सभी लोगों से बातचीत करके ही करेंगे। दावे और आपत्ति का सभी को मौका मिलेगा। किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगे। जहां तक रोहिंग्या का सवाल है, तो सभी राज्य सरकारों को एडवाइजरी भेजी गई है। सर्वे करके रोहिंग्याओं का पता लगाने और उनका बॉयोमेट्रिक्स करवाने को कहा है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि कोई ऐसा दस्तावेज उनके हाथ में न पड़ने पाए कि भविष्य में वे नागरिकता का दावा कर सकें। इस संबंध में राज्य सरकार से जानकारी प्राप्त होने के बाद हम उसे विदेश मंत्रालय को सुपुर्द करेंगे, ताकि विदेश मंत्रालय म्यांमार से बात कर उन्हें डिपोर्ट कर सके। हर समस्या पर हमारी चौकस नजर है।

नीरव मोदी भारतीय पासपोर्ट पर ट्रैवल कर रहा था?

इस बारे में सरकार ने नीयत स्पष्ट कर दी है। यहां तक कि उनकी संपत्ति देश के भीतर और विदेशों में भी जब्त की गई है। आर्थिक अपराधियों के मामले में सरकार पहली बार इतनी सख्त हुई है।

नौकरशाही और एलजी से दिल्ली सरकार के विवाद की वजह क्या है?

पहली बार किसी मुख्यमंत्री को अपनी ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ अनशन पर बैठना पड़ा। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमने एलजी से समाधान के लिए कहा था। हमारा कोई रोल नहीं है। जो भी करना है एलजी को करना है। सबसे बड़ा सवाल है कि ऐसे हालात पैदा क्यों हुए? इस पर सरकार में बैठे लोगों को विचार करना चाहिए। ऐसा फिर न हो इसके लिए सावधानी बरतनी चाहिए। लोकतंत्र में लोक और तंत्र दोनों है। लोक बड़ा कि तंत्र, इस पर बहस नहीं होनी चाहिए।

2014 का लोकसभा चुनाव आपकी अध्यक्षता में लड़ा गया और भाजपा को ऐतिहासिक जनादेश मिला। 2019 के चुनाव को आप इससे किस तरह अलग देखते हैं?

इस हकीकत को कोई नकार नहीं सकता कि मोदी जी की लोकप्रियता यथावत बनी हुई है। इस सरकार ने चार साल में बहुत काम किए हैं। समाज के सभी वर्गों के लिए कुछ न कुछ हुआ है। जन धन खातों के जरिए देश के गरीब से गरीब व्यक्ति का वित्तीय समावेशन पहली बार किसी सरकार ने किया है। यह इतनी संवेदनशील सरकार है कि खाना बनाते वक्त किसी महिला की आंख में आंसू नहीं आए इसलिए घर-घर सिलेंडर पहुंचाया। सौभाग्य योजना के तहत कोशिश है कि एक भी ऐसा घर न बचे, जहां बिजली का बल्ब न हो। किसानों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई। कृषि लागत कम करने की दिशा में प्रयत्न ही नहीं हुए हैं, बल्कि कामयाबी भी मिली है। आज हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्‍था हैं। कुछ ही वर्षों में भारत की इकोनॉमी पांच खरब डॉलर की हो जाएगी और दुनिया की शीर्ष तीन इकोनॉमी में शामिल होगी। अंतरराष्ट्रीय जगत में इन चार साल में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है।

एनडीए के सहयोगी कम हो रहे हैं और विपक्ष इकट्ठा हो रहा है। इसको किस तरह देखते हैं?

कोई कम नहीं हो रहा। देश कभी ऐसी सरकार नहीं चाहेगा, जिसकी स्थिरता की गारंटी न हो। इस देश को स्थिर सरकार चाहिए और स्थिर सरकार भाजपा और नरेंद्र भाई मोदी ही दे सकते हैं। देश इस सच्चाई को समझता है।

लेकिन, कैराना और अन्य उपचुनाव के नतीजे तो कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं?

उपचुनाव में हममें से कोई भी प्रचार के लिए नहीं गया, इसके बावजूद भाजपा को 45 फीसदी वोट मिले। यह उपलब्धि है। उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में अंतर होता है। लोकसभा के चुनाव में लोग देखेंगे कि स्थिर सरकार कौन दे सकता है, जो पांच साल चले और देश के लिए काम करे। साथ ही साथ इस सरकार ने जो काम किए हैं उसे भी लोग देखेंगे। चार साल बाद किसी सरकार को 45 फीसदी लोगों का समर्थन हासिल होना कोई छोटा अचीवमेंट नहीं है। लोग इस हकीकत को समझते हैं कि ये जो विपक्ष के सारे पॉलिटिकल पार्टी का एलायंस है यह देश बनाने के लिए नहीं है केवल सरकार बनाने के लिए है। सत्ता का सुख भोगने के लिए है।

2019 से पहले सरकार सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी जैसा कोई चौंकाने वाला फैसला कर सकती है, जिसे लेकर वह आम चुनावों में जनता के बीच जा सके?

हमारे पास इतनी चीजें हैं। लेकिन, चुनाव में अभी बहुत समय है। कुछ भी हो सकता है। अचानक से कुछ हो जाए तो कहा नहीं जा सकता। हमने काफी काम किए हैं। लगातार ये सरकार काम कर रही है। यह आराम करने वाली सरकार नहीं है। हमारी उपलब्धियां ही हमें आगे ले जाएंगी।


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