Home सिनेमा सामान्य जयंती विशेष: मोहम्मद रफ़ी- ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’, मंत्रमुग्ध करने वाली रूहानी आवाज़ वाले पार्श्वगायक

जयंती विशेष: मोहम्मद रफ़ी- ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’, मंत्रमुग्ध करने वाली रूहानी आवाज़ वाले पार्श्वगायक

सुषमा ‘शांडिल्य’ - DEC 24 , 2021
जयंती विशेष: मोहम्मद रफ़ी- ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’, मंत्रमुग्ध करने वाली रूहानी आवाज़ वाले पार्श्वगायक
जयंती विशेष: मोहम्मद रफ़ी- ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’, मंत्रमुग्ध करने वाली रूहानी आवाज़ वाले पार्श्वगायक
सुषमा ‘शांडिल्य’

‘किसी को भी उसके कद का गुमां ना था, वो आसमाँ था, मगर सर झुकाए खड़ा रहा’... 

‘सौ बार जनम लेने’ की बजाए मोहम्मद रफ़ी एक जनम में ही सौ ज़िंदगियां जी गए।’ मोहम्मद रफ़ी अपनी रूहानी आवाज़ नज़राने के तौर पर दुनिया में गूंजती छोड़ गए जिसकी गूंज रहती दुनिया तक सुनाई देगी। मोहम्मद रफ़ी के सुरीले गीत, चाहनेवालों के दिलों में बसे हैं जिन्हें सुनकर लोग मुस्कुराते या आँसू बहाते हैं, इसीलिए मोहम्मद रफ़ी संगीत की दुनिया में अमर रहेंगे। 

मोहम्मद रफ़ी के लिए ‘लता मंगेशकर जी’ ने कहा था कि, ‘लोगों का कहना है कि रफ़ी साहब के साथ मेरे गाये युगल गीत, अन्य पुरुष गायकों की तुलना में बेहतर हैं। हालांकि मैंने मुकेश भैया और किशोर दा के साथ भी युगल गीतों का आनंद लिया है, फिर भी मैं सहमत हूँ कि रफ़ी साहब के पास सातों नोट्स पर शानदार रेंज और चौंका देने वाला अद्भुत नियंत्रण था। हम दोनों के युगल गीत संगीत-प्रेमियों द्वारा वास्तव में विशेष माने जाते थे।’ 

‘मोहम्मद रफ़ी’ की यौमे-पैदाइश 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुयी थी। पार्श्वगायन के क्षेत्र में उनके प्रवेश की अनोखी कहानी है। मोहम्मद रफ़ी ने 1980 में ‘स्टार एंड स्टाइल’ पत्रिका को साक्षात्कार में बताया था कि, ‘मैं लाहौर का मूल निवासी हूं। मैं एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखता हूं। जब मैं 15 वर्ष का था, तब दोस्तों के घर गाता था। निर्माता-अभिनेता नासिर ख़ान ने एक अवसर के दौरान मुझे देखा और मुझे बम्बई ले जाने और फिल्मों में गायक के रूप में स्थापित करने की पेशकश की।’ नासिर ख़ान ने उनके पिता से अनुमति मांगी तो पिता ने इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें फिल्मों में गायन से परहेज था। मोहम्मद रफ़ी उस समय उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान द्वारा शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण ले रहे थे। नासिर ख़ान अपनी ज़िद पर कायम रहे तो बड़े भाई ने अब्बा को उन्हें बम्बई भेजने के लिए मना लिया। अनिच्छा से पिता ने सहमत होते हुए उन्हें बम्बई भेजा। अगर नासिर ख़ान मोहम्मद रफ़ी को नहीं लाते तो फिल्म संगीत इतने सुरीले स्वर से वंचित रह जाता।

मोहम्मद रफ़ी का फिल्मी नगरी में पदार्पण हुआ और आवाज़ की मधुरता के कारण उन्होंने समकालीन गायकों के बीच अलग पहचान बनाई और ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’ के खिताब से नवाज़े गए। मोहम्मद रफ़ी की दिलकश आवाज़ ने कई उभरते गायकों को प्रेरित किया जिनमें सोनू निगम, मुहम्मद अज़ीज़ तथा उदित नारायण उल्लेखनीय हैं। उन्होंने फिल्मी प्रेम गीतों के अतिरिक्त, भजन, ग़ज़ल, देशभक्ति, कव्वाली, शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय, हास्य, मस्ती भरे तथा अन्य भाषाओं में भी उसी खूबी के साथ गीत गाये। 

उन दिनों आवाज़ गलत होने पर फिर से ठीक करके गाने के लिए कंप्यूटर नहीं थे। अगर 100 लोगों के ऑर्केस्ट्रा में एक ने भी गलत नोट बजा दिया तो गायक को फिर से पूरा गीत गाना पड़ता था। अभिनेताओं के हाव-भाव के अनुसार समायोजित की गई उनकी आवाज़ की ज़बरदस्त अदायगी का मॉड्यूलेशन अनूठा, अनोखा था जो आम कलाकार के वश की बात नहीं थी। वह आवाज़ को ज़रूरत के हिसाब से ढाल लेने में माहिर थे। मोहम्मद रफ़ी के पार्श्वगायन का हिंदी फिल्मों के लगभग सभी प्रमुख नायकों को बुलंदियों पर पहुँचाने में महती योगदान है। गुरुदत्त, भारतभूषण, दिलीपकुमार, राजकुमार, देव आनंद, राज कपूर, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, महमूद, जॉनी वॉकर, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, बिस्वजीत, जॉय मुखर्जी, राजेश खन्ना, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, नवीन निश्चल, परीक्षित साहनी, विनोद खन्ना, ऋषि कपूर, संजय खान, विनोद मेहरा, शत्रुघ्न सिन्हा आदि अभिनेताओं पर मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाये गीत फिल्माए गए। उन्होंने प्रसिद्ध गायक ‘किशोर कुमार’ के लिए भी अपनी आवाज दी थी। उनके गायन की प्रस्तुति के अनुसार, सिनेमा के पर्दे पर नायकों को गीत में निहित भावनाओं को चित्रित करने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता था।

उनके गाये सदाबहार गाने आज की पीढ़ी द्वारा भी बेहद चाव से सुने जाते हैं। प्रशंसक उनके गाने सुनकर भावविभोर होते हैं, रोते भी हैं और स्थिति विशेष में फुर्सत से नियमित आनंद लेते हैं, क्योंकि लोगों का मानना है कि उनके गीत मन और आत्मा के लिए ऊर्जा और सुकून का स्त्रोत हैं। आवाज़ की दुनिया के निर्विवाद शहंशाह, मोहम्मद रफ़ी के गानों की खूबी है कि वे कभी पुराने नहीं लगते, उनमें वही माधुर्य और ताज़गी है। वो कोमल ख़ूबसूरत आवाज़ के साथ बेहद नरम दिल के मालिक थे। सुरों के सरताज मोहम्मद रफ़ी की रूहानी आवाज़ वाले गीत, अनुपम संकलन हैं जो हर पीढ़ी द्वारा सुने जाते हैं।

मोहम्मद रफ़ी की आवाज की गुणवत्ता और भावों की गहराई बेमिसाल थी। बेशक कव्वाली, हल्के शास्त्रीय गीत, उदासी भरे गीत, हर्ष के भावों वाले गीत या रोमांटिक गीत हों, वो इतने उत्कृष्ट गायक थे कि किसी भी गीत को आसानी से गा देते थे। उनके गायन में शब्दों का स्पष्ट उच्चारण, गीत में निहित भावनाओं को सुनने पर महसूस होता है कि अन्य कोई गायक शायद ही उनके जैसा गीत प्रस्तुत कर पाता। अधिकांश गायकों ने उनकी नकल की पर असफल रहे। उनके गाये अधिकतर गाने क्लासिक, शाश्वत, उत्कृष्ट कृतियां हैं जो मन और आत्मा में गूंजते हैं। बीते युग में स्वरबद्ध होने के बावजूद वे आज भी गुनगुनाए जाते हैं। 

मोहम्मद रफ़ी की दिल को लुभाती आवाज़ और गायन शैली इतनी स्वाभाविक, आकर्षक थी कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध, रोमांचित हो जाते थे। संगीत के व्याकरण, भावना, दृश्य के प्रभाव और एक सुमधुर आवाज़, जिसको किसी भी पिच पर गवाया जा सकता है, एक आशीर्वाद स्वरुप होती है जो केवल एक बार मिलता है और मोहम्मद रफ़ी वैसा ही आशीर्वाद थे। हर तरह के गीत गाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी ऐसे गायक थे जो गीत के हर शब्द को समान महत्व देते थे, परिणामस्वरुप ऐसे गीतों की रचना हुयी जो अनमोल विरासत बनकर अमर और कालातीत हो गए। 

मोहम्मद रफ़ी 1950 से 1980 के दौरान फिल्म संगीत के निर्विवाद सम्राट रहे, (1970 में संक्षिप्त समय को छोड़कर, लेकिन उस दौर में भी उनकी श्रेष्ठता पर संदेह नहीं किया गया)। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दिन, सन 50 से 80 के दशक में जो दर्शक 25/50/100 सप्ताह की जुबली फिल्मों के गवाह हैं, उनकी सफलता में मोहम्मद रफ़ी, लताजी और आशाजी द्वारा गाए गए गीत महत्वपूर्ण कारण थे। उन सबका गायन सुनकर आने वाली पीढ़ियां शायद ही यकीन कर पाएं कि कोई ऐसे भी गा सकता था। वो शायद यही सोचें कि ऐसी आवाज़ें और ऐसा गायन शायद किसी कृत्रिम, हाईटेक मशीन के इस्तेमाल द्वारा बनाया गया हो। अफ़सोस की बात है कि आज उनके जैसी कर्णप्रिय आवाज़ कोई नहीं है, इसीलिए आज भी उनके गीतों को इतने प्यार और श्रद्धा से सुना जाता है।

मोहम्मद रफ़ी की अद्भुत गायकी के चंद उदाहरण प्रस्तुत हैं..  

फिल्म ‘बैजू बावरा’ 1952 में रिलीज़ हुई जो पूर्णतः शास्त्रीय संगीत पर आधारित थी, जिसको फिल्मों के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। फिल्म का प्रत्येक गीत चमत्कार सदृश्य, बेहद कर्णप्रिय और उस दौर के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत थे जिन्होंने रिलीज़ होते ही धूम मचा दी थी। नौशाद साहब ने भारतीय रागों पर आधारित मधुर बंदिशें रचकर, फिल्म के संगीत पक्ष को बेहद सशक्त करने का अविश्वसनीय काम किया था। मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाये गीत इस बात का प्रमाण हैं कि वो आखिर क्यों ‘मोहम्मद रफ़ी’ हैं जो महान गायक और सर्वश्रेष्ठ में से एक थे।

‘मन तड़पत हरी दर्शन को आज’ - पवित्र आत्माओं द्वारा रचा गया ऐसा भजन है जो दिव्यता की श्रेणी में रखा गया है। शकील बदायुनी द्वारा कलमबद्ध ये मास्टरपीस भजन मोहम्मद रफ़ी ने दिव्य स्वर में गाया, जिसे नौशाद साहब ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा का परिचय देते हुए संगीतबद्ध किया था, इसीलिए ये उनकी महान रचनाओं में एक है। यह भजन ‘मालकौंस राग’ (सा-गा-मा-धा-नि) पर आधारित है। मोहम्मद रफ़ी के बेदाग गायन वाले इस शाश्वत भजन के हर शब्द, हर नोट में माधुर्य और आकर्षण है। इस बेहतरीन रचना के बारे में ख़ुद संगीतकार नौशाद साहब ने कहा था कि, ‘ये भजन बनाने में मेरा कोई कमाल नहीं, राग मालकौंस का कमाल है जो स्वयं ‘शिव भगवान’ की देन है।’ नौशाद साहब ने इस भजन की रिकॉर्डिंग के एक दिन पूर्व स्पष्ट निर्देश दिए थे कि संबंधित सभी लोग पूर्ण शुद्धता के साथ, नहा-धोकर रिकॉर्डिंग के लिए आएं, सभीने पालन किया और पूरी पाकीज़गी के साथ इस भजन की रिकॉर्डिंग हुयी। गायक मोहम्मद रफ़ी, संगीतकार नौशाद साहब, गीतकार शकील बदायुनी का ख़ूबसूरत मेल भारतीय संस्कृति की सुंदरता का प्रमाण है जो प्रमाणित करता है कि संगीत में वो ताकत है जो जाति-धर्म के भेद मिटाकर खुद में एकाकार कर लेता है। 

‘ओ दुनिया के रखवाले’ - नौशाद साहब द्वारा रचित, शकील बदायुनी द्वारा लिखा और मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया ये गीत भी उत्कृष्ट कृति है जो ‘दरबारी कन्नड़ राग’ पर आधारित था। इसमें रफ़ी साहब की आवाज़ की रेंज आश्चर्यजनक और उल्लेखनीय है। वो स्केल ‘ई’ से शुरू करके ऊपरी ‘म’ तक पहुँचे हैं। कोशिश करने पर कोई ऊपरी ‘रे’ या ‘ग’ स्वर तक पहुँच जाए, लेकिन ‘म’ स्वर को छूने की कोशिश की जाने पर ऐसा लगेगा कि मुखर तार फट रहे हैं इसलिए आवाज़ दब जाएगी क्योंकि इसमें काफी तीखा नोट है। मोहम्मद रफ़ी ‘म’ स्वर तक नहीं बल्कि सप्तक तक पहुँचे और बाकायदा कायम रहकर उच्च पिच में बने रहे जो उनके गायन की महानता साबित करता है। मोहम्मद रफ़ी ने पूरे दिल से गाकर इसमें जान फूँक दी थी। उन्होंने एक लाइव प्रदर्शन में इस गीत को एक नोट में उच्च स्वर में गाया था। अगर संगीत निर्देशक उससे भी ऊंचे स्वर में गाना बनाते तो मोहम्मद रफ़ी वो भी आसानी से गाते। पश्चिमी गायकों द्वारा उच्चतम स्वरों को हिट करने पर उनकी आवाज़ तीखी और स्त्रैण होकर फट जाती है, जबकि मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ की मिठास, उच्चतम सप्तक स्वर तक में बरकरार रहती थी। यह ‘ईश्वर प्रदत्त’ गुण था इसीलिए ‘एस.पी बालासुब्रमण्यम’ ने टिप्पणी की थी कि ‘भगवान रफ़ी साहब के मामले में पक्षपाती थे।’ धन्य थे शकील बदायुनी जिनकी नायाब कलम ने ‘जीवन अपना वापस लेले, जीवन देने वाले’ शब्दों द्वारा पीड़ा को ऐसे सच्चे स्वर दिए। कई गायकों ने इस गीत को गाने का प्रयास किया लेकिन उनके भाव गायब थे और वो मोहम्मद रफ़ी की रेंज तक कभी नहीं पहुंच पाए। 

‘ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा’ - महान शायर साहिर लुधियानवी रचित इस ग़ज़ल में ‘अच्छा’ शब्द ‘सत्रह’ बार आया है और अद्वितीय प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी ने सत्रह अलग-अलग ‘सुर’ और शैली में इस लफ्ज़ का प्रतिपादन और उच्चारण किया। ये साहिर की बेहतरीन ग़ज़ल है, संगीतकार रवि ने मोहम्मद रफ़ी को ध्यान में रखते हुए इसकी रचना की थी। रवि ने मोहम्मद रफ़ी को इस गीत का पूर्वाभ्यास कराया, वो गाकर बहुत खुश हुए लेकिन उन्होंने रवि से अनुरोध किया कि ‘अच्छा’ शब्द गीत में ‘सत्रह’ बार आया है इसलिए वो उन्हें ‘सत्रह’ अलग तरीकों से गाने की अनुमति दें। रवि सहमत हो गए और परिणाम जगजाहिर था। इस गीत में सत्रह बार अलग तरह से ‘अच्छा’ शब्द सुनकर ही समझ आएगा कि मोहम्मद रफ़ी क्या थे। 

‘तुम जो मिल गए हो’ - मोहम्मद रफ़ी के गाये इस ख़ूबसूरत रूमानी गाने में वायलिन के सुंदर प्रयोग और पार्श्व में हल्के स्वर में बजते गिटार के लिए मदनमोहन के अनुपम संगीत को सलाम करना चाहिए। इस गीत की लयबद्ध प्रस्तुति में मदनमोहन अर्धशास्त्रीय ग़ज़ल की अपनी विशिष्ट शैली से सीधे ‘नाइट क्लब जैज़ ग्रूव’ में प्रवेश करते प्रतीत होते हैं और इस नई शैली में भी मोहम्मद रफ़ी विश्वसनीय लगे। कोमलता-रोमांस-गर्मजोशी की सभी भावनाएं, गति और पिच में उतार-चढ़ाव, आवाज़ का तादात्म्य, (वोकल सिंक्रोनाइज़ेशन), सही संतुलन, सहजता, सब एक साथ मोहम्मद रफ़ी के संगीत का कमाल है। मोहम्मद रफ़ी ने इस कठिन गाने को आसान बना दिया। 1970 के दशक में जब अन्य संगीत निर्देशकों ने मोहम्मद रफ़ी का साथ छोड़ सा दिया था तब भी मदनमोहन, मोहम्मद रफ़ी के साथ बने रहे और उन्होंने भी मदनमोहन को निराश नहीं किया। उस युग के शीर्ष संगीतकारों में एक, मदनमोहन को जीवित रहते वो उचित सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे। मशहूर ग़ज़ल गायक भूपेंदर सिंह ने इस गाने में 12 स्ट्रिंग गिटार का जादू जगाया। कम लोग जानते हैं कि इस गीत की व्यवस्था स्कोर कंपोज़र, अकॉर्डियन वादक, सिंथेसाइज़र और कीबोर्ड के अग्रणी, ‘कर्सी लॉर्ड’ द्वारा की गयी थी। मदनमोहन को धीमी और तेज गति वाले संगीत के बीच तारतम्य बैठाने का पूरा श्रेय जाता है। बादलों की गड़गड़ाहट इसका क्लासिक हिस्सा है जो धीमी से तेज गति में तब्दील होता है। गाना ६ मिनट लंबाई का है लेकिन फिर भी बांधे रखने में सक्षम है। इस गाने को एक आउटलुक पत्रिका सर्वेक्षण के लिए प्रख्यात संगीतकारों की जूरी द्वारा अब तक का तीसरा सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत चुना गया था। ये गीत आज भी प्रेमियों के लिए ‘ड्रीम सॉन्ग’ है। 

‘ये चाँद सा रोशन चेहरा’ - ‘कश्मीर की कली’ के इस गाने में ‘तारीफ करूं क्या उसकी’ हर बार अलग तरह से गाया गया है। ओ.पी. नैयर की मदमस्त धुन, एस.एच. बिहारी का गीत और मोहम्मद रफ़ी की मनमोहक आवाज़ वाले इस गीत का अलग प्रभाव है। शम्मी कपूर ने ख़ुद कहा था कि ‘रफ़ी साहब ने मंत्रमुग्ध करने वाली स्टाइलिश आवाज़ से नायक का 50% काम कर दिया था।’ मोहम्मद रफ़ी की सलाह पर ‘तारीफ़’ शब्द में अनूठा प्रयोग किया गया था जिसने गाने को सुंदर बना दिया। ओ.पी. नैयर के अधिकांश गाने मोहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले ने ही गाए।

मोहम्मद रफ़ी के मधुर गायन में आवाज़ की गहराई बेजोड़ थी। ‘पत्थर के सनम’ गीत में ‘पत्थर’ शब्द विशेष ध्यान देने लायक है। ‘रंग और नूर की बारात’ गाने के अंत में ‘मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूं’ में दुखी प्रेमी, प्रेमिका का हाथ, दूसरे के हाथ में दे रहा है जो पीड़ा की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। ‘चौदहवीं का चाँद हो’, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’, ‘तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को’, ‘चाहूंगा मैं तुझे’, ‘दिल के झरोखे में’, ‘क्या हुआ तेरा वादा’, मुझे दर्दे-दिल का पता ना था’, ‘सुहानी रात ढल चुकी’, ‘ये दुनिया ये महफिल’, ‘खिलौना जानकर तुम तो’, ‘आज पुरानी राहों से’, ‘खोया-खोया चाँद’, ‘रहा गर्दिशों में हरदम’, ‘मेरे दुश्मन तू मेरी’, आदि गीत साबित करते हैं कि मोहम्मद रफ़ी को गायकों में श्रेष्ठ क्यों माना जाता था। ऐसी रचनाओं से स्पष्ट है कि वो युग हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्ण युग था। उन्हें छह बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला तथा १९६५ में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से नवाज़ा था।

मोहम्मद रफ़ी की अदम्य भावना वाली गायकी को सरलता के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा। उनकी आवाज़ इतनी सरल, मधुर, मंत्रमुग्ध करने वाली, आकर्षक, तल्लीन करने वाली, सूक्ष्म, प्रेरक और भावुक थी कि उनकी गायकी तुलना से परे है। मोहम्मद रफ़ी अतुलनीय, अद्वितीय थे जो निस्संदेह भारत के महान गायकों में से एक थे, हैं और रहेंगे। वे संगीत प्रेमियों के लिए ईश्वर की ओर से भेजे उपहार स्वरुप थे। मोहम्मद रफ़ी के इंतकाल के बाद किशोर कुमार ने कहा था कि, ‘ख़ुदा की आवाज़, ख़ुदा के पास चली गई।’ 31 जुलाई, 1980 को दिलों को सुकून पहुँचाने वाली ये रूहानी आवाज़ दिल का दौरा पड़ने के कारण हमेशा के लिए खामोश हो गयी, लेकिन ये शानदार आवाज़ हमेशा सुनी जाएगी। 

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