Home कला-संस्कृति व्यंग के भीष्म पितामह हरिशंकर परसाई: समाज के ठेकेदारों को हजम नहीं होती थीं पाखंड पर करारी चोट

व्यंग के भीष्म पितामह हरिशंकर परसाई: समाज के ठेकेदारों को हजम नहीं होती थीं पाखंड पर करारी चोट

सुषमा ‘शांडिल्य’ - AUG 22 , 2021
व्यंग के भीष्म पितामह हरिशंकर परसाई: समाज के ठेकेदारों को हजम नहीं होती थीं पाखंड पर करारी चोट
व्यंग के भीष्म पितामह हरिशंकर परसाई: समाज के ठेकेदारों को हजम नहीं होती थीं पाखंड पर करारी चोट
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सुषमा ‘शांडिल्य’

पद्मश्री हरिशंकर परसाई जी, हिंदी साहित्य में व्यंग्य को सर्वथा अलग विधा का दर्जा और उत्कृष्ट मुकाम दिलाने वाले लोकप्रिय, हर-दिल-अज़ीज़ लेखक और व्यंग्यकार थे जिन्हें व्यंग्य के भीष्म पितामह कहा जाता था जो अतिशयोक्ति नहीं है। हालांकि परसाई जी व्यंग्य को साहित्य की एक अलग विधा नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि व्यंग्य साहित्य की हर विधा में रहता है और अपने आसपास देखा जाये तो हर जगह मौजूद रहता है। सर्वप्रथम परसाई जी ने ही व्यंग्य को सस्ते, हलके, उथले मनोरंजन के दायरे से निकालकर समाज के मुद्दों से जोड़ा। क्षण मात्र गुदगुदाने की बजाए उनके व्यंग्यों ने पाठकों को सामाजिक विषमताओं का शिद्दत से एहसास कराया। परसाई जी अपनी रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली में, समाज में सर्वत्र व्याप्त छल-कपट, झूठ-फरेब, वैयक्तिक एवं राजनीतिक कमजोरियां, पाखंड, आडंबर, विसंगतियां, विषमताएं, विडंबनाएं आदि पर तिलमिला देने वाली करारी चोट करते थे जो समाज के ठेकेदारों को हज़म नहीं होती थीं, इसीलिए आजीवन उनको भरपूर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। परसाई जी चूँकि सभी वर्ग के लोगों में घुलते-मिलते, उठते-बैठते थे, अतः समाज की खोखली व्यवस्था में दबे-कुचले, शोषित-दमित, पीड़ित -सताए, पिसते-घिसटते मध्यम और निम्नवर्गीय लोगों के दैनंदिन जीवन की सच्चाइयों के साक्षी रहे तथा उन्होंने बेहद निकटता से देखे आम लोगों के संघर्षों को अपने अधिकांश चरित्रों के माध्यम से निरंतर कलमबद्ध किया। पाठक उनके पात्रों से स्वयं को जोड़ पाते थे और पात्रों के दुःख-सुख उन्हें साझा और अपने लगते थे, यही उनकी रचनाओं की अपार लोकप्रियता का प्रमुख कारण था। उन्होंने विवेकसम्मत ढंग से समाज में फैले पाखंड और रूढ़िवादिता की खिल्ली अवश्य उड़ाई, पर बौद्धिक रूप से समृद्ध, समझदार और संवेदनशील पाठकगण उनकी रचनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझते, सराहते और उनका आदर करते थे। परसाई जी के व्यंग्यों में जीवन के फलसफे अपनी सम्पूर्णता में मौजूद हैं। सफल व्यंग्यकार बनने के लिए उनकी रचनाओं को आत्मसात करना नितांत आवश्यक बल्कि अवश्यम्भावी है।                

परसाई जी सरल भाषा के पक्षपाती होने के कारण रचनाओं में अक्सर आम बोलचाल के शब्दों, देशी मुहावरों एवं कहावतों का प्रयोग करते थे इसीलिए निहायत सफल थे। छोटे-छोटे वाक्य और व्यंग्य के अनुरूप भाषा-शैली होने से पढ़ने वालों को विशेष आनंद आता था। उनके व्‍यंग्‍य जिनकी शैली कथात्मक और विवरणात्मक होती थी, पाठकों के मर्म तक पहुंच कर उनको गुदगुदाते थे। 

 

परसाई जी ने जीवन को दूभर बनातीं व्यक्तियों की कमजोरियों और विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया।लेखन में मौलिक प्रयोग करते हुए उन्होंने समाज और राजनीति में व्याप्त शोषण, दमन और भ्रष्टाचार पर चुटीले व्यंग्य लिखे। लेखन में सतत रत रहते हुए भी परसाई जी को अपने दायित्व का सदा बोध रहा और उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर बिना किसी को लांछित या अपमानित किये, सरल व्यंग्य के माध्यम से अपने दायित्व का बखूबी निर्वहन किया जो सराहनीय है। परसाई जी का दृढ़ विश्वास था कि समाज में घुलने-मिलने और आम लोगों के मुद्दे, समस्याएं जानकर ही सच्चा और वास्तविक साहित्य लिखा जा सकता है। उनका मानना था कि सामाजिक विसंगतियों के प्रति सरोकार रखने और उन्हें सही दृष्टि से देखने वाला ही सच्चा लेखक होता है। सामयिकता का सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक सदुपयोग करता साहित्य उनके समय के वर्तमान से जूझता दिखाई देता है। परसाई जी एकमात्र ऐसे व्यंग्यकार हो गए हैं जिनकी तीक्ष्ण दूरदृष्टि थी इसीलिए उनकी रचनाएं आज और अधिक प्रासंगिक हैं और हमेशा प्रासंगिक रहेंगी। आज के युवाओं को सकारात्मक मार्गदर्शन और जीवन के फलसफों को समझने के लिए उनकी रचनायें अवश्य पढ़नी चाहिए।    

 

व्यंग्य को हिंदी साहित्य में अलग दर्जा देने वाले हरिशंकर परसाई जी का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जनपद के जमानी ग्राम में २२ अगस्त सन् १९२४ को हुआ था। मध्यप्रदेश से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। 18 साल की छोटी वय में ही वन विभाग में नौकरी कर ली। नौकरी के साथ मॉडल हाई स्कूल में अध्यापन का भी कार्य करने लगे। मन नहीं लगने की वजह से कुछ समय बाद नौकरी से त्यागपत्र दे दिया जिसके बाद कुछ वर्ष प्राइवेट स्कूलों में अध्यापन कार्य किया। हिंदी साहित्य की सेवा के उद्देश्य से अध्यापन के साथ साहित्य सृजन भी करने लगे थे। दोनों काम साथ करने में दिक्कतें होने की वजह से उन्होंने अध्यापन कार्य छोड़ दिया। फिर परसाई जी पूर्णकालिक रूप से साहित्य सृजन में रम गए।परसाई जी ने सबसे पहले जबलपुर से बतौर संस्थापक संपादक, मासिक पत्रिका, 'वसुधा' निकाली, तत्पश्चात व्यंग्य लेखन प्रारंभ किया। 

माना जाता है कि लेखन की शुरुआत परसाई जी ने मातृभाषा से की और अनूठी, सर्वथा नवीन लेखन शैली, अद्भुत प्रतिभा और कड़े परिश्रम के फलस्वरूप अल्पकाल में ही ऐसे दूरंदेशी लेखक के रूप में विख्यात हो गए जिनकी सोच-समझ, जीवन और लोगों के प्रति नज़रिया, सामान्य जनों से बिलकुल अलग हटकर था। समाज की रूढ़िवादी, दकियानूसी सोच, अंधविश्वासों और सड़े-गले ढांचे पर प्रहार करती रचनाओं ने उन्हें अलग पहचान दिलाई और ऐसे सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचाया जिसका हर नवोदित व्यंग्यकार सिर्फ स्वप्न देख सकता है। 

परसाई जी के समय में जबलपुर और रायपुर से देशबंधु नामक अखबार प्रकाशित होता था। इस अखबार में एक स्तंभ होता था जिसमें संपादक से पाठक प्रश्न कर सकते थे। परसाई जी ने इस स्तंभ का नाम “पूछिये परसाई से” रखा और पाठकों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर परसाई जी ही दिया करते थे। पहले पाठक इश्क और फिल्मों से संबंधित प्रश्न पूछा करते थे पर परसाई जी ने पाठकों की सामाजिक, राजनीतिक विषयों में रूचि जागृत की और लोग समाज और राजनीति संबंधी प्रश्न पूछने लगे। परसाई जी इतने सहज, सरल, आत्मीय और अपनत्व भरे ढंग से रोचक उत्तर देते थे कि लोग बेचैनी से अखबार की प्रतीक्षा करते थे। पाठकों की पढ़ने में रूचि बढ़ने से पाठक संख्या और अख़बार की लोकप्रियता भी उत्तरोत्तर बढ़ने लगी।

परसाई जी की प्रमुख रचनाएं हैं ''निठल्ले की डायरी, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, सुनो भाई साधो'' आदि। उनके उपन्यास हैं ''तट की खोज, ज्वाला और जल, रानी नागफनी की कहानी।'' उनके संस्मरण हैं ''जाने पहचाने लोग'' और ''हम एक उम्र से वाकिफ हैं।'' उनके कहानी संग्रह हैं ''भोलाराम का जीव, हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, दो नाक वाले लोग, एक लड़की पांच दीवाने'' आदि। उनके अन्य संग्रह हैं ''वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का ज़माना, कागभगोड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, अपनी-अपनी बीमारी, बेईमानी की परत, प्रेमचंद के फटे जूते, ऐसा भी सोचा जाता है, माटी कहे कुम्हार से, शिकायत मुझे भी है, तुलसीदास चंदन घिसें, सदाचार का ताबीज, तिरछी रेखाएं, बोलती रेखाएं'' आदि। उनकी सजिल्द तथा पेपरबैक ''परसाई रचनावली'' भी उपलब्ध है। परसाई जी की लोकप्रियता का आलम ये था कि उनकी रचनाओं के भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए। साथ ही अंग्रेजी, जापानी, रूसी भाषाओं में भी अनुवाद किये गए।    

हरिशंकर परसाई जी को भारत सरकार द्वारा १९८५ में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया था। उन्हें मध्यप्रदेश शासन का ''शिखर-सम्मान'' दिया गया। “विकलांग श्रद्धा का दौर” रचना के लिए उन्हें ''साहित्य अकादमी पुरस्कार'' से सम्मानित किया गया। जबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट की मानद उपाधि प्रदान की गयी थी। परसाई जी हिंदी साहित्य में शुक्लोत्तर युग के श्रेष्ठ व्यंग्यकार के रूप में उभरे और निरंतर उच्च कोटि के व्यंग्य लिखकर, इस विधा को ऐसी ऊंचाइयां प्रदान करीं कि बहुत प्रयासों के बावजूद, उस ऊंचाई के आसपास अभी तक तो कोई पहुंच नहीं पाया है। व्यंग्य विधा के पुरोधा, परसाई जी का निधन १० अगस्त, १९९५ को जबलपुर में हुआ। व्यंग्य विधा को नयी पहचान देकर अत्यंत समृद्ध, वैभवशाली, प्रभावशाली बनाने और भारत को गौरवान्वित करने वाले अति प्रतिष्ठित व्यंग्यकार के रूप में परसाई जी सदैव बड़े सम्मान के साथ याद किये जायेंगे और हिंदी साहित्य इतने महान, विलक्षण व्यंग्यकार का सदा ऋणी रहेगा। 

 

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