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पुस्तक समीक्षा: मध्यमवर्गीय जीवन जीए अंजनी जी की स्मृतियों का दस्तावेज है ‘इलाहाबाद ब्लूज़’

सुषमा ‘शांडिल्य’ - JUN 21 , 2022
पुस्तक समीक्षा: मध्यमवर्गीय जीवन जीए अंजनी जी की स्मृतियों का दस्तावेज है ‘इलाहाबाद ब्लूज़’
पुस्तक समीक्षा: मध्यमवर्गीय जीवन जीए अंजनी जी की स्मृतियों का दस्तावेज है ‘इलाहाबाद ब्लूज़’
सुषमा ‘शांडिल्य’

समीक्ष्य कृति - ‘‘इलाहाबाद ब्लूज़’’

लेखक - अंजनी कुमार पांडेय

पृष्ठ संख्या - 132 

प्रकाशक - हिंदयुग्म प्रकाशन

मूल्य - 150

समीक्षा - सुषमा ‘शांडिल्य’

‘‘इलाहाबाद ब्लूज़’’, आयकर विभाग में प्रशासनिक अधिकारी ‘श्री अंजनी कुमार पांडेय’ द्वारा संस्मरणात्मक शैली में रची, दार्शनिकता का पुट लिए, संस्कृति के गौरव से ओतप्रोत, बचपन और विद्यार्थी जीवन के अनूठे संस्मरणों की साहित्यिक दास्तान है जिसको पढ़कर बोध होता है कि भावनाओं के धरातल पर सभी विवेकशील आत्माओं की अनुभूतियां, विचार और भाव समान होते हैं। इसमें उल्लिखित संस्मरण उनके जीवन की खट्टी-मीठी स्मृतियों और संघर्षमय जीवन का प्रतिबिंब हैं। अंजनी जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़ि‍ले में हुआ, शुद्ध संस्कारी माहौल में पले-बढ़े, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, परास्नातक किया। दिल्ली में रहकर २०१० में सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करके, राजस्व सेवा में अधिकारी बने और वर्तमान में आयकर विभाग, सूरत में ज्वॉइंट कमिश्नर के रूप में पदस्थ हैं। अंजनी जी के व्यक्तित्व का मानवीय पहलू भी है, वो दिव्यांगों की सेवा भी करते हैं। ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ मध्यमवर्गीय जीवन जीए अंजनी जी की स्मृतियों का दस्तावेज है जो प्रतापगढ़ की मिटटी में पलने-बढ़ने, इलाहाबाद में अध्ययनरत रहने के दौरान हुए खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरने, तत्पश्चात यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली का सफ़र तय करने की रोमांचक गाथा समेटे है।

‘इलाहाबाद ब्लूज़’ में गाँव की माटी का सोंधापन और ‘इलाहाबादी बकैती’ की यथेष्ट झलक है। छात्र जीवन के संघर्ष, दोस्तों के संग-साथ के मसखरे अनुभव, पैसों के अभाव से उपजे फक्कड़पन में भी मस्त रहने के गुर, छात्रों द्वारा अपने कमरों पर बनाए ‘डीबीसी यानि दाल-भात-चोखा’ के दुर्लभ स्वाद का वर्णन है। व्यक्त ना कर पाने की वजह से अधूरा रह गया प्रेम प्रसंग है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए उत्कट जिजीविषा और अंततः सफल होने का हर्षोल्लास सम्मिलित है। ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ सफलता-असफलता के भंवर में गोते लगाते युवाओं को प्रेरित करती है कि पूरी लगन, कड़े परिश्रम और अदम्य लालसा से, बड़े-बड़े स्वप्न साकार किए जा सकते हैं। पाठकों को अपने लगने वाले संस्मरण ही इस पुस्तक की सफलता है।

‘इलाहाबाद ब्लूज़’ की एक पंक्ति है, ‘‘इलाहाबाद एक शहर नहीं, बल्कि एक रोमांटिक कविता है, एक जीवन शैली है, एक दर्शन है’, इलाहाबाद के प्रति अतिशय लगाव रखने वाला हर इलाहाबादी इस विचार से सहमत होगा। ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ आत्मकथा, उपन्यास या कहानी की बजाए, सरल हिंदी भाषा में लिपिबद्ध, अपनत्व भरे संस्मरणों का प्यारा संकलन है जो असल में संपूर्ण इलाहाबाद की परिक्रमा सी करवाता है। किताब का नाम ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ ज़रूर है पर पाठक अपने शहर, कस्बे या गाँव में बिताए जीवन की स्मृतियों को स्मरण करते हुए इससे स्वयं को जोड़ लेते हैं। ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ पढ़कर बचपन के दोस्तों की निश्छल-निस्वार्थ दोस्ती, दोस्तों के साथ की गयी छोटी-बड़ी शरारतें, सब स्मरण हो आता है। इस किताब को पढ़ते वक़्त कभी चेहरे पर मुस्कान आती है, अक्सर आँखें नम हो जाती हैं मानो ये अपने ही अनुभवों, विचारों और भावों की अनकही दास्तान हो।

आज के तथाकथित अत्याधुनिक, आभिजात्य वर्ग के बनावटी लोगों के लिए पुरानी सभी बातें शर्मिंदगी या लज्जा का विषय हैं जिनका वो भूल से भी वर्णन करना या स्मरण करना नहीं चाहते। पर अंजनी जी अपनी जड़ों से इतनी गहराई तक जुड़े हैं कि अपने जन्मस्थान और पूर्वजों से जुड़े संस्मरणों को कलमबद्ध करके गौरवांवित हैं जो प्रशंसनीय है। अंजनी जी ने अपनी दादी की स्मृतियों, उनके देशी नुस्खों, उनकी मृत्योपरांत होने वाली मर्मान्तक पीड़ा को एक पूरा अध्याय समर्पित किया है। इसमें सामाजिक रीति-रिवाज़ों का सांगोपांग वर्णन, उस समय होने वाले ब्याहों और दहेज़ जैसी कुप्रथा के कारण बेटियों को बोझ समझने की व्यथा, मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्ष और असंभव प्रतीत होते स्वप्नों को संभव करने की गाथाओं वाले संस्मरण हैं। अंजनी जी ने परिवार का महत्व दर्शाते, बचपन के संघर्षों के विशद, भावप्रवण संस्मरण संकलित किए हैं, जिन्हें नकली चकाचौंध, दिखावे की प्रवृत्ति और जीवन की आपाधापी में लगे लोग अक्सर विस्मृत कर देते हैं। हल्के-फुल्के, उथले-छिछले मनोरंजन की अपेक्षा रखकर इसे पढ़ने वालों को निराशा हाथ लगेगी।

‘कई बार मैंने सोचा भगवान बुद्ध घर से क्यों चले गए? सोचा क्यों नहीं, विचारा क्यों?’ // ‘शायद मेरे भीतर के भगवान बुद्ध मेरे भीतर ही रहते हैं और मैं भीतर-ही-भीतर निर्वाण प्राप्त कर लेता हूँ’ लिखकर अंजनी जी ने अपने व्यक्तित्व में निहित अनूठे गांभीर्य, अतिशय संवेदनशीलता और दार्शनिक गुणों का परिचय दिया है। यही गुण लेखन में अद्भुत आध्यात्मिक विचारों का सृजन करवाते हैं। अंजनी जी द्वारा अनुभव के उपरांत लिखी इस पंक्ति में युवाओं की हृदयगत पीड़ा समायी है - ‘आज के इस मिडिल क्लास लड़के को घर छोड़ने के बाद ना ज्ञान मिलता है और ना ही मोक्ष।’ इस जीवंत दस्तावेज में, छोटे शहर के मध्यमवर्गीय युवा द्वारा स्वप्नों को साकार करके अस्तित्व की सार्थकता तलाश करने हेतु रचे गए संघर्ष, असफलता से उपजे अवसाद, ‘पल में तोला-पल में माशा’ होते मन, आशा-निराशा के बीच झूलती मनःस्थिति से उपजे निश्चय-अनिश्चय का वर्णन है। प्रभावशाली ढंग से वर्णित, यथार्थ के कठोर धरातल पर रची गयी ये संवेदनशील गाथा हृदय के तार झंकृत करती है।

‘इलाहाबाद ब्लूज़’ में दिल्ली आने वाले हज़ारों युवाओं के संघर्षों का सच्चा वर्णन है जो आते हैं आईएएस बनने का स्वप्न लेकर, पर असफल होने पर हताश-निराश, छलनी हृदय लिए, अवसादग्रस्त वापस लौटते हैं। अंजनी जी ने संघर्षरत युवाओं की असफलता से उपजी निराशा को समाप्त करने हेतु सार्थक संदेश और समझाइश दी है- ‘सभी लड़ाकों को मेरा यह संदेश है कि अगर आपने संघर्ष किया है और आपको लगता है कि आपको, आपकी मेहनत का बराबर फल नहीं मिल रहा है, तो आपको यह जान लेना चाहिए कि अभी मेहनत और बाक़ी है।’ ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ अंजनी जी के विद्यार्थी जीवन के दौरान हुए अंतर्निहित द्वंद्वों का ब्यौरा और सफलता के सोपान तक पहुँचने की गाथा है जिसे उन्होंने ईमानदारी और सच्चाई के साथ साझा किया है, जिससे छात्र लाभान्वित हो सकते हैं।

अंजनी जी की ये स्वीकारोक्ति कि - ‘मैं नहीं जानता साहित्य की गूढ़ता को, मैं नहीं जानता लेखन की विधाओं को और मैं ये भी नहीं जानता कि अच्छे साहित्य के मानदंडों को किस हद तक ये किताब छू पाएगी’, उनकी सादगी, सरलता, विनम्रता और विशालहृदयता की परिचायक है। उन्होंने साबित कर दिया कि सहज लेखन के स्वामी होकर यदि सजग लेखक धर्म का निर्वाह किया जा सके तो सृजन की परिणति सुखद होती है। परन्तु ऐसा करने के लिए भाषा के साथ सजगता बरतनी होती है, साथ ही लेखन को परिनिष्ठित अभिव्यक्ति में संवारकर निखारने के लिए उतने ही उत्कृष्ट शिल्प की आवश्यकता होती है। वे इसी विचारधारा का पालन करते हुए लिखते हैं इसीलिए प्रसिद्ध पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टल्स, समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के अलावा वे फेसबुक पर भी पढ़े जाने वाले लोकप्रिय लेखक हैं। अंजनी जी के संस्मरण अनुभवजन्य हैं, जिन्हें लेखकीय कौशल के माध्यम से उन्होंने ऐसे प्रस्तुत किया है कि हर पाठक उनसे तादात्म्य स्थापित कर पाता है और ये गुण वैशिष्ट्य ही अंजनी जी की लेखनी की सफलता है। इस पुस्तक को पढ़कर लगता नहीं कि ये अंजनी जी का प्रथम प्रयास है, बल्कि ये किसी दक्ष साहित्यकार का उत्कृष्ट लेखन लगता है। अंजनी जी एक नेक, अच्छे इंसान होने के साथ ही उम्दा लेखक हैं और उनकी ये कृति पढ़ने के बाद, अगली कृति की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी।

‘इलाहाबाद ब्लूज़’ पढ़ने के बाद, अपने शहर की सभी जगहें और हर बात शिद्दत से याद आती है। स्मृतियों की एक मर्मस्पर्शी बानगी है - ‘पुराने यमुना पुल पर अब जाम नहीं लगता है। अब नहीं फंसते लोग उस ट्रैफ़िक जाम में। ज़िंदगी आज भाग रही है नए पुल पर, लेकिन पुराने यमुना पुल पर मेरा बहुत कुछ छूट चुका है।’ अंजनी जी की ये पंक्ति कि ‘यह पुस्तक एक वृक्ष की जड़ों का एक टूटे हुए पत्ते से संवाद है’ स्पष्ट करती है कि अंजनी जी का मन रुपी पत्ता, इलाहाबाद रुपी वृक्ष की जड़ से बहुत गहरा जुड़ा है जो आज भी उनके मन को इलाहाबाद के लिए बेतरह तड़पाता है। अपने शहर से असीम लगाव रखने वाले ही इस तड़प को महसूस कर सकते हैं। स्वयं खालिस इलाहाबादी होने के नाते, समस्त इलाहाबादियों और बाकी सबसे भी मेरा अनुरोध है कि ‘इलाहाबाद ब्लूज़’ अवश्य पढ़ें क्योंकि ये हिंदी की १०० श्रेष्ठ किताबों में एक, बेस्टसेलर किताब है जो अमेज़ॉन पर उपलब्ध है। अंजनी जी का आभार प्रकट करते हुए मैं उनके द्वारा भविष्य में सृजित होने वाले लेखन के लिए उन्हें अग्रिम शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ।

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