Home कला-संस्कृति सामान्य इस्मत चुगताई- बिंदास, बोल्ड और नारीवादी अफसानानिगार

इस्मत चुगताई- बिंदास, बोल्ड और नारीवादी अफसानानिगार

सुषमा ‘शांडिल्य’ - AUG 21 , 2021
इस्मत चुगताई- बिंदास, बोल्ड और नारीवादी अफसानानिगार
इस्मत चुगताई- बिंदास, बोल्ड और नारीवादी अफसानानिगार
सुषमा ‘शांडिल्य’

इस्मत चुगताई, उर्दू साहित्य की ऐसी सशक्त, बेबाक, प्रबुद्ध, बिंदास, बोल्ड और नारीवादी अफसानानिगार थीं, जिनके बेख़ौफ़, निराले लेखन की वजह से उर्दू अदब में उनका नाम चोटी के नामों में शुमार था। प्रगतिशीलता की प्रतीक, इस्मत सर्वाधिक विवादास्पद लेखिका थीं जिन्होंने औरतों से जुड़े मुद्दों को मानीखेज़, चुटीले अंदाज़, संजीदगी मगर निर्भीकता से लिखने का दुस्साहस ऐसे दौर में किया, जब मर्द भी औरतों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर लिखने से हिचकते, बचते और ख़ौफ़ खाते थे। इस्मत ने औरतों पर होने वाले अत्याचारों के लिए समाज पर उंगली उठाने में कतई ख़ौफ़ महसूस नहीं किया। उनके अफ़सानों में महिला पात्रों द्वारा अस्तित्व की लड़ाई अपने अंदाज़ में लड़ी गयी है। 

इस्मत ने मध्यमवर्गीय और वंचित निम्न वर्ग की मुस्लिम महिलाओं के परिवेश को बखूबी चित्रित किया। इस्मत की पाठिकाओं को उनके ठेठ मुहावरेदार, गंगा-जमुनी भाषा में रचे महिला पात्र सच्चे, ज़िंदगी के निहायत क़रीब नज़र आए। उनके अफसानों में रोज़मर्रा की तक़लीफ़ें, परेशानियां, तल्ख़ हक़ीक़तें और दुःख-दर्द की झलकियां नज़र आने से अफसाने लोकप्रिय हुए। इस्मत को औरतों के संघर्षों, पीड़ा और वेदना ने इस कदर आहत किया कि किरदारों के माध्यम से खाके खींचते हुए उन्होंने औरतों पर हुए अन्यायों के लिए समाज को कटघरे में खड़ा करके आईना दिखाया। इस्मत जादूगरनी थीं जो चमत्कार ना करके, कहानियों के ज़रिए ज़िंदगी से इश्क करने पर मज़बूर कर देती थीं। इस्मत ने मुस्लिम तबके की दबी-कुचली, सकुचाई-कुम्हलाई, पीड़ित-सतायी लड़कियों-औरतों की मनोदशा को ईमानदारी से कलमबद्ध किया। इस्मत ने बकलम खुद, जीवनानुभवों को मुख़्तलिफ़ रंगों में ख़ूबसूरती से रचा। मज़ाहिया और तन्ज़िया चुटकियों से लैस, बेजोड़ शैली में लिखने में उनको महारत हासिल थी जो उनके कद्रदानों के लिए ख़ुशी का बायस रही। मुहब्बत से लिखे किरदारों के दुख-सुख पढ़कर उन्हें प्यार से सभी 'इस्मत आपा' कहते थे।

इस्मत, दस भाई-बहनों में छोटी थीं, बड़ी बहनों की शादी और विदा के बाद बचपन भाइयों के साथ हॉकी, फुटबॉल, गिल्ली डंडा जैसे लड़कों के खेल खेलने में बीता। इस्मत के अनुसार, ये उनकी मां के लिए शर्मनाक था, लेकिन भाईयों की संगत के फलस्वरूप लेखन में लड़कों जैसे विद्रोही तेवर, धार, पैनापन और बेबाकी आयी पर बकौल इस्मत, ‘अपराधी थे उनके भाई।’ प्रारंभिक दौर ने उनके व्यक्तित्व को बेख़ौफ़ बनाकर तराशा जो अंततः दुस्साहस और अतीव मुखरता में तब्दील हो गया। रिश्तेदारों के प्रतिरोध के बावजूद, इस्मत ने 1938 में लखनऊ से बीए करके फिर अलीगढ़ से शिक्षक प्रशिक्षण की डिग्री ली। भाई मिर्ज़ा अज़ीम बेग़ चुग़ताई लेखक थे अतः भाई रुपी उस्ताद मिलना लेखिका बनने में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उन्होंने 1942 में मुंबई के फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक शाहिद लतीफ से शादी की और पति के साथ फिल्मों के लिए पटकथा और संवाद लिखे।

समकालीन 'मंटो', लफ्फाज़ी से अलहदा सशक्त और निर्भीक भाषा के पैरोकार थे इसलिए इस्मत 'मंटो' से प्रेरित, प्रभावित थीं जो उनकी शैली में परिलक्षित हुआ। उन पर पश्चिमी लेखकों, 'जी.बी. शॉ', 'सिगमंड फ्रायड' और 'डी.एच.लॉरेंस' का भी प्रभाव पड़ा। उर्दू अदब में इस्मत के अलावा ‘मंटो, कृष्ण चंदर और राजेंद्र सिंह बेदी’ प्रमुख माने जाते हैं पर मंटो और इस्मत, अविस्मरणीय योगदान के लिए सर्वोच्च माने गए। इस्मत के अलावा 'मंटो' ने भी बेबाकी से औरतों के मुद्दों पर लिखा जिसके चलते दोनों आलोचकों के कोपभाजन हुए। 

इस्मत ने रोचक, चुटीले अंदाज़ में, सार्थक व्यंगों के माध्यम से समाज की कुरीतियों और अंधविश्वासों पर भी कड़ा प्रहार करने से गुरेज़ नहीं किया, जो आलोचकों के लिए असहनीय था, पर 'इस्मत आपा' को कहां परवाह थी आलोचनाओं की, क्योंकि वो निर्भीकता की मिट्टी से निर्मित ऐसी दबंग रूह थीं जिन्होंने उस समय नंगा सच लिखा जब औरतों पर तमाम बंदिशें थीं। आज जब ख़्वातीन फेमिनिज़्म की अलम्बरदार बनी हुई हैं, तब काबिलेगौर है कि आज़ादी के पहले इस्मत ने नारी विमर्श को साहित्य में सर्वोच्च स्थान दिया जो समय से बहुत आगे की उनकी तरक़्कीयाफ़्ता सोच का परिचायक है।     

इस्मत को साहित्यिक हल्कों में शुरुआत में कोई नहीं जानता था, पर 1942 में महिला समलैंगिकता पर आधारित उनकी कहानी 'लिहाफ़' प्रकाशित हुयी और वो साहित्यिक परिदृश्य पर धमाकेदार तरीके से प्रकट होकर छा गयीं। 'लिहाफ़' प्रकाशित होते ही इस्मत को तीखी आलोचनाएं झेलनी पड़ीं। 'लिहाफ़' दो महिलाओं की कहानी है, जिनमें एक पति के प्यार से वंचित और दूसरी उसकी दासी है। दोनों के नीरस जीवन में प्रेम का अभाव उनको यौन संतुष्टि के माध्यम से करीब लाता है। कहानी को महिला समलैंगिकता के कारण बेहद फुहश (अश्लील) माना गया। विवादास्पद 'लिहाफ़' चर्चित और मशहूर हुई जिसमें हवेलियों के ज़नानखाने में औरतों के समलैंगिक रिश्तों की अंदरूनी हक़ीक़तों की परतें उधेड़ीं गयीं थीं। 'लिहाफ़' पढ़ने पर उनकी ऊंची सोच समझ में आती है। उस दौर में लेखक समलैंगिकता जैसे पर्दों में छुपे, ढंके, अछूते विषय पर लिखने से परहेज करते थे, इस्मत ने ऐसी कहानी लिखकर दुस्साहस का परिचय दिया। 'लिहाफ़' से प्रसिद्धि मिली पर कथित 'अश्लीलता' के परिणामस्वरूप अदालत ने उन्हें तलब करके उन पर अश्लीलता का मामला दर्ज़ किया, जो बाद में वापस लिया गया। 

उर्दू में रोमांस को बखानती कविताओं में प्रतीकात्मक शब्दों में पुरुष समलैंगिकता, कामुकता संबंधी विषय वर्जित नहीं थे। रूढ़िवादी समाज में गुप्त और खुले कामुक भावों पर चुपचाप मुस्कुराया जाता था। कवि ‘महिला समलैंगिकता’ के लिए गुप्त इशारे लिखते थे पर ना ध्यान दिया जाता था ना विरोध किया जाता था। इसके विपरीत, 'लिहाफ़’ में समलैंगिकता दर्शाया जाना किसी तरह मंजूर नहीं किया गया।

प्रगतिवाद के स्पर्श से लबरेज़ महिलाओं द्वारा झेली गयी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और यौन समस्याओं के बारे में इस्मत का लेखन, वास्तविक अर्थों में यथार्थ नारीवाद था जो पितृसत्तात्मक समाज में बम विस्फोट की तरह था। १८वीं-१९वीं शताब्दी में पुरुष ही नहीं, औरतें भी महिलाओं को पारंपरिक नारी की छवि में बंधी गुणी, विनम्र, संवेदनशील और आज्ञाकारी देखना चाहती थीं। इस्मत ने विद्रोही तेवर के साथ लिखा कि भारत के पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की असली भावनाओं और संवेदनाओं को कभी समझने की कोशिश ही नहीं की गयी। इससे पहले किसी महिला ने निर्भय होकर, बेबाक स्वरों में ऐसे विचार व्यक्त नहीं किए थे। इस्मत पुरुष प्रधान समाज के दोगले रवैये का भरपूर मज़ाक उड़ाती थीं।

इस्मत का ‘टेढ़ी लकीर’ सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है, जिसके लिए उन्हें 'गालिब अवार्ड' मिला था। ‘ज़िद्दी, मासूमा, सौदाई, जंगली कबूतर, एक कतरा-ए-खून, बहरूप नगर, बांदी और दिल की दुनिया’ अन्य उपन्यास हैं। ‘अजीब आदमी' उपन्यास गुरुदत्त के जीवन पर आधारित है। इस्मत ने उस संक्रमण युग में समाज के द्विभाजन पर सवाल उठाने के लिए बड़े पैमाने पर लड़कियों की मजबूत परवरिश की मांग उठायी। इस्मत को जानने और समकालीन प्रासंगिकता से संबंधित होने के लिए उनकी आत्मकथा 'कागज़ी है पैरहन' ज़रूर पढ़नी चाहिए। ‘कलियां, चोटें, एक रात, छुईमुई, एक बात, दो हाथ, शैतान' और 'थोड़ी सी पागल' कहानी संग्रह हैं। ‘यहां से वहां तक’ में पाकिस्तान यात्रा का विवरण है। भाई अज़ीम बेग की मृत्यु के बाद लिखा गया 'दोज़खी' सर्वश्रेष्ठ पेन-स्केच है जो दुखद, भावुक और विश्लेषणात्मक है। ‘एक शौहर की ख़ातिर, जड़ें, जनाज़े, कामचोर, कुंवारी, घूंघट, चौथी का जोड़ा, जवानी, तो मर जाओ, नन्ही की नानी, बदन की ख़ुश्बू, बिच्छू फूफी, हिंदुस्तान छोड़ दो, बड़ी शर्म की बात, बहू बेटियां, भूल भुलैयां, मुग़ल बच्चा, सास, अपना ख़ून, अमर बेल, बेड़ियां, नन्ही सी जान, ये बच्चे’ कहानियां हैं। अंग्रेजी में तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। इस्मत ने कई फिल्में लिखीं, १३ फिल्मों से जुड़ी रहीं और ‘जूनून’ में रोल भी किया। आख़िरी फिल्म 'गर्म हवा' को कई अवार्ड मिले। 'पद्मश्री', 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'इक़बाल सम्मान’, 'मख़दूम अवार्ड’ और 'नेहरू अवार्ड’ भी मिले। इस्मत का लेखन आज भी प्रासंगिक है। नारीवाद या प्रगतिशीलता को तब ही सम्पूर्ण कहा जायेगा जब इस्मत के समस्त लेखन को सम्मानित किया जायेगा। 

इस्मत आपा, 24 अक्टूबर, 1991 को मुंबई में दुनिया को अलविदा कह गयीं। जीते जी विवादों से चोली-दामन का साथ रहा, मौत के बाद भी विवादों ने पीछा नहीं छोड़ा। वसीयत के अनुसार उन्हें मुम्बई के चन्दनबाड़ी में अग्नि को समर्पित करके अंतिम संस्कार किया गया, पर लोगों ने इसका खंडन किया और अंतिम इच्छा का रहस्य उनके साथ ही ख़त्म हुआ।

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