आइआरजीसी पश्चिम एशिया की शक्तिशाली सैन्य एजेंसियों में एक
राजधानी तेहरान के ग्रैंड बाजार की भूलभुलैया जैसी गलियों में आधुनिक ईरानी शक्ति-संरचना के बदलाव साफ दिखता है। पहले वहां पश्चिम समर्थक शाही सल्तनतों की खुफिया पुलिस हुआ करती थी और अब इस्लामी क्रांति के बाद इस्लामी छाया फौज यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प (आइआरजीसी) सबसे अहम ताकत है। 1979 की क्रांति से जन्मी यह फौज पश्चिम एशिया की सबसे अहम ताकत बन गई है। यह लेबनान से लेकर लैटिन अमेरिका तक के सशस्त्र गुटों को हर तरह की मदद पहुंचाती है। इसकी भूमिका ईरान के साथ इज्राएल-अमेरिका की जंग में तो सबसे खास है।
आइआरजीसी के उभार को समझने के लिए ईरान के आखिरी बादशाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी के दौर को याद करना जरूरी है। शीत युद्ध के दौरान ईरान इस क्षेत्र में अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगियों में एक था। 1953 में अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों की शह से ईरान में लोकतांत्रिक सरकार के तख्तापलट के बाद सत्ता में पहुंचे शाह ने पकड़ मजबूत की और आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ाया और सत्ता पर पूरा नियंत्रण हासिल किया। 1957 में अमेरिका की खुफिया सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआइए) की मदद से शाह ने सावाक का गठन किया, जो ईरान की राष्ट्रीय खुफिया और सुरक्षा सेवा थी। सावाक के एजेंटों की संख्या 6,000 से ज्यादा थी। वे सिर्फ जासूस नहीं ‘आतंक के पहरेदार’ थे। सावाक तय करता था कि शाह के बारे में कोई भी नकारात्मक खबर लोगों तक न पहुंचे।
उसी दमन-चक्र से वह क्रांति भड़की, जिसकी रोकथाम के लिए यह पूरा तंत्र बनाया गया था। 1970 के दशक के आखिर तक आर्थिक गैर-बराबरी, राजनैतिक दमन और पश्चिम के प्रति बढ़ती नाराजगी से बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का दौर शुरू हुआ। उस आंदोलन की सबसे सशक्त आवाज निर्वासित धर्मगुरु रूहोल्लाह खुमैनी के रूप में मिली। 1979 में ईरानी क्रांति के फलस्वरूप राजशाही का पतन हो गया। नई सत्ता के सामने समस्या थी कि मुल्क की औपचारिक फौज पर शाह की पकड़ मजबूत थी। क्रांति के नेताओं को डर था कि कहीं यह फौज ‘तख्तापलट’ न कर दे। खुमैनी ने अप्रैल 1979 में औपचारिक रूप से आइआरजीसी की स्थापना की। आइआरजीसी की बुनियादी शर्त ‘विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता’ है। हालांिक ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) के दौरान आइआरजीसी महज इस्लामिक गणराज्य की रक्षा के लिए बनी मिलिशिया से ताकतवर फौज में तब्दील हो गई।
आठ साल लंबी जंग में लाखों लोग मारे गए और ईरान की सुरक्षा संरचना भी पूरी तरह बदल गई। उसकी औपचारिक फौज तो मोर्चे पर लड़ रही थी, लेकिन आइआरजीसी ने ऐसी रणनीतियां विकसित कीं, जो बाद में ईरान की फौजी रणनीति का हिस्सा बन गईं। ये रणनीतियां थीं गैर-बराबर जंग के लिए गुरिल्ला अभियान और विचाराधारा के लिए जान न्यौछावर करने वाले लड़ाकों का इस्तेमाल। ऐसे लड़ाकों को फौज नहीं, बल्कि आइआरजीसी में जाना बेहतर लगा। उसमें उन्हें बेहतर वेतन और सामाजिक तरक्की के मौके मिलते थे और इस तरह उसने ईरान के कुछ सबसे बेहतरीन और होनहार युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया। जंग के अंत तक आइआरजीसी समानांतर फौजी ढांचा बन चुका था, जिसका सियासी असर बहुत ज्यादा था।
आइआरजीसी और उससे जुड़ी फौजी और खुफिया एजेंसियों में लाखों की संख्या में युवा हैं, जिनमें एक बसिज मिलिशिया भी है, जो आंतरिक सुरक्षा और खुफिया सूचनाएं जुटाने वाला अर्द्घसैनिक बल जैसा है।
पिछले तीन दशकों में आइआरजीसी ईरान की अर्थव्यवस्था में गहरी जड़ें जमा चुका है। उसने ‘खातम अल-अंबिया कंस्ट्रक्शन हेडक्वार्टर’ जैसे बड़े समूहों के जरिए पाइपलाइन, बंदरगाह और दूरसंचार नेटवर्क सहित कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के ठेके हासिल किए हैं। कई रणनीतिक उद्योग ऐसे अर्ध-सरकारी नेटवर्क में चले गए, जिन पर आइआरजीसी का ही दबदबा है। इसके कई पूर्व सदस्य भी बड़ी संख्या में राजनीति में शामिल हो गए हैं। कई मंत्री, सांसद और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भी कभी इस गार्ड में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
ईरान के अंदर आइआरजीसी रक्षक और सियासी एजेंसी दोनों की भूमिका निभाता है। यह बल खासकर ‘बसीज मिलिशिया’ के जरिए देश की आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में मददगार है, जिसकी पिछले दो दशकों में हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों को कुचलने में अहम भूमिका रही है।