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ट्रंप चाहते हैं कि बेहद कुशल पेशेवरों को ही दिया जाए एच-1बी वीजा

NOV 09 , 2018

ट्रंप प्रशासन आईटी पेशवरों में विशेष रूप से लोकप्रिय एच-1बी वीजा के वर्तमान प्रावधानों में कुछ बदलाव करना चाहता है ताकि इसके अंतर्गत केवल बेहद कुशल विदेशी पेशेवरों को वीजा मिल सके और यह सिर्फ आउटसोर्सिंग का तरीका बनकर ना रह जाए।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, वाइट हाउस में नीति समन्वयन (पॉलिसी कोऑर्डिनेशन) के लिए डेप्युटी चीफ ऑफ स्टाफ क्रिस लिडल ने बृहस्पतिवार को वॉशिंगटन में कहा कि राष्ट्रपति का मानना है कि बेहद कुशलता वाले क्षेत्र जैसे कि टेक्नॉलजी के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग देश में रुकें। उन्होंने इस बात को कई बार सार्वजनिक तौर पर भी कहा है। उन्हें आव्रजन में यह बेहद सकारात्मक हिस्सा लगता है।

नई टेक्नॉलजी के संबंध में अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की लाइव चर्चा के दौरान एच-1बी वीजा पर राष्ट्रपति के विचारों के बारे में सवाल करने पर लिडल ने जवाब में कहा, 'वह (ट्रंप) योग्यता आधारित आव्रजन की बात करते हैं, स्पष्ट रूप से यह (H-1B वीजा) योग्यता आधारित आव्रजन का हिस्सा है।' हालांकि, लिडल ने माना कि अगर यह मुद्दा कांग्रेस में पहुंचा तो इसे लेकर काफी विवाद हो सकता है।

माइक्रोसॉफ्ट और जनरल मोटर्स के पूर्व सीईओ लिडल को राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीति प्रक्रिया की निगरानी करने और उसका समन्वयन करने के लिए नियुक्त किया गया है। उनका कहना है कि एक हद तक हम विधायिका के स्थान पर नियामक तरीका अपना सकते हैं। वैसे तो एच-1बी वीजा प्रणाली बहुत हद तक विधायिका के तहत आती है, लेकिन हम इसे नियमित करके आउटसोर्सिंग में इसकी भूमिका को कम कर सकते हैं।

अभी 1 लाख 20 हजार ए-1बी वीजा है। वहीं गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी आईटी कंपनियों के अमेरिकी नियोक्ताओं के संगठन 'कम्पीट अमेरिका' का कहना है कि 'एच-1बी' वीजा रोके जाने की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है। H-1B गैर-आव्रजक (नॉन-इमिग्रेंट) वीजा है जो अमेरिकी कंपनियों को सैद्धांतिक और तकनीकी विशेषज्ञता वाले कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। प्रौद्योगिकी कंपनियां भारत और चीन से हजारों-लाखों की संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए इसी वीजा पर निर्भर हैं।


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