ट्रम्प और उनकी टीम ने साफ कर दिया है कि जो देश वॉशिंगटन की मर्जी के हिसाब से नहीं चलेंगे, उन्हें भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा
कामयाब वेनेजुएला ऑपरेशन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धीमी प्रतिक्रिया से उत्साहित ट्रम्प सरकार अपना रणनीतिक जाल फैला रही है, जो लैटिन अमेरिका और उससे आगे अमेरिकी ताकत के नए और ज्यादा मजबूत दावे का संकेत दे रहा है।
किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को अचानक उठा ले जाने से दुनिया में वैसा विरोध या थू-थू नहीं हुई, जिसकी उम्मीद थी। असलियत तो यह है कि बड़े पैमाने पर विरोध और आलोचना अमेरिका के भीतर से ही उठी है। अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट इस बात से नाराज हैं कि वेनेजुएला ऑपरेशन के बारे में उनसे न तो सलाह ली गई और न ही उन्हें वाकिफ किया गया। सिद्धांत रूप में अमेरिका के युद्ध में उतरने से पहले कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है। यूक्रेन में रूसी घुसपैठ के खिलाफ मोर्चा खोले यूरोपीय देशों के नेता ट्रम्प की नाराजगी के डर से अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा करने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाए। वेनेजुएला के सहयोगी चीन और रूस दोनों ने वाशिंगटन की सैन्य कार्रवाई की भर्त्सना तो की है, लेकिन अमेरिका के लिए कोई खतरा पैदा नहीं किया। वैसे भी, मॉस्को या बीजिंग से सिर्फ बयान जारी करने से ज्यादा कुछ करने की उम्मीद नहीं है। इससे वाशिंगटन के इस भरोसे को मजबूत किया है कि एकतरफा कार्रवाई की लागत संभाली जा सकती है। वेनेजुएला में निर्णायक कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति दिखाने के बाद, व्हाइट हाउस ने अब अपनी नजरें पुराने दुश्मनों और लैटिन अमेरिकी पड़ोसियों पर टिका दी हैं। डोनाल्ड ट्रंप पश्चिमी गोलार्ध पर अमेरिकी प्रभुत्व को फिर से स्थापित करना चाहते हैं और अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को याद दिलाना चाहते हैं कि संयम अब उनकी विदेश नीति का सिद्धांत नहीं रहा।
ट्रम्प और उनकी टीम ने साफ कर दिया है कि जो देश वॉशिंगटन की मर्जी के हिसाब से नहीं चलेंगे, उन्हें भी इस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। क्यूबा, कोलंबिया और मैक्सिको व्हाइट हाउस की नजर में हैं और ईरान भी।

तैयारी नईः ईरान में सड़कों पर सरकार विरोधी प्रदर्शन
कोलंबिया के गुस्तावो पेट्रो के बारे में हाल में ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा, “कोलंबिया भी बहुत बीमार है। उसे एक बीमार आदमी चला रहा है जिसे कोकीन बनाना और उसे अमेरिका को बेचना पसंद है। मैं आपको बता दूं, वह यह ज्यादा समय तक नहीं कर पाएगा।” क्या इसका मतलब यह है कि हम कोलंबिया में अमेरिकी फौजी ऑपरेशन देख सकते हैं? ट्रम्प का जवाब था, “यह मुझे अच्छा लगता है।”
लंबे समय से कम्युनिज्म का रक्षक रहा क्यूबा अमेरिका के पिछवाड़े में है और उसने कई अमेरिकी हमले का सामना किया था। जॉन एफ. कैनेडी के कार्यकाल में बे ऑफ पिग्स बहुत चर्चित घटना थी। तब अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ न्यूक्लियर युद्ध के मुहाने पर खड़े हो गए थे। लेकिन वह टल गया, तो अमेरिका में रहने वाले क्यूबा के निर्वासितों के उकसावे पर लगातार अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने वहां कम्युनिस्ट सरकार के तख्तापलट की कोशिश की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो क्यूबा के आप्रवासियों के बेटे और कट्टर कम्युनिस्ट विरोधी हैं। कहा जाता है कि वे हवाना में सरकार बदलने के सबसे बड़े हिमायती हैं। यह भी कहा जाता है कि मदुरो के खिलाफ कार्रवाई में उनका बड़ा हाथ है।
ट्रम्प ने कहा, ‘‘क्यूबा सिर्फ वेनेज़ुएला की वजह से जिंदा है। अब उसके पास वह पैसा नहीं आएगा। क्यूबा ढहने वाला है। मुझे नहीं पता कि वह कैसे टिक पाएगा। मुझे नहीं लगता कि हमें किसी कार्रवाई की जरूरत है।’’ इसका मतलब साफ नहीं है, लेकिन वॉशिंगटन का मानना है कि वहां की कम्युनिस्ट सरकार खुद-ब-खुद गिर जाएगी।
मैक्सिको ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज किया है। ‘‘मेक्सिको को अपनी हालत सुधारनी होगी, क्योंकि (नशीली दवाएं) मैक्सिको के रास्ते आ रही हैं और हमें कुछ करना होगा। हम चाहते हैं कि मैक्सिको यह करे। वह ऐसा करने में सक्षम है। लेकिन दुर्भाग्य से मैक्सिको में कार्टेल बहुत मजबूत है। कार्टेल ही मैक्सिको चला रहा है।’’
राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम ने पिछले हफ्ते वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जोरदार विरोध किया और अपने देश की संप्रभुता पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकियों का खोखला बताया। मदुरो के अपहरण के बाद एक बयान में शिनबाम ने कहा, ‘‘हम दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी को पूरी तरह से खारिज करते हैं। लैटिन अमेरिका का इतिहास स्पष्ट और मजबूत है: अमेरिकी दखलंदाजी से न कभी लोकतंत्र आया, न खुशहाली आई, न ही स्थायी स्थिरता।’’ उन्होंने पहले ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ देश को झुकने नहीं दिया और हालात संभाल लिए, लेकिन अब वे ज्यादा आक्रामक वॉशिंगटन से रू-ब-रू हैं, जो अपने पिछवाड़े में अपनी श्रेष्ठता साबित करने में यकीन रखता है।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति मदुरो
सच तो यह है कि लैटिन अमेरिकी देशों को एहसास है कि युद्ध के बीच में न तो मॉस्को और न ही चीन संयुक्त राष्ट्र में बयान जारी करने से ज्यादा कुछ करेंगे। दक्षिण अमेरिका में अमेरिका विरोधी ताकतें मदद के लिए यूरोप या बाकी दुनिया की तरफ भी नहीं देख सकतीं।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई को चेतावनी मिली है। ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं, ऐसे में ट्रम्प ने वेनेजुएला पर हमले से पहले ही चेतावनी दी थी कि ‘‘अगर वे पहले की तरह लोगों को मारना शुरू करते हैं, तो अमेरिका जोरदार झटका देगा।’’ इज्राएल में भी बेंजामिन नेतन्याहू सरकार हिलने लगी है, ऐसे में नेतन्याहू के दोस्त ट्रम्प एक बार फिर ईरानी नेतृत्व पर वार करने के लिए उकसाए जा सकते हैं।
ग्रीनलैंड भी ट्रंप की योजना से दूर नहीं हैं। वे अपने पहले कार्यकाल से ही ग्रीनलैंड पर नजर गड़ाए हुए हैं लेकिन अब ज्यादा ताकतवर अमेरिका फौजी कार्रवाई भी कर सकता है।
ट्रम्प ने कहा, ‘‘हमें राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। वह बहुत रणनीतिक है। अभी, ग्रीनलैंड रूसी और चीनी जहाजों से भरा हुआ है। हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से ग्रीनलैंड की जरूरत है और डेनमार्क रोक नहीं कर पाएगा, मैं आपको बता सकता हूं।’’
यूरोपीय देशों के नेताओं के साथ-साथ ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भी ट्रम्प की ग्रीनलैंड वाली टिप्पणियों पर फौरन पलटवार किया। फ्रांस और जर्मनी के विदेश मंत्रियों ने भी ऐसा ही किया। फिर भी अब तक न तो नाटो और न ही यूरोपीय संघ ने कोई टिप्पणी की है। डेनमार्क नाटो का सदस्य है।
वेनेजुएला में आसान कार्रवाई से ट्रम्प को अपने माने हुए दुश्मनों के खिलाफ जोरदार मनमाफिक पहल का हौसला मिल गया है। कहते भी हैं कि कामयाबी ही कामयाबी दिलाती है। पराई धरती पर अमेरिका के युद्धों की आलोचना करने वाले राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए यह बदलाव चौंकाने वाला है लेकिन उनके चुनावी वादों के अनुकूल है। ट्रम्प की विदेशी सरकारों पर बड़बोल बयानों को पहले शेखी बघारने की उनकी आदत समझा जाता था, लेकिन वे अब गंभीरता से ली जाएंगी।