वेनेजुएला में सीधे फौजी कार्रवाई के जरिए राष्ट्रपति मदुरो को उठा लाकर और लैटिन अमेरिका के बाकी देशों तथा ईरान को धमकी देकर ट्रम्प ने क्षेत्रीय कब्जे और उपनिवेशवाद के नए दौर का आगाज किया
महज दो घंटे और दुनिया में राजनैतिक-आर्थिक-राजनयिक व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्घ के दौर में खिसक गई, जब क्षेत्रीय दबदबे और उपनिवेश से ही संसाधनों पर हक-हुकुक तय होते थे। 2-3 जनवरी की दरम्यानी रात अमेरिकी फौज के हेलिकॉप्टर करीबी सैन्य ठिकाने से उड़े, वेनेजुएला की राजधानी काराकस में कुछ धमाके हुए, राष्ट्रपति निकोलस मदुरो के सुरक्षा में लगे वेनेजुएला और क्यूबा के करीब चार दर्जन जवान मारे गए और अपने बेडरूम में सोए मदुरो और उनकी पत्नी को अगवा करके न्यूयॉर्क ले आए। किसी संप्रभु देश में बिना उकसावे के ऐसी फौजी कार्रवाई से दुनिया के फाख्ता उड़ गए। यूरोप, अफ्रीका, एशिया महादेशों से विरोध बस विरोध की खातिर उठे और हाल के दशक में अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने वाले चीन और रूस भी मोटे तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विरोधी प्रस्ताव लाने तक ही सीमित रहे। भारत ने तो उस प्रस्ताव में नाम न दर्ज कराना ही मुनासिब समझा। मोटे तौर पर रूस और चीन के आसरे ही वेनेजुएला और लैटिन अमेरिकी देश अमेरिका के दबदबे का विरोध करते रहे हैं। सो, अब वे भी रुख ठंडा करने लगे हैं। तो, ये सवाल भी बड़े होने लगे हैं कि क्या पिछले कुछ दशकों में बनी उस मान्यता के दिन लद गए कि बाजार ही महाशक्ति की हैसियत तय करेगा, क्षेत्रीय कब्जा नहीं। यानी मदुरो को अगवा करके ट्रम्प ने जता दिया कि अमेरिका न सिर्फ दुनिया का नक्शा बदलने को तैयार है, बल्कि राजनयिक-आर्थिक व्यवस्था भी बदलेगा और अपने साम्राज्य का विस्तार करेगा।

फौजी कार्रवाई के फौरन बाद डोनाल्ड ट्रम्प का 3 जनवरी को ही घंटे भर की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी अमेरिका के इस इरादे की गंभीरता जाहिर कर रही थी। ट्रम्प ने ऐलान किया कि “अब वेनेजुएला को अमेरिका चलाएगा और हमारी तेल कंपनियां उसमें मदद करेंगी।” ट्रम्प यहीं नहीं रुके, उन्होंने लैटिन अमेरिका में क्यूबा, बोलिविया, मैक्सिको और ग्रीनलैंड को काबू में लेने का खुलासा करके पश्चिमी गोलार्द्घ पर एकछत्र दावे का भी लगभग ऐलान कर दिया। पश्चिम एशिया में ईरान भी उनके अगले निशाने का मुकाम है। अब अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने वाले रूस और चीन के अगले कदम ही तय करेंगे कि 2026 के गर्भ में विश्व व्यवस्था में बदलाव के क्या गुण-सूत्र छुपे हैं। हालांकि ये स्थितियां ट्रम्प के दोबारा आगमन के पहले ही आकार लेने लगी थीं, मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो बस उसका खुलकर इजहार कर दिया।
नए उपनिवेशवाद का आगाज
ट्रम्प ने नए बदलाव का आगाज भी नाटकीय ढंग से किया। 3 जनवरी को उन्होंने वेनेजुएला की फौजी कार्रवाई को “दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे शानदार” बताया, और उसका मुख्य मकसद वेनेजुएला के तेल भंडार पर अपना अधिकार बताकर दुनिया को चौंका दिया। पहले तक इन दखलंदाजियों के लिए “ड्रग्स के खिलाफ जंग” का नाम दिया जाता रहा है। हाल के महीनों में अपने सैन्य जमावड़े और समुद्री जहाजों पर हमले की यही वजह बताई जाती रही है, जिसमें 116 लोग मारे गए थे। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक दर्जन से ज्यादा बार तेल का जिक्र करके ट्रम्प ने यह इशारा कर दिया कि वह सब इसी फौजी कार्रवाई की तैयारी का हिस्सा था। खबरें ये भी हैं कि महीनों से अमेरिका में मदुरो के आवास जैसा ढांचा बनाकर फौजी कार्रवाई का अभ्यास किया जा रहा था।

वेनेजुएला ऑपरेशन देखते ट्रम्प
नवंबर 2025 में प्रतिबंधित तेल टैंकरों की “पूरी नाकाबंदी” के ऐलान के बाद ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया था कि नाकाबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक वेनेजुएला “अमेरिका को वह सारा तेल, जमीन और अन्य जायदाद वापस नहीं कर देता जो उसने पहले हमसे चुराई थी।” 3 जनवरी की कार्रवाई के बाद ट्रम्प ने साफ कहा, “हमारी दिग्गज तेल कंपनियां, जो दुनिया में सबसे बड़ी हैं, वहां जाएंगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, टूटे-फूटे तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी, और देश के लिए पैसा कमाना शुरू करेंगी। जरूरत पड़ी तो हम दूसरा और बहुत बड़ा हमला करने के लिए तैयार हैं।”
इस तरह ट्रम्प ने साफ-साफ नव-उपनिवेशवाद और पश्चिमी गोलार्द्घ पर एकछत्र दावे का ऐलान किया, जिसके मुताबिक लैटिन अमेरिका सिर्फ अमेरिका का पिछवाड़ा ही नहीं, बल्कि संसाधनों की कॉलोनी है जिसे जबरदस्ती भी हासिल करना है। उनके इस नजरिए का विस्तार ग्रीनलैंड पर दावे में भी मिलता है, जिससे यूरोप के देश दंग रह गए। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड को छोड़ा गया तो चीन और रूस के बेड़े वहां दबदबा कायम कर लेंगे। वे पहले अपने चुनावी अभियान के दौरान कनाडा को भी अपना 51वां राज्य बता चुके हैं। इसके अक्स रूस से तेल व्यापार करने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ थोपने की कार्रवाई में भी दिखते हैं। यानी ट्रम्प को अपनी नई दुनिया चीन और रूस के बरक्स अमेरिकी दबदबे की खड़ी करनी है।

मदुरो की जगह अंतरिम राष्ट्रपति रेड्रिग्ज ने पहले सख्त लहजे तेल भंडार पर नियंत्रण की बात की, बाद में सुलह-सफाई की बात करने लगीं
इस दलील के तहत शायद चीन और रूस ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई का विरोध कर सकते हैं। ईरान के शहरों में महंगाई और इस्लामी गणराज्य की खामनेई सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ भारी प्रदर्शन चल रहे हैं। उन प्रदर्शनों में सैकड़ाें लोगों के मारे जाने की भी खबरें हैं। यह भी बताया जाता है कि विरोध प्रदर्शनों को ईरान के पूर्व शाह पहलवी के अमेरिका में निर्वासित मौजूदा वंशज की शह भी मिली हुई है। ट्रम्प ने भी ईरान को धमकी दी, “अगर लोगों को मारना जारी रहता है, तो उसे बेहद आक्रामक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।” ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई ने अमेरिका की वेनेजुएला कार्रवाई की कड़ी निंदा की और अपने देश में किसी तरह की दखलंदाजी के खिलाफ अमेरिका को माकूल जवाब देने और 24 घंटे के भीतर 11 परमाणु बम का परीक्षण करने की चेतावनी दी है। खबर यह भी है कि चीन और रूस से रक्षा हथियार और जंगी विमान ईरान पहुंच रहे हैं। यानी यहां टकराव के आसार बन सकते हैं।

तेहरान में खामनेई के खिलाफ प्रदर्शन
मतलब यह कि रूस और चीन अपने दबदबे वाले इलाके में शायद अमेरिका को रोकेंगे, जो लैटिन अमेरिका के मामले में कड़ा रुख न दिखाने से अलग दिख सकता है। चीन के विदेश मंत्री ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मदुरो को फौरन रिहा करने की मांग की है। लगभग ऐसी ही मांग रूस के विदेश मंत्री की ओर से भी हुई है और उन्होंने ऐसी किसी और कार्रवाई से अमेरिका को चेताया भी है। लेकिन अमेरिका या ट्रम्प शायद फिलहाल रूस से कोई जमीनी मोर्चा नहीं खोलना चाहते हैं। यह इससे साफ हुआ कि प्रशांत सागर में एक जहाज के नाविकों को अमेरिकी फौजों ने पकड़ लिया तो उसने रूसी झंडा लगा लिया। आखिर रूसी पनडुब्बी के रवाना होने के बाद अमेरिका ने सभी नाविकों को रिहा कर दिया और मामला फिलहाल शांत हो गया है।
इसके अलावा, अमेरिकी कार्रवाई एक और इशारा कर रही है कि तथाकथित नई टेक अर्थव्यवस्था नहीं, मूल ढांचागत अर्थव्यवस्था ही मायने रखती है। यानी तेल, खनिज संसाधन, वाहन उद्योगों के जमीनी ढांचे ही कारगर हैं, जिसके लिए क्षेत्रीय विस्तार जरूरी है। यह रवैया ट्रम्प के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ या मागा जनाधार के अनुकूल भी बैठता है। इस जनाधार में गोरे ईसाई कट्टर समूह हैं और जिसमें ताकतवर यहूदी समुदाय भी शामिल है, जिन्हें लगता है कि कथित उदारवादी नीतियों से उनका दबदबा घटता गया है। इसी वजह से ट्रम्प ने आते ही फौरन संयुक्त राष्ट्र, डब्लूटीओ, जलवायु पेरिस समझौते वगैरह को बेमानी बनाना शुरू किया।
शायद इसीलिए चुनावों में भारी मदद करने वाले नए टेक अमीरों की भी उन्होंने परवाह नहीं की। गौरतलब है कि एक्स के मालिक एलॉन मस्क के लंगोटिया दोस्त से दुश्मन बन जाने की ट्रम्प ने कोई परवाह नहीं की। हालांकि अमेरिका में ही ट्रम्प सरकार की इन नीतियों का भारी विरोध हो रहा है। वेनेजुएला कार्रवाई के खिलाफ डेमोक्रेट और दूसरे विपक्षी समूह मोर्चा खोले हुए हैं। अमेरिका में मदुरो के पक्ष में और अमेरिका को युद्घ में झोंकने के खिलाफ भारी प्रदर्शन हो रहे हैं। सिनेट और कांग्रेस में भी ट्रम्प को भारी विरोध झेलना पड़ रहा हैं। लेकिन फिलहाल वे इन आलोचनाओं से बेपरवाह हैं। उन्हें मालूम है कि तमाम मोर्चों पर नाकामियों से उन्हें अगले चुनावों में वेनेजुएला जैसी कार्रवाई ही बचा सकती है।
वेनेजुएला का मामला
ट्रम्प ने 13 जनवरी को कहा, “वेनेजुएला के हालात ठीक है, लेकिन जरूरत पड़ी, तो कड़ा हस्तक्षेप किया जाएगा।” इस धमकी का असर होता भी दिख रहा है। मदुरो की जगह अंतरिम राष्ट्रपति की कुर्सी पर आईं उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने पहले तो काफी सख्त लहजे में मदुरो की वापसी और अपने तेल भंडार पर संपूर्ण नियंत्रण की बात की, लेकिन बाद में सुलह-सफाई और बातचीत की बात करने लगीं। दरअसल चीन और रूस से पर्याप्त मदद मिलने के आश्वासन के अभाव मेें लैटिन अमेरिकी देशों के रुख में ठंडाई दिख रही है। क्यूबा, मैक्सिको, बोलिविया वगैरह ने भी विरोध तो कड़ा किया और अमेरिका को दखलंदाजी के खिलाफ भारी जन प्रतिरोध की चेतावनी भी दी, मगर धीरे-धीरे उनके तेवर बदलने लगे हैं। उन्हें आशंका है कि लंबे संघर्ष से अमेरिकी हस्तक्षेप से निकले देश कहीं फिर उस भंवर में न फंस जाएं।

न्यूयॉर्क में ट्रम्प की वेनेजुएला कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन
दरअसल, वेनेजुएला में तेल का इतिहास अमेरिकी लूट का रहा है। वहां 20वीं सदी की शुरुआत में जुआन विसेंट गोमेज की सैन्य तानाशाही के तहत विदेशी तेल कंपनियों को तेल भंडार खोजने और उन पर नियंत्रण की छूट दी गई। 1930 के दशक तक, तीन विदेशी तेल कंपनियों ने लगभग 98 प्रतिशत उत्पादन को नियंत्रित किया। उनमें एक ब्रिटिश-डच कंपनी रॉयल डच शेल, और बाकी दो अमेरिकी गल्फ कॉर्पोरेशन और स्टैंडर्ड ऑयल (अब एक्सॉनमोबिल) थीं। इन कंपनियों का असल में वेनेजुएला के शुरुआती पेट्रोलियम कानून पर काफी असर था या कहें, उन्हीं की शह पर लिखे गए, ताकि अधिकांश मुनाफा न्यूयॉर्क और ह्यूस्टन में जाए। यह साम्राज्यवादी लूट सिर्फ वेनेजुएला तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि विदेशी पूंजी के लिए यह पूरे महाद्वीप का प्रोजेक्ट था। बोलिविया, ब्राजील, मैक्सिको सब उसका दंश भुगत चुके हैं।
बाद के दौर में वेनेजुएला में तेल के राष्ट्रीयकरण की दो पहलें हुईं। पहली 1976 में और फिर 2007 में। ये लगभग एक सदी के साम्राज्यवादी शोषण से अपने संसाधन को वापस पाने के प्रयास थे। हालांकि राष्ट्रीयकरण के हर दौर में कंपनियों को पर्याप्त मुआवजे भी दिए गए। 1976 में कार्लोस एंड्रेस पेरेज की सरकार के तहत विदेशी तेल कंपनियों को एक अरब डॉलर से ज्यादा का भुगतान किया गया, जो उस वक्त काफी बड़ी रकम थी और उनके पहले के मुनाफों को जोड़ दें तो आंकड़ा बहुत बड़ा हो जाएगा। जनवरी 1976 में सरकारी कंपनी पेट्रोलेओस डी वेनेजुएला एसए(पीडीवीएसए) की स्थापना हुई।
इसी तरह, 2007 में राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के कार्यकाल में फिर से कुछ निजी कंपनियों से नई ठेका शर्तों के तहत बातचीत की गई और उन्हें खरीदने की कोशिश हुई। उस समय भी भारी मुआवजे देकर तेल ऑपरेशन पर सरकारी नियंत्रण कायम किया गया। अमेरिकी कंपनी एक्सॉनमोबिल और कोनोकोफिलिप्स ने नई ठेका शर्तों को अस्वीकार कर दिया तो उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया गया। लेकिन दूसरी अमेरिकी कंपनी शेवरॉन राजी हो गई तो वह बनी रही। बाद में कोनोकोफिलिप्स और एक्सॉनमोबिल कंपनियां इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन में गईं और जीत गईं। कहा जाता है कि कोनोकोफिलिप्स के मामले में, अभी भी 10 अरब डॉलर से ज्यादा का बकाया है।
वैसे, 2007 के राष्ट्रीयकरण के बाद भी वेनेजुएला का तेल क्षेत्र साझा उपक्रम बना रहा है। शेवरॉन अभी भी वेनेजुएला में लगभग 25 प्रतिशत ऑपरेशन संभालती है। पीडीवीएसए का नियंत्रण लगभग 50 प्रतिशत पर है, जिसमें लगभग 10 प्रतिशत चीन के नेतृत्व वाले जॉइंट वेंचर में, 10 प्रतिशत रूस और 5 प्रतिशत यूरोपीय कंपनियों के पास हैं। आज भी विशेष लाइसेंस के तहत शेवरॉन हर दिन 120,000 बैरल से ज्यादा वेनेज़ुएला का कच्चा तेल पंप करती हैं, और उसे सीधे अमेरिकी रिफाइनरियों में निर्यात कर रही हैं।
लैटिन अमेरिका में अमेरिकी पदचिन्ह
वेनेजुएला और लैटिन अमेरिका में ट्रम्प की मौजूदा कार्रवाई “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” का ही हिस्सा है। उसके तहत माना जाता रहा है कि अमेरिका को पूरे महाद्वीप में फैलने और उस पर कब्जा करने का दैवीय अधिकार है। 1954 में ग्वाटेमाला में सीआइए की शह पर तख्तापलट से लेकर 1973 में चिली में हुए तख्तापलट तक, अमेरिका ने अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए लैटिन अमेरिका में दर्जनों सरकारों को हटाया है। क्यूबा का मामला तो और भी विकट है, जिसे लगातार अमेरिकी हमले झेलने पड़े हैं। आज भी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के निशाने पर क्यूबा ही सबसे ज्यादा है, क्योंकि उनके अभिभावक वहीं से निर्वासित होकर आए थे।
भारत कथा
लगभग इसी दौरान ट्रम्प ने भारत और मोदी सरकार पर भी रुख और कड़ा कर दिया है। हाल में उन्होंने कहा कि “उनसे पूछा गया कि सर, क्या मिल सकते हैं, हां जरूर और वे मिलने आए लेकिन खास कुछ नहीं हुआ।” इसी के साथ उन्होंने तकरीबन 60वीं बार दोहराया कि “मैंने ही पाकिस्तान के साथ मई में युद्घविराम कराया।” भारत की ओर से कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं आई। दरअसल शायद ट्रम्प नहीं चाहते कि भारत रूस और चीन के खेमे में जाए। इसी वजह से रूस से तेल लेने पर 500 प्रतिशत टैरिफ का भी ऐलान कर दिया गया है। अमेरिका से व्यापार समझौते पर बातचीत भी लटकी हुई है। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री ने हाल में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रम्प से बात नहीं की तो गाड़ी निकल गई। उम्मीद है कि रिश्तों में तनाव दूर करने की प्रक्रिया अब शुरू हो सकती है, जब नए अमेरिकी राजदूत सर्गेई गोर पदभार संभाल रहे हैं, जो ट्रम्प के करीबी हैं। हालांकि भारत ने चीन से उद्योग संबंध बढ़ाने का फैसला भी कर लिया है।

संयुक्त राष्ट्र में वेनेजुएला के प्रतिनिधि के अमेरिकी कार्रवाई की भर्त्सना प्रस्ताव में रूस और चीन ने अगुआई की, लेकिन भारत अलग रहा
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प के हर बयान पर प्रतिक्रिया न देने और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता तथा व्यापार वार्ता में किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए भी लक्ष्मण रेखा खींचने का भारत का फैसला समझदारी भरा और परिपक्व है। दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सितंबर में चीन में एससीओ बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकातों को ट्रम्प के लिए साफ संदेश के तौर पर देखा जा रहा था कि भारत के पास इस खेल में दूसरे खिलाड़ी भी हैं। मोदी सरकार का ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ समझौते और यूरोपीय संघ के साथ वार्ता के जरिए व्यापार संबंधों का विस्तार करने का कदम भारतीय निर्यात पर अमेरिकी कड़े टैरिफ के असर को कम कर सकता है। हालांकि इन देशों में हमारा निर्यात काफी कम या 20 फीसदी के करीब है और अमेरिका की तरह बहुत सामान पर उतनी कीमत भी नहीं सकती। फिर भी कोशिशें जरूर विकल्प तलाशने की हो रही हैं।
दरअसल वर्ष 2025 में दुनिया जिस तरह दहलते हुए बदली, उसी से 2026 के कुछ अनुमान लग गए थे। लेकिन इतनी तेजी से वर्ष के शुरुआत में नए नक्शे बनने लगेंगे, यह अंदाजा किसी को नहीं था। ट्रम्प के कड़े रुख से भारत, खासकर मोदी सरकार भी अपनी विदेश नीति के नजरिए को फिर से बदलने पर मजबूर हुई है, क्योंकि अब अमेरिका भारत को चीन के मुकाबले रणनीतिक ताकत के तौर पर नहीं देखता और पाकिस्तान के साथ ट्रम्प की पींगे भी उसके हक में नहीं हैं। जाहिर है, वर्ष 2025 में ट्रम्प नीति को लेकर शक-सुबहे अब गंभीर हकीकत में बदल गए हैं कि अमेरिका भारत को आर्थिक रूप से छोटा, टेक्नोलॉजी में पीछे और रणनीतिक रूप से कमजोर मानता है। बहुध्रुवीय दुनिया के लिए भारत की आकांक्षा को इस कठिन भू-राजनैतिक सच्चाई का सामना करना होगा। नई स्थितियों और नई दुनिया में अपना रुख तय करना होगा। तो, 2026 में और दहलने और बड़े बदलावों के लिए तैयार रहिए।