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यशवंत सिन्हा का नजरिया: बुलडोजर बाबा या बुलडोजर मामा कहलाना गर्व नहीं

यशवंत सिन्हा - MAY 13 , 2022
यशवंत सिन्हा का नजरिया: बुलडोजर बाबा या बुलडोजर मामा कहलाना गर्व नहीं
‘बुलडोजर बाबा’, ‘बुलडोजर मामा’ से याद आ जाता है इमरजेंसी का वक्त
यशवंत सिन्हा

“बुलडोजर बाबा या बुलडोजर मामा कहलाना गर्व नहीं, शर्मिंदगी का प्रतीक”

आजाद भारत में यह शायद बहुत ही बुरा दौर है। बिना कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए गैर-कानूनी ढांचों को भी ढहा देना अपने आप में असंवैधानिक और कानून के राज का सरासर उल्लंघन है। और फिर, किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना तो निहायत ही अलोकतांत्रिक, बर्बर और तानाशाही है। मैं चकित हूं कि इस निपट शर्मिंदगी को सत्तारूढ़ भाजपा के नेता गर्व के साथ बयान कर रहे हैं! कोई ‘बुलडोजर बाबा’ कहला रहा है तो कोई ‘बुलडोजर मामा’! इससे इमरजेंसी की बरबस याद आ जाती है, लेकिन यह उससे भी बुरा इसलिए है कि तब बुनियादी अधिकार मुल्तवी कर दिए गए थे। आज तो खुलेआम जश्न मनाया जा रहा है और समाज के एक वर्ग में दूसरे वर्ग के खिलाफ नफरती जुनून पैदा करने की कोशिश निर्लज्जता के साथ की जा रही है। विभाजनकारी राजनीति का ऐसा दौर बहुत कम दिखा है।

मध्य प्रदेश के खरगोन और दिल्ली की जहांगीरपुरी में जो हुआ, वह तो इंतहा है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कुछ घंटे यह सब चलता रहा। और किनके घर-दुकान, ठेले-खोमचे उजाड़े गए? जो किसी तरह अपनी दो जून की रोटी का जुगाड़ करते हैं। अगर पत्थरबाजी हुई तो बिना पड़ताल किए कैसे जान गए कि सड़क के किनारे रहने वालों ने पत्थर बरसाए? अगर कुछ गैर-कानूनी बना हुआ था तो तनाव के दौरान ही ढहाए जाने की सुध कैसे आई? क्या उन्हें जवाब देने का मौका दिया गया? ऐसे निजाम से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि जिनके घर और आजीविका के साधन उजाड़ दिए गए, उनके लिए पुनर्वास के संवैधानिक तकाजे का पालन करे। 

सुप्रीम कोर्ट को इस या ऐसे मामलों में और कड़ा रुख अपनाना चाहिए था, शायद वह अपनाए भी, लेकिन यह हमारी उन संस्थाओं की सुस्ती का भी नतीजा है, जिन पर हमारे संविधान और लोगों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी है। ऐसी कई मिसालें हैं कि अदालतें, चुनाव आयोग और दूसरी संस्थाएं सही वक्त पर दखलंदाजी नहीं करतीं या फिर सत्तारूढ़ लोगों के इशारे पर चल रही हैं। हर ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाना मीडिया की भी जिम्मेदारी है, क्योंकि उससे भी लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है। लेकिन ज्यादातर, खासकर टीवी मीडिया तो सरकार का पिछलग्गू बन गया है या बना दिया गया है।

सवाल है कि यह सब क्यों हो रहा है तो इसका सीधा जवाब है कि देश में 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट' की तरह 'नॉन-परफॉर्मिंग गवर्नमेंट' की हुकूमत चल रही है। महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है, बेरोजगारी बेपनाह हो गई है। दलील यह दी जाती है कि कोविड महामारी और हाल में रूस-यूक्रेन युद्घ की वजह से अंतरराष्ट्रीय संकट की वजह से हुआ। लेकिन महामारी के पहले ही सरकार नोटबंदी और गलत-सलत जीएसटी से अर्थव्यवस्था को पलीता लगा चुकी थी। यह तो सरकारी आंकड़े ही गवाही देते हैं, जबकि ये आंकड़े भी भरोसे लायक नहीं हैं। आयातित कच्चे तेल के दाम तो अब बढ़े हैं लेकिन सरकार तो तब से लोगों की जेब काट रही है, जब तेल के दाम काफी कम थे। तो, इन नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए लोगों को धर्म के नाम पर नफरत की अफीम चटाई जा रही है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि दूसरों के लिए खाई खोदने वाले भी उसी खाई में तबाह हो जाते हैं।

धर्म आपको ऐसी नफरत और हिंसा की इजाजत कहां देता है। मैं बेहद धर्मपारायण व्यक्ति हूं। मेरे गृह प्रदेश में सुल्तानगंज में गंगा उत्तरायण हो जाती हैं, वहां से जल लेकर पैदल लोग करीब सौ मील दूर वैद्यनाथ धाम में शिव जी को चढ़ाते हैं। मैं अपने शारीरिक सामर्थ्य के दिनों में लगातार पांच साल वह यात्रा करता रहा और आज भी पूजा-अर्चना करता हूं। अब मुझे कोई कहे कि मैं हिंदू-विरोधी हूं तो मैं कैसे सह सकता हूं। असल में जो ऐसा कहते हैं, वे ही धर्म और राष्ट्र विरोधी हैं।

परेशानी यह है कि विपक्षी पार्टियों के पास उनके इस नैरेटिव की आज कोई काट नहीं दिख रही है। जो नेता सॉफ्ट हिंदुत्व से इसका विरोध करना चाहते हैं, वे भूल रहे हैं कि यह उनके जाल में फंसने जैसा है। इससे निपटने के लिए ऐसा नैरेटिव गढ़ना होगा, जो लोगों को नफरती अफीम के असर से निकाल कर वास्तविक मुद्दों की ओर ले आए। उन्हें मौजूदा सरकार की नाकामियों और ज्यादतियों का ध्यान दिलाए, अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने और रोजगार सृजन की राह दिखाए।

लेकिन विपक्ष के पास न कोई ऐसा नैरेटिव है, न अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने का कोई व्यापक तंत्र। विपक्ष बिखरा-बिखरा है, उसकी एकजुटता का कोई संकेत फिलहाल नहीं मिल रहा है। सब अपने-अपने सियासी घेरे में कैद हैं। उन्हें बड़ी समस्या नहीं दिख रही है। सबसे मुश्किल कांग्रेस के साथ है। क्षेत्रीय पार्टियां तो अपने-अपने इलाके में चुनौती दे सकती हैं लेकिन जब तक कांग्रेस में खड़े होने की ताकत नहीं दिखेगी, मौजूदा हुकूमत को चुनौती मिलनी मुश्किल है। दरअसल लगभग 200 संसदीय सीटों पर कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है और यही इलाका भाजपा के सीड बेल्ट (उर्वर भूमि) की तरह बना हुआ है, यहीं चुनौती मिलने से भाजपा कमजोर हो सकती है। इसलिए मौजूदा हुकुमत को चुनौती के लिए कांग्रेस का मजबूत होना जरूरी है। इसी इलाके को अपने पाले में बनाए रखने के लिए धर्म की नफरती अफीम की खुराक लगातार बढ़ाई जा रही है। लेकिन उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। संभावनाओं और विकल्प का अकाल नहीं है, बस सही तरीके से पेश करने की जरूरत है, ताकि लोकतंत्र और देश बचा रहे।

(पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा वरिष्ठ राजनेता। जैसा उन्‍होंने हरिमोहन मिश्र को बताया)

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