Home नज़रिया चंद्रास्वामी के बिना अधूरी राव-गाथा

चंद्रास्वामी के बिना अधूरी राव-गाथा

आलोक मेहता - JUL 01 , 2016
चंद्रास्वामी के बिना अधूरी राव-गाथा
चंद्रास्वामी के बिना अधूरी राव-गाथा
गूगल

इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, सोनिया गांधी ही नहीं, भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह और अन्य हिंदू संगठनों के नेताओं के साथ रहे संबंध, तनाव, टकराव और विश्वासघात से जुड़े नए-पुराने तथ्य उजागर हुए हैं। 32 वर्षीय शोधकर्ता को परिजनों ने उनके पास उपलब्ध राव के जीवनकाल के कई दस्तावेज, पत्र-व्यवहार भी उपलब्ध करा दिए। इसलिए उनकी प्रामाणिकता मानी जा सकती है। इंदिरा गांधी के सत्ताकाल में राव को मुख्यमंत्री, कांग्रेस महासचिव, विदेश मंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद मिले। जब उन्हें आंध्र के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो वह निराश और नाराज रहे। राष्ट्रीय राजनीति में महत्व मिलने का उन्होंने पूरा लाभ उठाया। उनके गृह मंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या हुई, फिर भी नैतिक जिम्मेदारी के नाते उन्होंने इस्तीफे की पहल नहीं की। यही नहीं, राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर भी वह मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभालने के साथ कांग्रेस राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। बोफोर्स कांड से राजीव गांधी के हटने और वी.पी. सिंह-चंद्रशेखर के आने के बाद उनकी राजनीतिक निष्क्रियता के कारण 1991 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। दावा किया जाता है कि दु:खी ‘नरसिंह’ ने तब राजनीति से संन्यास लेकर दक्षिण के किसी मठ में जाकर रहने तक का विचार कर लिया था। चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या हो जाने एवं कांग्रेस की विजय के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें बुलाकर कांग्रेस संसदीय दल के नेता के रूप में प्रधानमंत्री पद दिलवा दिया। इस तरह इंदिरा, राजीव, सोनिया से उन्हें सर्वाधिक राजनीतिक लाभ और सर्वोच्च पद मिले। लेकिन दो वर्षों में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने एवं आर्थिक मामलों पर अधिकार रखने वाले मनमोहन सिंह के जरिये उदार आर्थिक नीतियां अपनाकर विश्व बैंक-अमेरिका-यूरोप को प्रभावित करने के साथ उन्होंने सोनिया से दूरी बना ली। इसका नतीजा हुआ कि कांग्रेस के पुराने नेता नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह इत्यादि ने विद्रोही तेवर अपना लिए। इसी संदर्भ में नई पुस्तक के शोधकर्ता को राव के निजी रिकॉर्ड में इंटेलीजेंस ब्यूरो के वे कागजात भी मिले, जिनसे यह पुष्टि हुई कि उन्होंने असंतुष्ट कांग्रेसियों और सोनिया गांधी की जासूसी भी करवाई। सत्ता में बने रहने के लिए वह सुनिश्चित करना चाहते थे कि असंतुष्टों के पास कितने सांसदों का समर्थन है और क्या वे उन्हें हटा सकते हैं? स्वाभाविक था कि चुने गए अधिकांश सांसद सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस में बने रहे। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने का मुद्दा, आर्थिक नीतियों में बदलाव, हर्षद मेहता शेयर घोटाला, जैन हवाला कांड इत्यादि के साथ सांप्रदायिक मुद्दों पर प्रतिपक्ष अधिक उलझा और बंटा रहा। राव ने 1996 के चुनाव में विजय और पुन: प्रधानमंत्री पद पाने के लिए प्रगतिशील विचार, उदार आर्थिक व्यवस्था, हिंदू कार्ड सहित हर राजनीतिक हथकंडा अपनाया लेकिन पार्टी पराजित हो गई। बाद में भी सोनिया गांधी और कांग्रेस के पुराने दिग्गजों से उनके रिश्ते नहीं सुधरे। इसलिए उनके परिजन, समर्थक और अब इस नई किताब के लेखक इस बात को उठा रहे हैं कि भारत में बड़े आर्थिक बदलाव करने वाले नरसिंह राव के साथ गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी ने सही व्यवहार और न्याय नहीं किया। उनके नाम पर कोई स्मारक इत्यादि नहीं बनाया गया।

सवाल यह उठता है कि इस शोधकर्ता ने भी परिजनों और राव के करीबी अधिकांश लोगों से बात की। लेकिन सोनिया गांधी और उनके नजदीकी सलाहकारों-समर्थकों से दोनों पक्षों के तनाव की गहराइयों का पता नहीं लगाया। नटवर सिंह सहित कुछ नेताओं, पत्रकारों और रिकॉर्ड के हवाले से यह विवरण दिया कि राजीव गांधी की हत्या की जांच में ढिलाई और दोषी हत्यारों को दंडित करने में देरी से सोनिया नाराज थीं। निश्चित रूप से यह मुद्दा छोटा नहीं था। इससे जुड़ा बड़ा प्रश्न यह भी कि लगभग चार सौ पृष्ठों की नई पुस्तक में राव के गुरु एवं सबसे बड़े सलाहकार चंद्रास्वामी के संबंध में केवल दो बार चार पंक्तियों में उल्लेख है। जबकि हम पत्रकारों तक को यह जानकारी रही है कि चंद्रास्वामी सत्तर के दशक से राव के करीब रहा। तंत्र-मंत्र के अलावा राजनीतिक जोड़-तोड़, हथियारों के सौदागरों से संबंधों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राव एवं उनकी सरकार के नाम पर सौदेबाजी में चंद्रास्वामी सर्वाधिक चर्चित रहा। गंभीर अपराध के आरोप के कारण उसे जेल भी जाना पड़ा, जिससे राव बहुत नाराज भी हुए। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग राजनीतिक हत्याओं में पर्दे के पीछे चंद्रास्वामी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाता रहा। इसलिए उसके कथित ‘पापों’ का लेखा-जोखा दिए बिना राव की राजनीतिक गाथा अधूरी ही मानी जाएगी। राजनीतिक घोटाले रहे हों या बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर कई धार्मिक नेताओं से वार्ता के दौरान भी चंद्रास्वामी के मध्यस्थ रहने के दावे सर्वविदित हैं। यही नहीं, राजीव गांधी के सत्ताकाल में भी जैल सिंह के साथ मुलाकातें और राजीव को हटवाने के षड़यंत्रों में भी चंद्रास्वामी की संदिग्ध भूमिका की चर्चा राव खेमा या उनके प्रशंसक शोधकर्ता नहीं कर रहे हैं। उम्मीद की जाए कि भारत में राजनीतिक हत्याओं के षड़यंत्रों पर भी गोपनीय सरकारी रिकॉर्ड एवं आरोप लगाने वाले लोगों से बातचीत करके नया शोध कार्य हो एवं उसे पुस्तक के जरिये सार्वजनिक किया जाए, ताकि आजादी के बाद के भारत का राजनीतिक इतिहास अधिक स्पष्ट एवं सबक देने वाला हो।