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महाराष्ट्र: मुखिया पर निर्भर महकमा

जूलियो रिबेरियो - APR 08 , 2021
महाराष्ट्र: मुखिया पर निर्भर महकमा
मुंबई में वझे का मामला छोटा नहीं, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत
जूलियो रिबेरियो

 “वरिष्ठता की अनदेखी पुलिस बल में अनुशासनहीनता को बढ़ावा देती है, जो सबके लिए नुकसानदेह”

देश की व्यापारिक राजधानी में हाल की घटनाओं से कोई अगर इस खतरनाक निष्कर्ष पर पहुंचे कि मुंबई पुलिस पक्षपातपूर्वक काम करती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किसी भी पुलिस का काम उसके नेतृत्व यानी पुलिस आयुक्त के काम करने के तरीके और उनके चरित्र पर निर्भर करता है। अगर राजनैतिक नेतृत्व किसी छोटे अधिकारी से गैरकानूनी मांग करता है, तो एक ईमानदार और जिम्मेदार पुलिस नेतृत्व उसे ठुकरा सकता है।

थाने का प्रभारी पुलिस इंसपेक्टर होता है। उसके सबसे ज्यादा राजनीतिक दबाव में आने की गुंजाइश होती है। वह अपने करियर को देखते हुए आसानी से गैरकानूनी काम कराने वाले नेताओं के चंगुल में फंस जाता है। ऐसे में पुलिस नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसे लोगों से अपने मातहत अधिकारियों को सुरक्षा कवच दे।

आरोप है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) की सोशल सर्विस सेल के वरिष्ठ इंसपेक्टर संजय पाटिल और असिस्टेंट पुलिस इंसपेक्टर सचिन वझे (एनकाउंटर स्पेशलिस्ट) को घर बुलाकर हर महीने 100 करोड़ रुपये की वसूली करने का निर्देश दिया था। जाहिर है, ये पैसे उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मिलते जिसने उन्हें गृह मंत्रालय जैसा पद दिलाया है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने पद से हटाए जाने के बाद मुख्यमंत्री को लिखे आठ पन्ने के पत्र में यह आरोप लगाया है।

जब पाटिल और वझे ने गृहमंत्री की मांग के बारे में परमबीर को बताया था, यदि उसी समय वे गृहमंत्री से विरोध जताते या मुख्यमंत्री को पत्र लिखते, तो हो सकता है लोग उन्हें दोष नहीं देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने तब पत्र लिखा जब उन पर उचित कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए पद से हटा दिया गया।

63 एनकाउंटर करने वाले ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वझे पर आरोप है कि साल 2002 में पेशे से इंजीनियर ख्वाजा यूनुस की उनकी कस्टडी में मौत हो गई थी। इस वजह से 2004 में उन्हें निलंबित कर दिया गया और हत्या के आरोप लगे। हालांकि उसकी सुनवाई अभी तक शुरू नहीं हो पाई। वझे ने 2007 में दोबारा पुलिस सेवा में बहाली के लिए आवेदन किया। तब उनका आवेदन खारिज कर दिया गया। 2008 में वे शिवसेना में शामिल हो गए। ऐसा कर वे अपने उन बिजनेस की सुरक्षा चाहते थे जिनके कानूनी और गैर कानूनी होने के बीच केवल एक धुंधली रेखा थी।

जब उनका बिजनेस नहीं चला तो फिर बहाली के लिए आवेदन किया। इस बार तीन पार्टियों की सरकार में शिवसेना वरिष्ठ साथी थी। मदद करने वाला एक पुलिस कमिश्नर भी था। इसका फायदा वझे को मिला और नौकरी बहाल हो गई। वझे की बहाली में सबसे बड़ी अड़चन डीजीपी सुबोध जायसवाल थे। उन्हें उस दो सदस्यीय समिति से बाहर रखा गया, जिसे बहाली पर फैसला लेना था। इस तरह अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस आयुक्त परमबीर की समिति ने कोविड के लिए विशेष सेवाओं की जरूरत बताते हुए वझे की बहाली पर मुहर लगा दी।

जिस तरह एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को बहाल किया गया, उससे स्पष्ट है कि यह खेल राजनीतिक नेतृत्व का था। वझे को क्राइम इंटेलिजेंस विंग का प्रमुख नियुक्त किया गया। यह पद किसी वरिष्ठ इंसपेक्टर को दिया जाता है। वझे को यह पद देने का कुछ विरोध भी हुआ। लेकिन यह विरोध तब नाराजगी में बदल गई, जब वझे सीधे पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट करने लगे। वे एसीपी, डीसीपी, एडिशनल सीपी, ज्वाइंट सीपी (आईजी रैंक का अधिकारी) की अनदेखी कर रहे थे। इससे पुलिस बल का ढांचा प्रभावित हुआ और अनुशासनहीनता भी बढ़ी। एक असिस्टेंट पुलिस इंसेपक्टर का पुलिस कमिशनर को सीधे रिपोर्ट करना निश्चित तौर पर असामान्य घटना है, क्योंकि दोनों के बीच छह रैंक का अंतर होता है।

वरिष्ठता की अनदेखी का ऐसा उदाहरण मुझे केवल एक बार मिला जब दो सब-इंसपेक्टर वरिष्ठता की अनदेखी कर सीधे पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट कर रहे थे। उनका मुख्यमंत्री से भी दोस्ताना हो गया था। इस रिश्ते से भले ही पुलिस कमिश्नर को कुछ समय के लिए फायदा हुआ हो, लेकिन जब मुख्यालय में परेड के दौरान पुलिसकर्मी बगावत पर उतर आए और उन्हें परेड में जाने से रोक दिया, तो अंत में उन्हें अपमानित होकर पद छोड़ना पड़ा।

मुंबई पुलिस का शानदार इतिहास रहा है। लेकिन मौजूदा प्रकरण चतुर राजनीतिक शरद पवार के लिए एक सबक है। परमबीर को कमिश्नर बनाए जाने से पहले पवार के साथ उनकी दो मैराथन बैठकें हुई थीं। सवाल उठता है कि कैसे इस मास्टर रणनीतिकार से फैसला लेने में चूक हुई?

उस समय ठाणे और पुणे के दो उत्कृष्ट कमिश्नर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। वे बहुत अच्छे विकल्प थे, लेकिन उनकी अनदेखी की गई। नियुक्तियों की पैरवी करने वाली अधिकारियों की लॉबी को हमेशा दरकिनार किया जाना चाहिए, लेकिन महाराष्ट्र विकास आघाडी सरकार ने इस सिद्धांत को ही दरकिनार कर दिया। इसका परिणाम लॉबिंग करने वाले, गलत निर्णय लेने वाले, मुंबई पुलिस और महानगर के वासी, सबके लिए विनाशकारी रहा।

घाव भरने में समय लगेगा। डीजीपी जायसवाल, जिन्हें वझे की बहाली के समय बाहर रखा गया था, अगर होते तो परिस्थितियां बेहतर होतीं। वे अपने हर अधिकारी की खासियत जानते हैं। उनकी सिफारिशों की अनदेखी की गई। यहां तक कि उन पर ट्रांसफर में दखल देने का आरोप लगाया गया। इससे वे इतना निराश हुए कि केंद्र में प्रतिनियुक्ति मांग ली। वैसी क्षमता वाले अधिकारी को पाकर केंद्र को खुश होना चाहिए, जिसे उनका गृह राज्य नहीं चाहता हो।

(लेखक मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे चुके हैं, यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

 



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