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बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 51 वर्षों के बाद सरकार का यूटर्न?

अश्विनी राणा - JUL 19 , 2020
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 51 वर्षों के बाद सरकार का यूटर्न?
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण
अश्विनी राणा

19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश के 14 प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया था। साल 1969 के बाद 1980 में पुनः 6 बैंक राष्ट्रीयकृत हुए थे। 19 जुलाई 2020 को बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 51 वर्ष पूरे हो गए ।  दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में केंद्रीय बैंक को सरकारों के अधीन करने के विचार ने जन्म लिया । उधर, बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का राष्ट्रीयकरण हुआ, इधर, भारतीय रिज़र्व बैंक के राष्ट्रीयकरण की बात उठी जो 1949 में पूरी हो गयी। फिर 1955 में इम्पीरियल बैंक, जो बाद में ‘स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया’ कहलाया, सरकारी बैंक बन गया।

आर्थिक तौर पर सरकार को लग रहा था कि कमर्शियल बैंक सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे थे। उस  समय देश के 14 बड़े बैंकों के पास देश की लगभग 80 फीसदी पूंजी थी। इनमें जमा पैसा उन्हीं सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था, जहां लाभ के ज़्यादा अवसर थे। वहीं सरकार की मंशा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात में निवेश करने की थी। दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रूपया डूब गया था। उधर, कुछ बैंक काला बाज़ारी और जमाखोरी के धंधों में पैसा लगा रहे थे। इसलिए सरकार ने इनकी कमान अपने हाथ में लेने का फैसला किया ताकि वह इन्हें सामाजिक विकास के काम में भी लगा सके।
19 जुलाई, 1969 को एक आर्डिनेंस जारी करके सरकार ने देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। जिस आर्डिनेंस के ज़रिये ऐसा किया गया वह ‘बैंकिंग कम्पनीज आर्डिनेंस’ कहलाया. बाद में इसी नाम से विधेयक भी पारित हुआ और कानून बन गया। राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में बढ़ोतरी हुई। शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए। आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई 1969 को देश में बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं। 2020 के आते आते यह आंकड़ा लगभग एक लाख का हो गया।

इसका यह फ़ायदा हुआ कि बैंकों के पास काफी मात्रा में पैसा इकठ्ठा हुआ और आगे बतौर क़र्ज़ बांटा गया। प्राथमिक सेक्टर, जिसमें छोटे उद्योग, कृषि और छोटे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स शामिल थे, को फ़ायदा हुआ। सरकार ने राष्ट्रीयकर्त बैंकों को दिशा निर्देश देकर उनके लोन पोर्टफ़ोलियो में 40 फीसदी कृषि लोन की हिस्सेदारी की बात की।

दूसरी तरफ़, अपना टार्गेट और व्यक्तिगत लाभ के चलते, आंख बंद करके पैसा बांटा गया। जिससे बैंको का एनपीए बढ़ा. आज 2020 में सरकारी बैंकों का यह डूब रहा पैसा 10 फीसदी से ऊपर है। फ़ायदा लेने वालों में रसूखदार ही थे। छोटे किसान या व्यापारी हाशिये पर खड़े रह गए। बैंकिंग को गांवों तक पहुँचने के उदेश्य से 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई। शुरू में इनकी संख्या 5 थी जो बढ़कर 196 हो गई लेकिन इनके मर्जेर की प्रकिर्या में आज देश में 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं जिनकी लगभग 22000 शाखाएं हैं। 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला जिसमें और छह निजी बैंकों को सरकारी कब्ज़े में लिया गया। इसके विपरीत 1994 में नये प्राइवेट बैंकों का युग प्रारम्भ हुआ । आज देश में 8 न्यू प्राइवेट जनरेशन बैंक काम कर रहे हैं। 2018 में सरकार ने इण्डिया पोस्ट पेमेंट बैंक की स्थापना की जिसका मकसद पोस्ट ऑफिस के नेटवर्क का इस्तेमाल करके बेंकिंग को गाँव गाँव तक पहुंचना था । इसके साथ साथ और कई प्राइवेट पेमेंट बैंकों की भी शुरुआत हुई ।
यदि कुल मिलाकर देखा जाये तो ये बैंकों का राष्ट्रीयकरण न होकर सरकारीकरण ज्यादा हुआ। कांग्रेस की सरकारों ने बैंकों के बोर्ड में अपने राजनैतिक लोगों को बिठाकर बैंकों का दुरूपयोग किया। जो लोग बोर्ड में बैंकों की निगरानी के लिए बेठे थे उन्होंने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बैंकों का भरपूर इस्तेमाल किया। बैंक यूनियंस के जो नेता बोर्ड में शामिल हुए उन्होंने भी बैंक कर्मचारियों का ध्यान न करते हुए बोर्ड मेम्बेर्स की साजिश में शामिल हो गये, जिसके कारण आज बैंकों की यह दुर्दशा हो गई हे कि ओपरेटिव प्रॉफिट कमाने के बाद भी बैंक घाटे में चल रहे हें।
यदि वास्तव में बैंकों में सुधार और बैंकों को आम जनता तक पहुँचाने का काम किसी सरकार ने किया है तो वह मोदी सरकार द्वारा किया गया है। 45 वर्षों में जो बैंक आम जनता तक नहीं पहुंच पाए थे सरकार ने लगभग 35 करोड़  जनधन खाते खुलवाकर आम जनता को बैंकों से जोड़ा है। बैंकों से लोन लेकर वापिस नहीं करने वाले लोगों पर भी नये और सख्त कानूनों के द्वारा रिकवरी प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है। हाल ही में सरकार ने एक अध्यादेश के द्वारा कोपरेटिव बैंकों को भी रिजेर्व बैंक के अधीन कर दिया है, जो की एक उचित कदम है लेकिन अभी और बहुत से सुधारों की जरूरत है।
मोदी सरकार के बैंकों से जुड़े फैसले जनधन खाते खोलना, मुद्रा लोन, प्रधान मंत्री बीमा योजना, अटल पेंशन योजना सभी योजनाओं का क्रियान्वयन इन बैंकों ने उत्साह से किया है। सबसे अभूतपूर्व कार्य नोटबन्दी के 54 दिनों मे इन बैंकों ने करके दिखाया। देश के सरकारी तन्त्र की कोई भी इकाई (सेना को छोड़कर) 36 घंटे के नोटिस पर ऐसा काम नहीं कर सकती जैसा इन सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने कर दिखाया। 

ओर इन सभी के बीच यदि कोई वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है तो वह है बैंक कर्मचारी। बैंकों में काम तो बड़ा है और कर्मचारी ईमानदारी से सरकार की सभी योजनाओं को भी लागू कर रहे हैं लेकिन काम के फलस्वरूप जहाँ एक ओर बैंक कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है वहीँ उनको काम के बदले सही वेतन और सुविधाएं नहीं मिलती। पहले नोट बंदी के दोरान दिन रात काम करने के बाद भी किसी प्रकार का प्रोत्साहन बैंक कर्मचारियों को नहीं दिया गया और अब कोरोना महामारी के बीच जिस प्रकार बैंक कर्मचारी अपना दायित्व निभा रहे हैं उसका भी कोई जिक्र सरकार नहीं कर रही है। और तो और बैंक कर्मचारियों का वेतन समझौता जो कि 1 नवम्बर 2017 से लंबित है, नहीं मिल पा रहा है।

केन्द्र सरकार ने सबसे पहले 2008 में स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, 2010 में स्टेट बैंक ऑफ़ इंदौर और 2017 में बाकि पांच एसोसिएट बैंकों का स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया में विलय के बाद 2019 में तीन बैंकों, बैंक ऑफ़ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक का विलय तथा 1 अप्रैल 2020 से 6 बैंक सिंडीकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंक का अस्तित्व समाप्त हो गया है । इन बैंकों को 4 बैंकों में मर्जर कर दिया गया है । जो 4 बैंक होंगे केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया1 अप्रैल 2020 से 6 बैंक सिंडीकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंक का अस्तित्व समाप्त हो गया है । इन बैंकों को 4 बैंकों में मर्जर कर दिया गया है । जो 4 बैंक होंगे केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया। इसके मुताबिक सरकारी क्षेत्र के 12 बैंक रह जायेंगे । सरकार का कहना है की आज के समय में छोटे छोटे बैंकों की आवश्यकता नहीं है बल्कि 6 से 7 बड़े बैंकों की आवश्यकता है क्योंकि ज्यादा बैंक होने से आपस में ही पर्तिस्पर्धा के कारण टिक नहीं पा रहे हैं और एन.पी.ए. से निपटने में भी नाकाम हो रहे हैं। सरकार के लिए भी इन बैंकों को पूंजी जुटाने में भी दिक्कत हो रही है।

देश COVID-19 की अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा का सामना कर रहा है। बैंक इन परिस्थितियों में आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के लिए अपनी सेवाओं में योगदान दे रहे हैं और आवश्यक व्यक्तियों जैसे पी.एम.जे.डी.वाई महिलाओं के खाते, विभिन्न प्रकार के पेंशनभोगी, उधारकर्ताओं और एम.एस.एम.इ. को ऋण सुविधाओं की आवश्यकता को वित्तीय सहायता देने में सरकार की मदद कर रहे हैं। सरकार ने इस महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिय जो आर्थिक पैकेज की घोषणा की है उस को प्रभावी तरीके से लागू करने में  सरकारी बैंकों का बहुत बड़ा योगदान है। एसे में यदि सरकार 51 वर्षों के बाद इन बैंकों के साथ बार बार नये नये प्रयोग करके यदि फिर से निजीकरण की और बढ़ती है तो अच्छा नहीं होगा। इसकी जगह सरकार को इन सरकारी बैंकों को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। साथ ही कोरोना जैसी आपदा के समय बैंकिंग सुविधाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए क्या सुधार किये जा सकते हैं जिससे कर्मचारियों को भी कम से कम जोखिम में डालते हुए बैंकिंग सेवाएं चालू रखी जा सकती हैं।

(लेखक नेशनल आर्गेनाईजेशन ऑफ़ बैंक वर्कर्स के पूर्व महासचिव  हैं।  लेख में छपे विचार उनके निजी हैं।)

 

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