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हमारी तरजीह घटने के मायने

बिश्वजीत धर - JUN 13 , 2019
हमारी तरजीह घटने के मायने
व्यापारिक कूटनीतिः अमेरिका के निशाने पर भारतीय बाजार
पीटीआइ
बिश्वजीत धर
अमेरिका ने पांच जून को भारत के 3,600 से अधिक उत्पादों से शुल्क-मुक्त बाजार का दर्जा वापस ले लिया। भारत को अमेरिका की तरफ से यह सुविधा सामान्य तरजीही प्रणाली (जीएसपी) के तहत मिल रही थी। यह व्यवस्‍था 1971 में शुरू की गई थी, जिसके तहत 13 विकसित देश लाभार्थी विकासशील देशों के चुनिंद उत्पादों को शुल्क-मुक्त बाजार मुहैया कराते हैं। इसके लिए हर विकसित देश अपनी पसंद के हिसाब से लाभार्थी देशों का चयन करते हैं। इसका मकसद वैश्विक व्यापार में विकासशील देशों की की हिस्सेदारी बढ़ाने में उनकी मदद करना है।

हालांकि, अधिकांश विकसित देशों ने 1971 में जीएसपी की शुरुआत की, लेकिन अमेरिका ने 1974 के व्यापार अधिनियम के बाद 1976 में इस प्रणाली को स्वीकार किया। इसकी वजह है कि 1974 का व्यापार अधिनियम ही अमेरिकी राष्ट्रपति को “लाभार्थी विकासशील देशों से अमेरिका में आयातित कुछ योग्य उत्पादों के लिए शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध कराने के लिए” अधिकृत करता है। अमेरिका ने भारत को “लाभार्थी विकासशील देशों” की सूची से हटाने से पहले 104 देशों को जीएसपी का लाभ दिया।

1974 के व्यापार अधिनियम में किसी देश को लाभार्थी के रूप में चयन करने के लिए कई शर्तों को भी शामिल किया गया है, जिनमें ये प्रमुख है: (i) देश की ओर से चयन करने का अनुरोध, (ii) ऐसे देश के आर्थिक विकास का स्तर, (iii) अन्य प्रमुख विकसित देश अपनी जीएसपी योजना का दायरा उस देश तक बढ़ाते हैं या नहीं और (iv) संबंधित देश ने अमेरिका को अपने बाजार और बुनियादी जरूरत वाले संसाधनों के लिए न्यायसंगत और उचित पहुंच का आश्वासन दिया है। इन शर्तों ने अमेरिका को विशेषाधिकार दिया है, जिससे वह जीएसपी लागू करते समय चुनिंदा विकासशील देशों पर मेहरबानी कर सकता है। इसके अलावा, अधिनियम में एक तंत्र का भी प्रावधान है, जिसका उपयोग यह समीक्षा करने के लिए किया जाना है कि लाभार्थी विकासशील देशों के उत्पाद जीएसपी के लाभों को कब तक ले सकते हैं। इन्हीं प्रमुख तंत्रों में एक प्रतिस्पर्धात्मक आवश्यक सीमाएं (सीएनएल) है। इसमें कहा गया है कि सीएनएल अधिक होने पर कोई भी लाभार्थी विकासशील देश किसी भी उत्पाद पर अपनी जीएसपी पात्रता खो सकता है। सीएनएल के लिए दो मापदंड हैं: (i) किसी कैलेंडर वर्ष के दौरान लाभार्थी विकासशील देश के किसी विशेष उत्पाद का अमेरिका में 50 प्रतिशत या उस उत्पाद के कुल आयात के मूल्य से अधिक का अमेरिका में आयात या (ii) एक निश्चित डॉलर वैल्यू से अधिक हो। जीएसपी के नियमों के अनुसार, डॉलर-वैल्यू की सीमा में सालाना 50 लाख डॉलर की वृद्धि की जाती है। 2017 में इसकी निर्धारित सीमा 18 करोड़ डॉलर की गई थी।

पिछले साल से ही ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि ट्रंप प्रशासन भारत को जीएसपी के तहत मिलने वाले लाभ से वंचित करने की दिशा में कदम उठा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने 30 अक्टूबर 2018 को 1 नवंबर 2018 से जीएसपी-योग्य उत्पादों की सूची से 16 देशों के 94 उत्पादों को बाहर करने की घोषणा की। यह हाल के वर्षों में जीएसपी से बाहर किए गए उत्पादों की सबसे बड़ी संख्या थी। सूची से बाहर किए गए 50 उत्पाद ऐसे थे, जिसका भारत मुख्य लाभार्थी था। जिन 16 देशों ने जीएसपी का दर्जा गंवाया, उनमें से भारत के उत्पादों की संख्या सबसे अधिक थी। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने मार्च 2019 में जीएसपी के तहत लाभार्थी विकासशील देश के रूप में भारत की मान्यता खत्म करने की मंशा जाहिर की थी, क्योंक यह ‘वैधानिक योग्यता मानदंडों’ का पालन नहीं कर रहा था। यूएसआरटीआर के मुताबिक, भारत को इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि यह अमेरिका को “विभिन्न क्षेत्रों में अपने बाजार में समान और उचित पहुंच मुहैया कराएगा” के वादे को पूरा करने में विफल रहा। यह 60 दिनों की उस अनिवार्य अवधि की शुरुआत थी, जिसे अंतिम फैसला लेने से पहले दिए जाने की आवश्यकता है कि किसी देश को लाभार्थियों की सूची में रखना है या नहीं। आखिरकार, राष्ट्रपति ट्रंप ने 31 मई को अमेरिकी जीएसपी कार्यक्रम से भारत को लाभार्थी देश के रूप में हटाने का फैसला किया, जो 5 जून से प्रभावी हो गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति का फैसला 2018 के अप्रैल महीने में यूएसटीआर की ओर से की गई पात्रता समीक्षा पर आधारित था। यह समीक्षा जीएसपी बाजार पहुंच के मानदंड और भारत की अमेरिकी प्रतिबद्धता संबंधी ‘चिंताओं’ पर की गई थी। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि इसी मानदंड से संबंधित दो याचिकाएं और थीं। अमेरिकी डेयरी उद्योग और अमेरिकी मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (एडवांस्ड मेडिकल टेक्नोलॉजी एसोसिएशन) ने याचिका दायर कर यूएसटीआर को भारत से लाभार्थी देश की मान्यता वापस लेने का अनुरोध किया था, ताकि उन भारतीय व्यापारों पर पाबंदी लगाई जाए, जो अमेरिकी निर्यात को प्रभावित कर रहे थे। दूसरी याचिका मूल्य नियंत्रण को लेकर थी, जिसे भारत सरकार ने स्टेंट और घुटना प्रत्यारोपण के उपकरणों को देश में सस्ता बनाने के इरादे से लागू किया था।

भारत को जीएसपी के लाभार्थियों की सूची से हटाने की ये वजहें शायद ही ठोस लगती हैं। यह स्पष्ट रूप से ट्रंप प्रशासन की ओर से भारतीय बाजार को निशाना बनाने के लिए अपनाई गई एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अकसर भारत को ‘बेहद उच्च-टैरिफ वाला देश’ बताते हुए इससे होने वाले अमेरिकी ‘नुकसान’ की बात की है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत के खिलाफ और कदम उठाए जाएंगे, जिसके तहत “सुरक्षात्मक उपाय के रूप में घरेलू उद्योगों या सीधे प्रतिस्पर्धी उत्पादों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने वाले आयातित उत्पादों” को लागू करना शामिल है। राष्ट्रपति ट्रंप ने 31 मई की अपनी घोषणा में इनका जिक्र भी किया था।

अमेरिका की ओर से जीएसपी लाभार्थी देशों की सूची से भारत को हटाने के क्या निहितार्थ हैं? अमेरिकी कांग्रेस के लिए किए गए शोध के अनुसार, 2018 में भारत सबसे बड़ा लाभार्थी विकासशील देश था, जिसका जीएसपी के तहत अमेरिकी आयात में भागीदारी 25 फीसदी से अधिक थी। अप्रैल-फरवरी 2018-19 के दौरान भारतीय निर्यात में जीएसपी लाभार्थी उत्पादों का हिस्सा 15 अरब डॉलर था, जो अमेरिका को होने वाले कुल भारतीय निर्यात का करीब एक-तिहाई है। छह क्षेत्र रत्न और आभूषण, इलेक्ट्रिकल और गैर-इलेक्ट्रिकल मशीनरी, रसायन, ऑटो उपकरण और लौह तथा इस्पात उत्पाद मुख्य लाभार्थी थे, क्योंकि हर क्षेत्र में एक अरब डॉलर से अधिक का निर्यात होता था। अब इन उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रवेश के लिए टैरिफ देना होगा। यह उल्लेख किया जा सकता है कि इन उत्पादों पर टैरिफ एक-चौथाई यानी तीन फीसदी से कम है, जिसे आमतौर पर ‘बेमानी टैरिफ’ कहा जाता है, क्योंकि वे प्रभावी रूप से घरेलू उद्योगों को कोई सुरक्षा मुहैया नहीं करते हैं। लेकिन ये टैरिफ निर्यातकों को प्रक्रियागत औपचारिकता के मामले में बड़ा ‘नुकसान’ पहुंचा सकते हैं, जिससे अमेरिकी निर्यात की लेन-देन की लागत में वृद्धि होगी। यह भारतीय व्यापार के लिए महंगा साबित हो सकता है, क्योंकि ऐसी उम्मीदें हैं कि अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध की वजह से भारत बहुत बड़ा संभावित लाभार्थी हो सकता है।

आदर्श स्थिति में भारत को द्विपक्षीय वार्ता के जरिए इस मुद्दे को हल करने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि, पिछले कुछ महीने में दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत से पता चलता है कि भारत अमेरिकी मांगों को आसानी से पूरा नहीं कर सकता है। अमेरिका चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य नियंत्रण को सरल करने के साथ कृषि उत्पादों, डेयरी और पोल्ट्री में बाजार पहुंच बढ़ाने की मांग कर रहा है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र भारतीय घरेलू बाजार के लिए महत्वपूर्ण है और सरकार राष्ट्रीय हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। मोदी सरकार की असली परीक्षा अपने सबसे महत्वपूर्ण साझीदार देश से पैदा हुई इस चुनौती को हल करने में होगी।

(लेखक सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज ऐंड प्लानिंग, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं)

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