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अनुच्छेद 370 से ही तो है कश्मीर अभिन्न

फैजान मुस्तफा - MAR 22 , 2019
अनुच्छेद 370 से ही तो है कश्मीर अभिन्न
पहचान की खातिरः अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर में बनाए रखने के लिए प्रदर्शन करतीं नेशनल कॉन्फ्रेंस की महिला कार्यकर्ता
पीटीआइ
फैजान मुस्तफा
“संघीय ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि विविधता को भी बचाए रखा जाए”

अमेरिका के संघीय ढांचे की सबसे अहम विशेषता तत्कालीन 13 ब्रिटिश उपनिवेशों के बीच हुआ वह समझौता था जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका का गठन हुआ। हमारे सुप्रीम कोर्ट ने भी 1962 में भारतीय संघ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में भारत के मजूबत संघीय ढांचे के लिए राज्यों के बीच हुए समझौते को सबसे अनिवार्य बताया था। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि यह विशेषता हमारे संविधान में नहीं है, इसलिए भारत संघीय व्यवस्था वाला देश नहीं है। बाद में 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संघीय ढांचे को भारतीय संविधान का मूल आधार मानते हुए फैसला दिया। इसी के तहत अनुच्छेद 370 हमारे संघीय ढांचे का अहम हिस्सा है। अनुच्छेद 370 वास्तव में इस समझौते को दर्शाता है।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में ब्रिटिश भारत के तहत आने वाले क्षेत्रों को दो देशों के रूप में विभाजित करता है। इसी के तहत 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए। लेकिन उस समय 546 रियासतें, जो ब्रिटिश भारत के साथ समझौते के तहत अधीनता स्वीकार कर चुकी थीं, उनकी संप्रभुता 15 अगस्त 1947 के बाद बहाल हो गई। उस वक्त इन रियासतों को तीन विकल्प दिए गए थे। पहला यह कि ये रियासतें स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रह सकती हैं, दूसरे, वे भारत के साथ मिल जाएं और तीसरे, वे पाकिस्तान के साथ मिल जाएं। धारा 6 ए के अनुसार रियासतें विलय समझौते के जरिए अपने पसंद के देश का हिस्सा बन सकती थीं। हालांकि विलय की शर्तें क्या होंगी, यह तय नहीं किया गया था। धारा (2) राज्यों को यह अधिकार देती थी कि राज्य विलय की शर्तें तय कर सकते हैं। उसके आधार पर संसद को राज्य के लिए कानून बनाने का अधिकार होगा। साथ ही राज्य की विधायिका अपना अधिकार क्षेत्र भी तय कर सकती है।

कुल मिलाकर रियासतों का भारत या पाकिस्तान के साथ विलय की शर्तें ठीक उसी तरह तय होनी थीं जैसे दो देशों के बीच समझौते लागू होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार दो राज्यों के बीच हुए समझौते का सम्मान होना चाहिए। अगर समझौते का उल्लंघन होता है तो कानून यही कहता है कि दोनों मूल स्थिति में पहुंच जाएंगे। कश्मीर के मामले में राजा हरि सिंह ने शुरू में स्वतंत्र रहने का फैसला किया था। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंड स्टिल समझौते की पहल की। उस समझौते का मकसद था कि उन्हें भारत या पाकिस्तान में विलय करने के लिए कुछ और समय मिल जाए। पाकिस्तान ने इस समझौते को स्वीकार करते हुए वहां डाक और टेलीग्राफ सेवा शुरू की। लेकिन जब कश्मीर पर अफरीदियों, स्थानीय जनजातियों और बिना वर्दी पहने पाकिस्तान की सेना ने आक्रमण कर दिया, उस वक्त हरि सिंह ने मदद के लिए भारत का दरवाजा खटखटाया। इस मौके पर हमने अपनी सेना उसी शर्त पर भेजने का फैसला किया, जब हरि सिंह कश्मीर का भारत में विलय करते। ऐसी परिस्थिति में 26 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला की सलाह पर विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। उस समय स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की तरफ से 27 अक्टूबर 1947 को समझौते को मंजूरी दी।

विलय की शर्तों के तहत भारतीय संसद को यह अधिकार मिला कि वह जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश मामले और संचार संबंधी कानून बना सकती है। कश्मीर विलय के समझौते के नियम-5 के तहत हरि सिंह ने यह शर्त रखी थी कि मेरे द्वारा तय की गई शर्तों में भारत सरकार उस वक्त तक बदलाव नहीं कर सकती है, जब तक संशोधनों को मैं स्वयं स्वीकार नहीं करता हूं। नियम-7 के तहत यह भी उल्लेख किया गया कि भविष्य में बनने वाले संविधान के जरिए कोई भी कानून समझौते की इस शर्त में रुकावट नहीं पैदा कर सकेगा। भारत की नीति स्पष्ट रूप से कहती थी कि जब विलय पर किसी तरह का विवाद होगा तो उस पर फैसला, केंद्र सरकार द्वारा किए गए एकतरफा फैसले से नहीं बल्कि राज्य के आम लोगों की इच्छा से होगा। विलय के समझौते को स्वीकार करते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने साफ तौर पर कहा था कि जब कश्मीर में कानून-व्यवस्‍था और शांति बहाल हो जाएगी और आक्रमणकारी भगा दिए जाएंगे, तो विलय का फैसला आम लोगों की राय से होगा। ऐसे में स्पष्ट है कि भारत ने कश्मीर विलय को पूरी तरह से तात्कालिक और अस्थायी समझौते के रूप में सम्मान दिया था।

कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला को 17 मई 1949 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वल्लभ भाई पटेल और एन. गोपालस्वामी अयंगर की सलाह से लिखे पत्र में कहा था कि कई मौकों पर सरदार पटेल और मैंने कहा है कि भारत की कश्मीर को लेकर जो तय नीति है उसके आधार पर जम्मू-कश्मीर का संविधान राज्य के प्रतिनिधियों वाली विधानसभा ही बनाएगी। इस बीच हरि सिंह ने 30 अक्टूबर 1947 को नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला को 22 अधिकारियों वाली आपात परिषद का प्रमुख बना दिया। उसके बाद 5 मार्च 1948 को उन्हें अपना प्रधानमंत्री बनाया। उसी दिन हरि सिंह ने यह भी ऐलान किया कि राज्य का एक संविधान बनाया जाएगा, जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इसके बाद नेहरू और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने शेख अब्दुल्ला को कई वर्षों तक बंदी बना कर रखा। बाद में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने भी कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त किया। भारतीय जनता पार्टी जो धारा 370 का विरोध करती है, उसने केंद्र में नेशनल कॉन्फ्रेंस और राज्य में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ मिलकर सरकार भी बनाई। ऐसे में सवाल है कि जब कश्मीर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सत्ता में था, तब अनुच्छेद 370 को खत्म करने का प्रस्ताव क्यों पारित नहीं किया गया?

विलय के समय जम्मू-कश्मीर सरकार ने मसौदे का जो ड्रॉफ्ट तैयार किया था, उस पर सहमति बनाने के लिए करीब पांच महीने तक बातचीत चलती रही। इसके बाद 27 मई 1949 को अनुच्छेद 306 ए, जो अब 370 है, पारित हुआ। संविधान सभा में प्रस्ताव पेश करते हुए एन.गोपालस्वामी अयंगर ने कहा था कि वैसे तो कश्मीर का विलय पूर्ण हो गया है, लेकिन जब राज्य में परिस्थितियां सामान्य हो जाएंगी तो हम जनमत संग्रह का मौका देंगे। उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर जनमत संग्रह भारत के पक्ष में नहीं होगा, तो हम कश्मीर को भारत से अलग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद 16 जून 1949 को शेख अब्दुल्ला और तीन सदस्य, भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में शामिल हुए। अयंगर ने 17 अक्टूबर 1949 को एक बार फिर दोहराया कि कश्मीर की विधायिका द्वारा तैयार किया गया अलग से संविधान और जनमत संग्रह हमारा वादा है। उसी दिन भारत की संविधानसभा द्वारा संविधान में अनुच्छेद 370 को भारत के संविधान में शामिल किया गया था। अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान के 21वें भाग का पहला अनुच्छेद है। इस भाग का शीर्षक है ‘अस्थायी, परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’। हालांकि अनुच्छेद 370 अस्थायी इसलिए था क्योंकि कश्मीर की संविधानसभा को अनुच्छेद 370 में बदलाव करने, खत्म करने और बनाए रखने का अधिकार था। कश्मीर संविधानसभा ने उसे कायम रखा।

अनुच्छेद 370 की एक व्याख्या यह भी की जाती है कि यह जनमत संग्रह तक अस्थायी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा केंद्र सरकार ने अपने ही सांसद के एक सवाल के लिखित जवाब में कहा है कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इसी तरह दिल्ली हाइकोर्ट ने 2017 में कुमारी विजयलक्ष्मी की याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका में उन्होंने अनुच्छेद 370 को अस्थायी बताते हुए कहा था कि इसे बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अस्थायी शब्द के बावजूद अनुच्छेद 370 को अस्थायी नहीं माना था। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में संतोष कुमार मामले में भी ऐतिहासिक कारणों से जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को स्वीकार किया था। 1969 में भी सुप्रीम कोर्ट ने संपत प्रकाश मामले में अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रवृत्ति वाला मानने से इनकार कर दिया था। उस वक्त पांच न्यायधीशों वाली बेंच ने कहा था कि अनुच्छेद 370 कभी खत्म नहीं हुआ।

जम्मू-कश्मीर की तरह भारत के दूसरे राज्य भी हैं जिन्हें विभिन्न प्रकार का विशेष दर्जा मिला हुआ है। नगालैंड में भी संसद का कोई भी कानून उस वक्त तक लागू नहीं हो सकता जब तक उसकी विधानसभा उसकी सहमति नहीं देती है। यह अधिकार धार्मिक, सामाजिक प्रथाएं, नगावासियों के पारपंरिक कानून और उसके पालन तथा इसी तरह भूमि और उसके संसाधनों के स्वामित्व और उनके हस्तांतरण के लिए मिलता है। यही नहीं, दीवानी और फौजदारी मामले में भी फैसलों का उसके पास विशेष अधिकार है। इसके अलावा एक अहम बात यह है कि ट्येनसांग जिले में नगालैंड विधानसभा द्वारा पारित कानून भी सीधे लागू नहीं होता है। ट्येनसांग मामले को लेकर अलग से एक मंत्री होता है। यानी राज्य में ही कई ऐसे क्षेत्र और जिले हैं जिन्हें ज्यादा स्वायत्तता मिली हुई है। ज्यादा स्वायतत्ता देने से संघीय ढांचा ज्यादा मजबूत होता है। वहीं, केंद्रीकरण ज्यादा होने से पृथकतावादी ताकतों को बढ़ने का मौका मिलता है। नगालैंड की तरह ही असम, मणिपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, सिक्किम आदि राज्यों को भी विशेष दर्जा मिला हुआ है। सिक्किम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समझौते तक ही मुद्दे को सीमित रखा है। संघीय ढांचे को बनाए रखने के लिए हमारा संविधान अलग-अलग राज्यों को अलग-अलग तरह की स्वायत्तता प्रदान करता है।

अनुच्छेद 370 में ही अनुच्छेद एक का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत के राज्यों की फेहरिस्त में जम्मू-कश्मीर को गिनता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 1964 में लोकसभा में कहा था कि अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान और कानून को कश्मीर में लागू करने का रास्ता है। जवाहरलाल नेहरू ने भी एक बार लोकसभा में स्वीकार किया था कि अनुच्छेद 370 को नरम किया गया है। भारत के संविधान को जम्मू-कश्मीर में लागू करने के लिए अनुच्छेद 370 का 48 बार इस्तेमाल किया गया। जम्मू-कश्मीर पर राष्ट्रपति के आदेशों को लागू करने के लिए भी अनुच्छेद 370 ही एक जरिया है, जिससे राज्य का विशेष दर्जा खत्म होता है। 1954 के एक फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर पर पूरी तरह से भारतीय संविधान को लागू किया जा चुका है, जिसमें संविधान संशोधन भी शामिल हैं। केंद्रीय सूची के 97 में से 94 विषय राज्य पर लागू होते हैं। इसी तरह संविधान के कुल 395 अनुच्छेद में से 260 अनुच्छेद राज्य पर लागू होते हैं। ठीक इसी तह 12 अनुसूचियों में से सात अनुसूचियां भी जम्मू-कश्मीर में लागू होती हैं। इसी तरह कश्मीर के संविधान के ज्यादातर अनुच्छेद भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के समान ही बने हुए हैं।

अनुच्छेद 35ए को भी कश्मीर विधानसभा की सिफारिशों पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा शामिल किया गया है। हालांकि यह भी सही है कि इसे अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन के जरिए संसद से पारित नहीं किया गया है। न्यायालय ने अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के आदेश को वैधानिक ठहराया है। अनुच्छेद 35ए स्थानीय निवासियों को राज्य के संसाधनों पर कुछ अधिकार देता है, जिससे राज्य के बाहर के पैसे वाले लोग उन संसाधनों का दोहन नहीं कर सकें। अनुच्छेद 35ए को 1973 के संघ के आधारभूत ढांचा सिद्धांत के अमल में आने से पहले लागू किया गया है। ऐसे में 1981 के वैमन राव मामले के अनुसार अनुच्छेद 35ए को आधारभूत ढांचे में बदलाव के आधार पर नहीं परखा जा सकता है।

भूमि की खरीद को लेकर अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर आदि राज्यों में कुछ हद तक प्रतिबंध है। मोदी सरकार एक बार फिर से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का लाभ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों के लिए लागू कर रही है। यह कदम भी अनुच्छेद 35ए को समाप्त करने की जगह उसको स्थापित कर रहा है। अभी तक हमने अनुच्छेद 370 के जरिए जम्मू-कश्मीर संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन किया है, जबकि अनुच्छेद 370 ऐसा अधिकार नहीं देता है। पंजाब में एक साल बाद भी राष्ट्रपति शासन लगा रहे, इसके लिए संविधान में 59वां, 64वां, 67वां और 68वां संशोधन किया गया। अनुच्छेद 370 को लागू करके ही हम जम्मू-कश्मीर में बिना संविधान संशोधन कर ऐसा कर पाए। इसी तरह अनुच्छेद 249 संसद को राज्य सूची के विस्तार का अधिकार देता है, जिसे हम राज्यपाल जगमोहन की सिफारिशों के जरिए अनुच्छेद 370 की वजह से लागू कर पाए।

इसके लिए कश्मीर विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित करने का इंतजार नहीं करना पड़ा। कुल मिलाकर एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अलावा धारा 370 में ऐसा कुछ नहीं है जो सवाल खड़े करे। वास्तव में अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर से ज्यादा हमारे लिए उपयोगी रहा है।

जम्मू-कश्मीर के संविधान का अनुच्छेद तीन उसे भारत का अभिन्न अंग मानता है। राज्य के संविधान की प्रस्तावना में भारतीय संविधान की संप्रभुता की तरह का कोई दावा नहीं किया गया है, बल्कि उसका संविधान भारतीय संघ और राज्य के मौजूदा संबंधों को परिभाषित करता है। इससे आगे बढ़कर यह भी कहा गया है कि राज्य के निवासी वहां के नागरिक नहीं, बल्कि राज्य के स्थायी निवासी हैं। जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बने रहने के लिए संविधान राज्य को कुछ स्वायत्तता देता है, जो संघीय भावना को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। ऐसे में अनुच्छेद 370 विलय के लिए बनी स्वायत्तता बनाए रखने के खातिर अमल में लाया गया है। जो लोग अनुच्छेद 370 को खत्म करना चाहते हैं उनका जोर एक समान कानून लागू करने पर है, न कि देश की अखंडता बनाए रहने पर। उन्हें यह एहसास नहीं है कि एकरूपता का लक्ष्य कश्मीर में करीब-करीब हासिल कर लिया गया है। किसी भी मामले में संघीय ढांचे को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि विविधता को भी बचाए रखा जाए।

(लेखक जाने-माने विधि विशेषज्ञ और एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं। यह उनके निजी विचार हैं)

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