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खतरा बड़ा, नीतिगत सुस्‍ती बढ़ाएगी संकट

कौशिक बसु - MAR 19 , 2020
खतरा बड़ा, नीतिगत सुस्‍ती बढ़ाएगी संकट
खतरा बड़ा, नीतिगत सुस्‍ती बढ़ाएगी संकट
कौशिक बसु

भले ही चीन में प्रतिदिन कोविड-19 कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या घटने लगी है, लेकिन चिंता की बात यह है कि दुनिया के दूसरे देशों में इसके मामले बढ़ते जा रहे हैं। दक्षिण कोरिया, इटली और ईरान में तो यह काफी गंभीर रूप ले चुका है। इस महामारी ने दुनिया में पैर पसार दिए हैं। इन परिस्थितियों में अगर वैश्विक स्तर पर इस पर जल्द नियंत्रण पा लिया जाता है तो भी इससे दुनिया को काफी आर्थिक क्ष्‍ाति पहुंचने वाली है। यह नुकसान नीति-निर्माताओं के अनुमान से कहीं ज्यादा होगा। साल 2009 में खड़े हुए वैश्विक आर्थिक संकट को दूर करने में अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। कोविड-19 ने जिस तरह से बिजनेस के माहौल को बिगाड़ा है, उससे निवेशकों की घबराहट बढ़ गई है। इन परिस्थितियों में कई लोगों को लगता है कि केंद्रीय बैंक 2008 जैसे कदम उठाकर चीजों को संभाल लेगा।

फेड रिजर्व पहले ही ब्याज दरों में 0.50 फीसदी की कमी कर चुका है। यह उसके द्वारा पूरे दशक में की गई सबसे बड़ी कटौती है। लेकिन उसका यह कदम अकेले कारगर नहीं हो सकता। क्योंकि जब तक कटौती को सहयोग देने वाली नीतियां नहीं आएंगी, तब तक ब्याज दरों में कटौती बाजार को भ्रम में डाले रखेगी। इसी वजह से ब्याज दरों में कटौती के ऐलान के तुरंत बाद शेयर बाजार में गिरावट का दौर शुरू हो गया। बाजार का यह दौर अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर बहुत कम बयां करता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था आपके या हमारे विश्वास और भरोसे पर नहीं चलती बल्कि वह वस्तुओं और सेवाओं की दुनिया से काम करती है। ऐसे में शेयर बाजार की गिरावट और निवेशकों की घबराहट कई बार उनकी खुद की भविष्यवाणी का पैमाना बन जाती है। इन परिस्थितियों में एक बात तो तय है कि जिस तरह वैश्विक आर्थिक संकट का खतरा बढ़ रहा है, उसे देखते हुए वैश्विक स्तर पर समग्र रूप से कदम उठाने की जरूरत है। इस समय मुझे भी नहीं पता कि वह समग्र कदम क्या होना चाहिए? शायद किसी को नहीं पता है, लेकिन हमें इसका रास्ता निकालना होगा।

इस वक्त विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बहुद्देशीय संगठनों को तुरंत एक 20 सदस्यीय कार्यदल का गठन करना चाहिए जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले अर्थशास्त्रियों, स्वास्थ्य और भू-राजनैतिक क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए। इस सी-20 को तय समय में संबंधित पक्षों के साथ बातचीत कर वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए न केवल गहराते संकट को समझना चाहिए, बल्कि उसको दूर करने के लिए क्या नीतियां होनी चाहिए, उसका भी खाका पेश करने की जिम्मेदारी दी जाए। सी-20 को पहली रिपोर्ट एक महीने के अंदर पेश करनी चाहिए जिसमें सरकारों द्वारा उठाए गए प्रारंभिक कदमों का विश्लेषण करने के साथ-साथ इस बात की भी संभावना तलाशनी चाहिए, कि इस सकंट को दूर करने में कैसे निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जा सकता है। उसके बाद हर महीने एक एजेंडे के साथ सी-20 को अपनी रिपोर्ट पेश करनी चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे प्रभावकारी नीतियां अमल में आने लगेंगी और उसका असर भी दिखने लगेगा। एक साल पूरा होने पर सी-20 कार्यदल को भंग कर दिया जाना चाहिए।

एक और बात समझनी होगी कि सी-20 कार्यदल ऐसे सेक्टर के लिए कुछ नहीं कर सकता, जिसे इस संकट की वजह से शुरुआती नुकसान हो चुका है। मसलन, पर्यटन क्षेत्र जिसे काफी ज्यादा नुकसान हुआ है और उस नुकसान पर कुछ नहीं किया जा सकता। उदाहरण के तौर पर इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का अनुमान है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से एयरलाइन सेक्टर को करीब 113 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। इसी तरह दुनिया के बड़े होटल ब्रांड्स के बिजनेस में भी गिरावट जारी है। हिल्टन समूह ने चीन में अपने 150 होटल बंद कर दिए हैं। इस फैसले की वजह से पूरे साल में समूह को 2.5-5 करोड़ डॉलर का नुकसान होने की आशंका है। अगर कोविड-19 संकट से निपटने में तीन से छह महीने भी लगते हैं तो मेरा मानना है कि अकेले चीन के पर्यटन क्षेत्र में 50 फीसदी की गिरावट देखने को मिल सकती है। साल 2018 में चीन का पर्यटन क्षेत्र करीब 277 अरब डॉलर का था। सी-20 इस तरह के शुरुआती झटके से उबरने में मदद कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो आर्थिक संकट अपने पांव गहराई तक नहीं पसार पाएगा। अगर संकट गहराया तो दूसरे प्रमुख क्षेत्रों में भी बेरोजगारी की समस्या आ जाएगी। अगर अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में मांग गिरती है तो सरकार बड़े पैमाने पर मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों का ऐलान कर आर्थिक सुधार के कदम उठा सकती है। इसके लिए केंद्रीय बैंक जहां ब्याज दरों में कटौती कर सकता है, वहीं सरकार अपने राजकोषीय घाटे को भी बढ़ा सकती है, जैसा कि महामंदी के दौर में किया गया था।

लेकिन इस समय इस तरह का कदम नुकसानदेह साबित हो सकता है, क्योंकि कोविड-19 का संकट 2008 जैसा नहीं है। इस समय जहां कई क्षेत्रों में मांग गिर रही है, वहीं कुछ क्षेत्रों में बढ़ भी रही है। इसकी वजह से न केवल कीमतें बढ़ रही हैं बल्कि परंपरागत ग्राहक भी इस दायरे से बाहर हैं। इस तरह के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुख उदाहरण हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार चीन में जिस तरह कोविड-19 का कहर बरपा है, उसकी वजह से वहां लोगों को रोजमर्रा की स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। सारा का सारा अमला कोविड-19 की रोकथाम करने में जुट गया है। इन परिस्थितियों में नीतिगत स्तर पर भी भेदभाव होगा, जिस कारण कुछ क्षेत्रों में तो मांग बढ़ जाएगी लेकिन दूसरे क्षेत्रों में गिर जाएगी।

एक और गंभीर समस्या खड़ी हो गई है जिस पर अभी तवज्जो नहीं दी जा रही है। कोरोना वायरस की वजह से दुनिया भर में कई सारे काॅन्‍ट्रैक्ट टूट रहे हैं। इस कारण चीन में करीब 5,000 फोर्स मॉजियोर सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। फोर्स मॉजियोर सर्टिफिकेट के तहत छूट लेने वाली पार्टी की कॉन्ट्रैक्ट टूटने पर देनदारी नहीं रह जाती। चीन में इसके तहत 53.8 अरब डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट के लिए सर्टिफिकेट जारी किए गए थे। बढ़ते मामलों की वजह से फोर्स मॉजियोर सर्टिफिकेट पर कानूनी मामलों की संख्या भी बढ़ेगी। इसकी वजह से बिजनेस में लेन-देन पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी।

आसान शब्दों में कहें तो कोविड-19 महामारी से होने वाला आर्थिक नुकसान काफी जटिल है, जिसका असर बहुत व्यापक होने वाला है। ऐसे में दुनिया भर के नीति-निर्धारकों को इस समस्या को दूर करने के लिए काफी प्रभावकारी कदम उठाने होंगे। आदर्श स्थिति यही है कि सी-20 इस समस्या की व्यापकता को समझ सकता है। इस गहराते संकट को हम खंडों में नहीं देख सकते। इस मौके पर नीति-निर्माताओं को कोई भी कदम उठाने से पहले पुराने अध्ययनों पर भी जरूर गौर करना चाहिए। खास तौर से उनके लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि इस तरह के संकट के समय एक सेक्टर का दूसरे सेक्टर पर कैसा असर होता है। इस दिशा में लेऑन वालरास का 1874 में किया गया अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसी तरह, 1950 में नोबेल पुरस्कार पाने वाले केनेथ ऐरो और गेरार्ड डीब्रेऊ का काम भी उल्लेखनीय रहा है। इसी कड़ी में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के ‘अधिकार संपन्न करने वाली पद्धति (एनटाइटलमेंट अप्रोच)’ का अध्ययन करना चाहिए, जिसमें वे बताते हैं कि कैसे अनाज की प्रचुरता के बावजूद अकाल की स्थिति आ जाती है, कैसे मांग और आपूर्ति की जटिलता की वजह से समस्या खाद्य क्षेत्र से फैलकर दूसरे क्षेत्रों में पहुंचती है, और उसकी वजह से खाद्यान्न की कीमतें बढ़ जाती हैं और श्रम महंगा हो जाता है। उन परिस्थितियों में एक बड़ी आबादी जरूरी भोजन भी नहीं खरीद पाती। इसको बेहतरीन तरीके से सत्यजित राय की 1943 में बंगाल के अकाल पर आई फिल्म “डिस्टैंट थंडर” में देखा जा सकता है। यह फिल्म बताती है कि कैसे बंगाल में प्रचुर मात्रा में अनाज होने के बावजूद लोग भूखे मर गए।

एक सेक्टर का दूसरे सेक्टर पर प्रभाव को समझने के लिए पुराने समय में जो भी प्रयास किए गए हैं, उनका विश्लेषण करना इस समय बेहद जरूरी है। हालांकि इनमें से कोई भी सीधे तौर पर मौजूदा परिस्थितियों पर लागू नहीं होगा। लेकिन फिर भी नए संकट से निपटने में ये तरीके काफी मदद कर सकते हैं। खास तौर से ये प्रयास रिसर्च दल और सी-20 कार्यदल के काफी काम आ सकते हैं। इनके जरिए यह समझा जा सकता है कि कोविड-19 से पहले चरण में अर्थव्यवस्था को लगा झटका कितना गंभीर है और कैसे आगे सुधार किया जा सकता है। नीति-निर्माताओं के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे इन तरीकों को अपनाकर कोरोना वायरस से खड़े हो रहे संकट का समाधान निकालें, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय बेहद गंभीर खतरे का सामना कर रही है। सबसे अहम बात यह है कि हमारे पास समय नहीं है।

(लेखक अमेरिका के कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर हैं। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट की विशेष अनुमति से लिया गया है)

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