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प्रधानमंत्री की सुरक्षा ऐसे होगी और चुस्त

शांतनु मुखर्जी - JUN 30 , 2018
प्रधानमंत्री की सुरक्षा ऐसे होगी और चुस्त
प्रधानमंत्री की सुरक्षा ऐसे होगी और चुस्त

आजकल एक खबर सुर्खियों में है कि प्रधानमंत्री को कुछ खास तत्वों से जान का खतरा है। इस खबर ने सरकार खासकर गृह मंत्रालय में हडकंप मच गया और प्रधानमंत्री की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सख्त कदम उठाए गए।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप (एसपीजी) पर खतरों से जुड़ी हाल की खबरों के बाद अपनी मानक प्रक्रिया (एसओपी) और चुस्त करने का दबाव बढ़ गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अब एसपीजी की मंजूरी के बिना किसी को भी प्रधानमंत्री के नजदीक नहीं जाने दिया जाएगा, भले वह बड़ा नेता, अधिकारी या फिर कोई रसूखदार ही क्यों न हो।

पहली नजर में, अगर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को प्रधानमंत्री से नहीं मिलने दिया जाता है, तो यह थोड़ा अजीब लगता है। आखिर ऐसे लोगों को पहले से ही सुरक्षा मंजूरी मिल चुकी होती है या माना जाता है कि वे हर तरह के शक के दायरे से बाहर हैं। ऐसे में अब कड़े नियमों पर अमल व्यावहारिक रूप से आसान नहीं लगता है। शायद एकदम चुस्त पेशेवर अंदाज और फटाफट वाजिब फैसले लेने में माहिर किसी एसपीजी अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाए, जो प्रधानमंत्री के पास जाने वाले हर किसी के बारे में फैसला ले सके।

हालांकि, इस बीच गृह मंत्रालय की नई अधिसूचना के मुताबिक ऐसी मंजूरी की आवश्यकता की वजह से पुराने नियम बदल नहीं जाते हैं। यह सफाई किसी तरह के असमंजस को दूर करने के लिए जारी की गई, ताकि किसी अप्रिय घटना या उलझन से बचा जा सके।

इसके अलावा, प्रधानमंत्री की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अन्य महत्वपूर्ण उपाय क्या हो सकते हैं?  एसपीजी और खुफिया विभाग में वर्षों तक काम करने के बाद मेरा यह मानना है कि खुफिया मशीनरी को मजबूत करना जरूरी है, ताकि एसपीजी को प्रधानमंत्री को होने वाली खतरे से जुड़े ठोस खुफिया जानकारी मिलती रहे और किसी भी खतरे से बचने के लिए समय पर कार्रवाई की जा सके।

आईबी, रॉ, राज्य पुलिस खुफिया संगठनों और उनकी विशेष शाखाओं (एसबी) सहित तमाम खुफिया एजेंसियों को एक साथ तालमेल और समन्वय स्‍थापित करना चाहिए, ताकि किसी भी खतरनाक मंसूबे को फौरन नाकाम किया जा सके।

कश्मीरी पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या और इसमें लश्कर-ए-तैयबा का हाथ होने की खबरों से जाहिर है कि पाकिस्तानी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) हर तरह के हमले करने की योजना में मशगूल है और इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री पर हमले  की आशंका वाजिब लगती है। हालांकि, एसपीजी प्रधानमंत्री की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क है।

अगले साल चुनाव होने वाले हैं और प्रधानमंत्री अपने चुनाव प्रचार के दौरान बड़ी संख्या में रैलियां और रोड शो करेंगे। देश में सुरक्षा का माहौल सामान्य नहीं दिखता है। देश में सियासी गर्मी और समाजिक ध्रुवीकरण चरम पर है। लिहाजा, प्रधानमंत्री भी पहले से अधिक खतरे की जद में हैं। इसलिए अतिरिक्त उपायों पर जोर देना बेशक जरूरी है।

एसपीजी मुख्य रूप से करीबी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होता है। यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा अपने 'ब्लू बुक'  में दिए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक करता है। प्रधानमंत्री जब चलते हैं, रैलियों को संबोधित कर रहे होते हैं या रोड शो करते हैं या भीड़ के बीच होते हैं तो अत्यधिक प्रशिक्षित और पर्याप्त हथियारों से लैस क्लोज प्रोटेक्शन टीम (सीपीटी) उन्हें सुरक्षा कवच मुहैया कराती है।

टीवी पर दिखने वाली तस्वीरों के मद्देनजर, सार्वजनिक रैलियों के दौरान प्रधानमंत्री का सुरक्षा घेरा बढ़ाए जाने की जरूरत है। ऐसा इसलिए कि अगर किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने की कोशिश की जाती है तो प्रशिक्षित एसपीजी अधिकारी फौरन प्रधानमंत्री को कवर कर सके। मसलन, 1980 के दशक में श्रीलंका दौरे पर गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर श्रीलंकाई नौसेना के अधिकारी ने रायफल के बट से हमला कर दिया था। अगर सीपीटी का एक सदस्य प्रधानमंत्री के ठीक पीछे मौजूद होता तो शायद वह हमले को रोक पाता। हालांकि, बाद में एक सीपीटी अधिकारी उसे दबोच लेने में कामयाब रहा। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में किसी तरह की चूक से निपटने के लिए सुरक्षाकर्मियों को तैयार रहने की आवश्यकता है।

इसके अलावा, प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के समय भी विदेशी धरती पर अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। जब प्रधानमंत्री विमान से उतर रहे हों, तो आदर्श रूप से सीपीटी के कम-से-कम एक सदस्य को प्रधानमंत्री के पीछे होना चाहिए। इसकी पहली वजह यह है कि किसी भी हमले की कोशिश में वह फौरन हरकत में आ सकता है और किसी अप्रिय स्थिति की रोकथाम के लिए उन्हें कवर दे सकता है। दूसरे, वह हर तरह के हमले के कवच की तरह हो सकता है, ताकि हमला करना आसान न हो।

 कथित तौर पर एक बार स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए लाल किले जाने से पहले राजघाट पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पैर लड़खड़ा गए। सौभाग्य से, सीपीटी का एक अधिकारी तुरंत उनके पास पहुंचा और उन्हें संभाल लिया।

 शारीरिक सुरक्षा के अलावा प्रधानमंत्री के दौरा स्थल की जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसमें बिलकुल कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। साथ ही, स्थल पर आने वाले लोगों की सघन जांच होनी चाहिए। इस तरह के काम को भी सुरक्षा के उपायों के रूप में देखा जाना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि एसपीजी निरंतर चुस्ती के साथ अपने काम में जुटा रहता है, मगर उसे नए उपायों पर भी गौर करना चाहिए। नए खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए अन्य इकाइयों को भी अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

देश और इससे बाहर भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को सुरक्षित रखने के लिए उभरती चुनौतियों को अराजनैतिक और पूरी तरह पेशेवर तरीके से हल किया जाना चाहिए।

(लेखक सिक्युरिटी एनालिस्ट, पूर्व एसपीजी अधिकारी और मॉरीशस के प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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