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शराबबंदी के आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क अनुचित

सुभाष खंडेलवाल - AUG 26 , 2023
शराबबंदी के आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क अनुचित
शराबबंदी के आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क अनुचित
सुभाष खंडेलवाल

शराब के आगोश में पूरी दुनिया है। ठंडे मुल्कों जैसे यूरोप, अमेरिका आदि में यह जिन्दगी का हिस्सा है। वहीं भारत और इसके आस-पास के देशों में यह जिंदगी को खत्म करने वाला किस्सा है। भारत में शराब पिछले 10शराबबंदी के आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क अनुचित-20 वर्षों में तीव्रगति से बढ़ी है। यदि इसकी रफ्तार जिस अंदाज में जैसी चल रही है, वैसी ही चलती रही तो जो शराब आज नदी बन गई है, कल समुद्र बनेगी। हमारे देश को तैरना नहीं आता, उसका डूबना तय है, क्योंकि हमारे यहाँ शराब नहीं शराबी हैं। बाकी दुनिया के लिए ऐसा नहीं कह सकते। वहां कायदे-कानून हैं, उन्हें तैरना आता है, इसलिए वहाँ शराब है शराबी नहीं हैं। शराब की बुराइयों से, बीमारियों से वे भी अछूते नहीं हैं, फिर भी उनके लिए शराब मजा है, हमारे लिए सजा है। यह सजा व्यक्ति से व्यक्ति, घर, परिवार, समाज और देश को अनेकानेक तरह से मिल रही है।

चुनावों में अवैध रूप से शराब बाटंना मानो चुनाव लड़ने की एक अनिवार्य शर्त बन गया है। यह सब हमारे लोकतंत्र को बीमार और कमजोर बना रहा है। दिल्ली-मुम्बई, जयपुर-इंदौर जैसे तमाम शहरों से लेकर दूरस्थ गांवों तक को नशा अपनी गिरफ्त में ले चुका है। शहरों में नाइट कल्चर से तबाही की नई इबारत लिखी जा रही है। इंदौर में ही सिर्फ एक माह में नशे से 6 हत्याएं हो चुकी हैं। नशे न नशेड़ियों को ही नहीं शासन-प्रशासन को भी संवेदनहीन बना दिया है। हरियाणा और पंजाब की विकास के साथ ताकत-समृद्धि और फिर शाम होते ही गांव-शहरों को नशे में डूबने से हुई बर्बादी को देश ने देखा है। शराब-बंदी के पक्ष में सबसे अधिक महिलाएँ आंदोलन कर रही हैं। जब देश में गरीबी, भुखमरी, सूखा, बाढ़, बेरोजगारी पर कोई आंदोलन नहीं है, तब शराब को बंद करने के लिए आंदोलन होना, वो भी किसी नेता, पत्रकार, बुद्धिजीवी के बगैर। शराबी द्वारा दिए जाने वाले दर्द की व्यथा-कथा को बयाँ करता है।

शराब तबाही है। इसकी कीमत सबसे पहले माता-पिता को, उसके बाद ताउम्र पत्नी को बच्चों के साथ चुकाना पड़ती है। आदमी के शराबी बनते ही शराब उसकी पहली बीवी, मोहब्बत बन जाती है। भारतीय नारी बेचारी आँखों में आँसू लिए पति को परमेश्वर मानती घुट-घुट कर जिंदगी गुजारती रहती है। गरीब की पत्नी पर चौतरफा मार होती है। उसके घर में दूध तो दूर, दाल-रोटी का भी संकट होता है। पति पत्नी की खून-पसीने की कमाई को छीनकर बच्चों की चिकित्सा, शिक्षा की कीमत पर दारू पी जाता है। प्रतिकार करने पर उस पर गैर पुरुष संसर्ग का सबसे घिनौना आरोप लगाते हुए उसकी बेरहमी से पिटाई करता है। उसकी बेबस देह पिटाई झेलने की अभ्यस्थ तो होती ही है, लेकिन उसकी आत्मा को भी छलनी करता है।

रूस में जब जारशाही के खिलाफ 1917 में क्रांति हो रही थी, उस दौर में क्रांति के पूर्व जो हालात थे, हमारे देश के हालात आज कमोबेश वैसे ही हैं। रूस में गरीब बस्तियों में शाम के बाद जब कामगार घर लौट रहे होते थे, तब वे रास्ते में गालियां बकते हुए ताड़ीखाने में जाते थे, वहां बहुत भीड़ होती थी। घर पहुंचकर पत्नी, बच्चों से मारपीट करते थे। चारों ओर कोलाहल, रुदन, क्रंदन होता था। महिलाएं शाम के बाद घर से निकल नहीं सकती थीं। बाहर हैं तो बस्ती से गुजरकर घर नहीं पहुंच सकती थीं।

आज भारत की गरीब बस्तियों का भी यही हाल है। एक-दो दारूकुट्टे पूरी बस्ती को हिलाकर रखते हैं। ये दारूकुट्टे महिलाओं पर फब्तियां कसते हुए उन पर गंदे आरोप चस्पा करते हैं। उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। कामगार महिलाएं अपनी बच्चियों को घर छोड़कर काम पर जाने की स्थिति में नहीं होती हैं। इन बस्तियों की दास्तान, इनका दर्द बाहर वाले जानते ही नहीं हैं। कारण कि हमारी नई संस्कृति अपने से छोटों से रिश्ता बनाना तो ठीक, उनकी ओर देखने में भी तोहीन समझती है। हालात कुछ इस कदर है कि ‘‘सीने में जलन आँखों में तूफां, हैरान सा क्यूं है... इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है...’’ गजल गाते हुए, शायर को परेशानी दिख रही है। लेकिन जिनकी इन्हें ठीक करने की जिम्मेदारी है, उनकी नजरें कहीं और हैं, जानबूझ कर अनजान हैं और खुद ही नशे में चूर हैं।

एक प्रसिद्ध कव्वाली है ‘‘झूम बराबर झूम शराबी,’’ उसकी पंक्ति है, ‘आज अंगूर की बेटी ने सिर पर उठा रखी है दुनिया, ये तो अच्छा हुआ कि अंगूर को बेटा न हुआ।’ कव्वाली बनाने वालों को उस वक्त यह नहीं मालूम था कि अंगूरी की बेटी शराब जितने भी नशे हैं, उनकी बड़ी अम्मा है। उसने काम तमाम कर दिया है, ये जितने भी नशे हैं, गांजा, सफेद पाउडर, चरस, अफीम, मेंड्रेक्स, हेरोइन ये उस अंगूर की बेटी के ही बच्चे हैं।

भारत में धर्म ने साधु-संत, मुल्ला-मौलवी ने शराब का निषेध किया है। हिन्दू है तो मंगलवार, शनिवार, सावन या नवरात्रि में दारू नहीं पीता है, जैन है तो पर्युषण में दारू नहीं पीता है और मुसलमान है तो रोजे में दारू नहीं पीता है। शराब शुगर, लीवर, हार्ट, रक्तचाप आदि बीमारियां तो देती ही है। धर्म के प्रभाव से पीने वाले में एक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अपराध बोध की बीमार मानसिकता भी बना देती है।

नेहरू ने आजादी की लड़ाई में 12 वर्ष जेल में रहकर अपनी जवानी कुर्बान कर पूरी दुनिया के इतिहास को अपनी पुस्तक में इस तरह समेटा जैसे सबकुछ उनके सामने से गुजरा हो, लेकिन शराब के दंश को अपने ही देश में समझ न सके। उन्होंने आजादी के बाद गाँधी की शराबबंदी की बात नहीं मानी। शराब धीरे-धीरे देश को दीमक की तरह खाने लगीं। इसने संविधान के चारों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया के एक बड़े वर्ग को अपनी चपेट में लेकर कॉरपोरेट के साथ एक कॉकटेल बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इसकी रफ्तार बढ़ती गई। आज शाम के बाद देश के सभी स्तंभों के कई कर्णधार कॉरपोरेट के साथ आधुनिक नीरो बन देश के पतन की पटकथा तैयार करते हैं। इसकी प्रस्तावना में शराब, मध्य में भ्रष्टाचार और अन्त में शबाब के साथ देश पर चिंतन होता है।

शराब के समर्थक कुतर्क करते हैं कि यह व्यक्तिगत आजादी में खलल है। उनसे पूछा जाए कि क्या किसी को आत्महत्या करने की छूट दी जा सकती है। वे कुतर्क करते हैं कि यह दो नम्बर में बिकेगी। उनसे पूछा जाना चाहिए कि खूनी, बलात्कारी न्यायालय से बरी हो जाता है तो क्या उन्हें पकड़ना बंद कर दें। गुजरात में आज भी शराब मिलती है। ऐसे कुतर्क शराब के समर्थक देते है, लेकिन हकीकत यह है कि जब शराब के एडिक्टों को बिहार में शराब नहीं मिली तो उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। शराबबंदी सरकार की नियत और नीति पर निर्भर करती है।

चीन तो अफीम के नशे में डूब कर खत्म ही हो गया था। माओत्से तुंग ने सख्ती से नशेड़ियों को जेल में डाल कर, कुचल कर अपने देश को बचाया था। बिहार में नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू की है। यह जनता के प्रति उनका कर्तव्य है। यह कर्तव्य बाकी पार्टियों का भी है। लेकिन ये खामोश क्यों हैं? आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क अनुचित है। कारण कि धन तो खुद सरकार अपने पर लुटाती रहती है और हजारों करोड़ के नए कर्ज एवं करों की व्यवस्था भी करती रहती है। दुर्भाग्य है कि ना आज कोई चिंता है न ही चिन्तन है।

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