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नगर निकाय चुनाव: सत्ता की कमजोर सीढ़ी पर कब्जे की होड़

NOV 24 , 2017

- गौरव मित्तल

लगभग 6 महीने की देरी के बाद उत्तर प्रदेश में नगर निकायों के चुनाव हो रहे हैं। इस तरह की देरी उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब और तमिलनाडु में भी हुई थी। निकाय चुनावों के साथ ऐसा होना अब आम हो गया है। अन्य चुनावों की तरह यह देरी बहस का मुद्दा नहीं बनती। अमूमन नगर निकाय चुनावों में जनता भी खास दिलचस्पी नहीं लेती। हालांकि, नेताओं के लिए यह शक्ति प्रदर्शन और स्थानीय स्तर पर दबदबा कायम करने का मौका होता है। मगर राजनीतिक दलों के पास इन चुनावों को लेकर कोई विजन नहीं दिखता। जबकि नगर निकाय भारतीय संघीय व्यवस्था का तीसरा स्तर माने जाते हैं। फिर भी इन चुनावों को लेकर उदासीनता काफी आश्चर्यजनक है। 

भारत में नगर निकायों का अस्तित्व 19वीं सदी से रहा है। लेकिन नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा भारतीय संविधान के 74वें संशोधन के बाद प्राप्त हुआ। यह संशोधन 1992 में केंद्र सरकार द्वारा पारित किया गया था। नगर निकायों को शक्ति प्रदान करने के लिए इस संशोधन ने संविधान में 12वीं अनुसूची जोड़ी जिसके तहत नगर निगमों के सार्वजनिक सेवा सम्बंधी 18 कार्यों का विवरण दिया गया। इस संवैधानिक संशोधन को हुए भी अब 25 साल गुजर चुके हैं। फिर भी बहुत से दायित्व राज्य सरकारों से नगर निकायों को हस्तांतरित होने बाकी हैं। राज्य सरकारों की इस उदासीनता का मूल कारण भी संविधान में ही निहित है। संविधान की 7वीं अनुसूची के अनुसार, स्थानीय सरकारों का नियंत्रण राज्य सरकारों के हाथों में होता है। केंद्र सरकार इस विषय में राज्य सरकारों को सिर्फ दिशानिर्देश दे सकती है, जबकि कानून बनाने का अधिकार पूर्णतः राज्य सरकारों के पास है। इस तरह के विरोधात्मक संवैधानिक प्रावधानों की वजह से संघीय व्यवस्था को मजबूत अंग होना तो दूर, नगर निकाय आज भी राज्य सरकारों पर आश्रित हैं।

शहरी प्रशासनिक तंत्र पर राज्य सरकारों का नियंत्रण

पिछले कुछ वर्षों से केंद्र सरकार ने नगर निकायों को सुधारने के कुछ प्रयास जरूर किए हैं। मगर इन प्रयासों का व्यापक असर दिखना बाकी है। 2005 के आखिर में यूपीए सरकार ने जवाहरलाल नेहरु नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के जरिए शहरी प्रशासनिक तंत्र को बदलने की कोशिश की थी। इसके अंतर्गत 23 शहरी सुधारों की विस्तृत सूची तैयार की गई, जिसमें से 13 जरूरी और 10 वैकल्पिक सुधार थे। करीब 8 साल बाद 2013 में जेएनएनयूआरएम का मूल्यांकन हुआ तो पता चला कि वैकल्पिक सुधार तो दूर जरूरी सुधारों पर भी अमल नहीं हुआ है। अब ऐसी ही पहल मोदी सरकार ने की है। एनडीए सरकार ने जून, 2015 में अटल मिशन फॉर रेजूवनेशन एंड अर्बन ट्रान्सफॉर्मेशन (अमृत) की शुरुआत की। इसमें 11 सुधारों की सूची है। अफसोस की बात है कि अमृत में भी राज्य सरकारें और नगर निकाय शहरी सुधारों के प्रति उदासीन दिख रहे हैं।

इस उदासीनता का एक स्पष्ट कारण राज्य सरकारों और नगर निगमों के बीच प्रशासनिक शक्ति के लिए होने वाली खींचतान है। भारतीय शहरों में नगर निकायों के दो प्रमुख होते हैं। महापौर, जो जनता द्वारा चुना जाता है, विधायी प्रमुख होता है जबकि निकाय आयुक्त या मुख्य नगरपालिका अधिकारी प्रशासनिक प्रमुख होता है, जिसे राज्य सरकार नियुक्त करती है। इन दोनों प्रमुखों के बीच निकाय आयुक्त या नगरपालिका अधिकारी के पास हमेशा ज्यादा शक्तियां होती हैं। जबकि केंद्र सरकार द्वारा सुझाए गए सुधार ये शक्तियां महापौर को हस्तांतरित कर निकाय आयुक्त को महापौर के अधीन लाने की पैरवी करते हैं। राज्य सरकारों को डर है कि ये सुधार नगर निगमों पर सरकारों के नियंत्रण को कम कर देंगे। इसी डर की वजह से कई बार राज्य सरकारें ही शहरी सुधारों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेती। साल 2015 का उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक इसका सटीक उदाहरण है। यह विधेयक राज्य सरकारों को महापौर को बर्खास्त करने का अधिकार देता है, जो संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। इस तरह के प्रयास नगर निकायों में महापौर की शक्तियों पर अंकुश लगाकर उनकी स्थिति कमजोर करते हैं।

राज्य सरकारें अपनी समानांतर संस्थाओं (parastatals) के माध्यम से भी नगर निकायों को दुर्बल बना रही हैं। चाहे वह नए स्थापित होते विकास प्राधिकरण हों या फिर बरसों पुरानी जल निगम जैसी संस्थाएं। राज्य सरकारों के अधीन इस तरह की संस्थाएं नगर निकायों के समानांतर शहरों में सार्वजनिक सेवाओं का निर्वाहन करती रहती हैं। इन संस्थाओं के प्रमुख सामान्यतः राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त होते हैं। अधिकांश मामलों में इन संस्थाओं के दायित्व और बजट नगर निकायों से भी बड़े होते हैं। ऐसे में नगर निकायों का महत्व कम होना स्वाभाविक है।

नगर निकायों की वित्तीय बदहाली

भारत की वर्तमान संघीय व्यवस्था में नगर निकायों के पास बहुत कम वित्तीय शक्तियां हैं। कुछ गिने-चुने बड़े नगर निगमों को छोड़ दें तो नगर निकायों के पास रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए भी पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं होते। नगर निगमों के कर-आधार को राज्य व केंद्र सरकारों ने खोखला कर दिया है। 14वें केंद्रीय वित्तीय आयोग के अनुसार, 2007-08 में नगर निकायों का राजस्व भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 1.08 प्रतिशत था, जो 2012-13 में घटकर 1.03 प्रतिशत रह गया। अगर बाकी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से तुलना की जाए तो ब्राजील में यह हिस्सेदारी 5 प्रतिशत है तो दक्षिण अफ्रीका में 6 फीसदी। हमारे देश में इस 1.03 फीसदी हिस्सेदारी में भी बड़ा हिस्सा महानगरों का है। छोटे शहरों के पास ना तो राजस्व वसूली की स्वायत्तता है और ना ही क्षमता। नतीजन, बहुत से नगर निकायों को कर्मचारियों के वेतन के लिए भी राज्य सरकारों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है।

74वें संशोधन से पहले जो थोड़ी बहुत राजस्व वसूली की शक्तियां नगर निकायों के पास थी, वह भी धीरे-धीरे कमजोर कर दी गई हैं। नगर निकायों का सबसे ज्यादा राजस्व चुंगी कर (octrai) से आया करता था, मगर केंद्र सरकार के निर्देशानुसर सभी शहरों से यह हटा लिया गया। हाल में जीएसटी के आगमन के बाद नगर निगमों के बचे खुचे राजस्व स्रोत भी बंद हो गए। ताज्जुब की बात है कि जीएसटी की पूरी बहस में नगर निकायों को खास महत्व नहीं दिया गया। जीएसटी के तहत एकत्रित राजस्व केंद्र व राज्य सरकारों के बीच में पहले से निर्धारित सूत्र के हिसाब से बांटा जाएगा, इसको नगर निकायों में बांटने का कोई सूत्र तैयार नहीं किया गया। हालांकि केंद्र सरकार के शहरी विकास विभाग ने राज्य सरकारों से यह राजस्व नगर निकायों के साथ बांटने का आग्रह किया है, इस आग्रह को मानने की राज्य सरकारों की कोई इच्छा फिलहाल तो प्रतीत नहीं होती।

सिद्धांतानुसार राज्य सरकारों से नगर निकायों को राजस्व का हस्तांतरण पंचवर्षीय राज्य वित्तीय आयोगों की सिफारिशों के अनुसार होना चाहिए। ये वित्तीय आयोग राज्य सरकारों द्वारा ही स्थापित किए जाते हैं, और इनका मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों को ये बताना होता है कि कितना राजस्व राज्य सरकारों से स्थानीय सरकारों (जिनमें नगर निकाय व ग्राम पंचायत दोनों आते हैं) को हस्तांतरित किया जाना चाहिए। मगर जहां केंद्रीय वित्तीय आयोगों की शिफारिशें केंद्र सरकार पर बाध्य होती हैं, राज्य वित्तीय आयोगों की भूमिका सिर्फ शिफारिशें देने तक ही सीमित रहती हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि राज्य सरकारें मनमाने ढंग से नगर निकायों को वित्तीय हस्तांतरण करती हैं।

राजनीतिक तुष्टिकरण का खेल

उपरोक्त प्रशासनिक और वित्तीय समस्याओं के कारण वर्तमान हालत यह है कि नगर निकाय स्मार्ट सिटी बनना तो दूर, जनता को बुनियादी सुविधाएं भी प्रदान नहीं कर पा रहे हैं। यही वजह है कि हाल के सालों में नगर निगमों के चुनाव राजनीतिक तुष्टिकरण की रंगभूमी में तब्दील हो चुके हैं। इन चुनावों में पार्टियों की आंतरिक राजनीति खुल कर बाहर आती हैं। ये चुनाव ग्राम पंचायतों के चुनाव के विपरीत पार्टी चिन्हों पर लड़े जाते हैं, इस कारण स्थानीय नेताओं में पार्टी से टिकट पाने की होड़ लग जाती है। क्योंकि स्थानीय नेताओं को पहले से पता होता है कि नगर निकायों के पास वास्तविकता में कोई शक्ति नहीं होती, वो इन चुनावों को महज एक राजनीतिक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। बड़े नेताओं के लिए ये चुनाव यह भ्रम कायम रखने के काम आते हैं कि छोटे नेता भी राजनीतिक तंत्र का हिस्सा हैं। इस खेल के बीच आम आदमी सिर्फ इस आस में बार बार मतदान करने पहुंच जाता है कि शायद कभी कुछ बदल जाए।

अगर हमें सच में नगर निकायों की खस्ता हालत में कोई सुधार लाना है, तो इसका रास्ता निकायों के चुनावों से नहीं बल्कि केंद्र सरकार से होकर गुजरता है। 74वें संशोधन के 25 साल बाद, यह एक और संशोधन लाने का सही समय है। इस संशोधन के जरिए केंद्र सरकार को 7वीं और 12वीं अनुसूची के बीच के अंतर्विरोध को खत्म करना चाहिए। स्थानीय सरकारों की जिम्मेदारी को 7वीं अनुसूची में राज्यों की सूची से हटाना चाहिए और 12वीं अनुसूची को भी 7वीं अनुसूची में जोड़ देना चाहिए। महापौरों और निकाय आयुक्तों के बीच की खींचतान खत्म करके, आयुक्तों को महापौरों के अधीन लाने का प्रावधान भी संविधान में डालने की जरूरत है। निकायों को वित्तीय स्वयायतता प्रदान करने के लिए जीएसटी कोश से उनको प्रत्यक्ष हस्तांतरण का प्रावधान होना चाहिए। इन्हीं सब संशोधनों के बाद ही हम नगर निगम चुनावों में जनता की वास्तविक दिलचस्पी की अपेक्षा कर सकते हैं। 

(लेखक शहरी भूगोल और विकास से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ हैं।) 


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