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माफ कीजिए नसीरुद्दीन साहब, हक़ीक़त से दूर हैं आप!

JUN 07 , 2017

पिछले हफ्तेे जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने हिंदुस्तान टाइम्स में चल रही एक सीरीज “बीइंग मुस्लिम नाउ” के आखरी पार्ट के तौर पर एक लेख लिखा। लेख का शीर्षक जो कि एक बयान के रूप में था, उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह हो सकता है, “मुझे नहीं याद आता कि पहले कभी मुसलमानों को इस तरह से बड़े पैमाने पर एक साथ देशद्रोही/अदेशप्रेमी के तौर पर देखा गया हो।” मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है लेख छपने से पहले ही इसका बहुत प्रचार किया जा रहा था। एक दिन पहले ट्विटर पर यह बात फैलाई गई कि “बीइंग मुस्लिम नाउ” की सीरीज में कल नसीरुद्दीन शाह का “शक्तिशाली और अंदर तक हिला देने वाला” लेख पढ़ना न भूलें।

ज़ाहिर था कि शुक्रवार को जागते ही सबसे पहली चीज़ जो मैंने पढ़ी वो नसीर साहब का लेख था। इसकी वजह यह थी कि मैं ये जानना चाहता था कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कुछ लिख दिया, जिसे इतना प्रचारित किया जा रहा है। 

लेख पढ़ते ही मेरा पहला रिएक्शन था कि ये लेख एक संपन्न (Privileged) मुसलमान की शेख़ी और भड़ास से ज़्यादा कुछ नहीं है। मेरा ऐसा कहना कई दोस्तों को अच्छा नहीं लगा। खासतौर पर उनको जो कि नसीर साहब के फैंस हैं। मेरा मानना है कि बेेेशक नसीर साहब एक मंझे हुए कलाकार हैं, पर इसका मतलब ये तो नहीं होता कि भ्रामक चीज़ें लिख दें और हम उसकी तरफ उनका ध्यान भी न दिलाएंं। साथ ही मुझे यह भी लगा कि उन्होंने ये बातें सार्वजनिक तौर पर कही और लिखी थी, इसीलिए इसका खंडन भी सार्वजनिक तौर पर होना चाहिए। उनकी इज़्ज़त अपनी जगह और तथ्य अपनी जगह। इस से पहले कि हम आगे बढ़े मैं अपनी ओर से एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उनका “नॉन प्रैक्टिसिंग” मुस्लिम होना मेरे नज़दीक कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा है उनके द्वारा पेश किये गए आधारहीन तथ्य।

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सबसे पहली बात, नसीर साहब के लेख का शीर्षक, जो उनका बयान भी है, विडम्बनापूर्ण है। वह इसलिए कि वे यह तो बतातेे हैं कि आज देश में मुसलमानों को शक की निगाह से देखा जा रहा है, पर यह नहीं बतातेे कि वो खुद जिस इंडस्ट्री का हिस्सा हैं, उसने भी इस देश में मुसलमानों के प्रति इस तरह का माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसी दर्जनों फिल्में हैं जिसमें मुसलमानों को देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त के तौर पर पेश किया गया है।

यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। खुद नसीर साहब ने भी ऐसी फिल्मों (जैसे अ वेडनसडे और सरफरोश) में अहम किरदार अदा किया है। यही कारण था कि लेख पढ़ते हुए मुझे कबीर का ये दोहा याद आ रहा था।

करता रहा सो क्यों रहा, अब करी क्यों पछताए।

बोये पेड़ बबूल का, अमुआ कहां से पाए।

नसीर साहब को पहले कभी भले ऐसा न लगा हो कि मुसलमानों के साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, पर हक़ीक़त ये है कि दशकों से हज़ारों नहीं लाखों मुसलमानों के लिए ये रोज़मर्रा की बात हो चुकी है। उन्हें शक की निगाह से देखा जाए। उनके देशप्रेम और भारतीय होने पर सवाल खड़ा किया जाए। उनको संभावित आतंकी के तौर पर देखा जाए।

यह नसीर साहब (और किसी हद तक मुझ जैसों का भी) सौभाग्य रहा है कि आम मुसलमानों की तरह उन्हें कभी परेशानी और दुराचार का सामना नहीं करना पड़ा हो। पर मुझे उम्मीद है कि नसीर ने असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों के बारे में सुना होगा। अगर नहीं तो उन्हें पता करना चाहिए कि कैसे उन लोगों के साथ अमानवीय बर्ताव होता है। उनके भारतीय नागरिक होने तक पर ही सवाल खड़ा किया जाता है और उनको डिटेंशन कैंपाेें में सड़ने के लिए डाल दिया जाता है। और अगर मैं उनसे ‘बहुत दूर’ की बात पता करने का आग्रह कर रहा हूं तो वो मुंबई (जहां वो रहते हैं) के मुमब्रा और शिवजी नगर इलाक़ों में ही चले जाएं, उनको पता चल जाएगा कि दशकों से मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है।

वो ये भी लिखते हैं कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा और सफाई को लेकर लापरवाही और उदासीनता पाई जाती है। खासतौर पर उनमें जो आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं। इस स्थिति के लिए वे मुसलमानों को ही असल जिम्मेदार मानते हैं। जबकि हक़ीक़त इसके बिलकुल विपरीत है। ऐसा सिर्फ मेरा मानना नहीं है, बल्कि शोध अध्यन बताते हैं। अगर हम सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को भी छोड़ भी दें तो मुस्लिम बहुल इलाक़े जैसे सीलमपुर (दिल्ली) अररिया (बिहार) और पाकुड़ (झारखण्ड) आदि में सरकार के ही द्वारा किये गए बेसलाइन सर्वेज से पता चलता है कि ऐसा मुसलमानों की उदासीनता की वजह से नहीं बल्कि सरकार द्वारा बुनियादी सुविधाएं नहीं मुहैया कराने की वजह से होता है। एक दूसरा शोध पत्र बताता है कि विपरीत स्थितियों के बावजूद मुसलमान दूसरे धार्मिक समुदायों के अपेक्षा स्वच्छता का ख्याल ज़्यादा रखता है। ये सारे अध्ययन ऑनलाइन और फ्री में उपलब्ध हैं। काश, नसीर साहब ने उसे पढ़ा और देखा होता।

अगली बात, नसीर साहब के लिए और हमारे बहुत सारे दोस्तों के लिए जो नास्तिक हैं, धर्म में विश्वास नहीं करते, अग्नॉस्टिक आदि हैं, के लिए धर्म एक फिजूल और ‘फसाद’ की चीज़ हो सकती है। पर आम जनता के लिए, जिसमें मुसलमान भी शामिल है, अक्सर बुरे हालत से उबरने का सहारा होता है। जब उनकी सारी उम्मीदें ख़त्म हो जाती है तो अपने को ज़िंदा रखने और संघर्ष कायम रखने के लिए, धर्म के शरण में पहुंचते हैं। यहां दो उदाहरण देना चाहूंगा।

एक, तीस साल पहले हाशिमपुरा संहार (उत्तर प्रदेश, 22 मई 1987) में मारे गए परिवार वालों और जो उस वक़्त मौत की मुहँ से बाहर निकल आये थे। लोगों को लगता है, अगर उनको इस दुनिया में इंसाफ नहीं मिला तो क़यामत के दिन ज़रूर मिलेगा।

दूसरे, यही हाल आज से लगभग 35 वर्ष पहले नेली संहार (असम, 18 फ़रवरी 1983) में मारे गए परिवार वालों का भी है. तीन दशकों के बाद ही आज तक उन्हें इंसाफ नहीं मिला है और वो अभी भी अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं. इस चीज़ को सुबाश्री कृष्णन की फिल्म व्हाट दि फील्ड्स रिमेम्बर बहुत अच्छी तरह से दर्शाती है।

मुझे लगता है कि अगर वो धर्म या क़यामत जैसी किसी चीज़ पर यकीन न कर रहे होते तो बहुत पहले अपनी जान ले चुके होते। कोई ये तर्क कर सकता है कि धर्म की वजह से ही तो सारे दंगे-फसाद होते हैं। सही, पर ये कहना कि सारे दंगे-फसाद की जड़ में सिर्फ और सिर्फ धर्म और उनके अनुयायी ही हैं, भयानक किस्म का सरलीकरण है। नसीर साहब आगे लिखते हैं कि मुसलमानों को 'विक्टिमहुड' की मानसिकता से बाहर आना होग।ये एक दुष्चक्र है। वो किसी हद तक सही कहते हैं

पर वे ये नहीं बताते कि अपने ऊपर हो रहे अन्याय के बारे में बात करना विक्टिमहुड नहीं है। वे ये भी नहीं बताते, ज़मीनी हक़ीक़त उनकी कल्पना के उलट है। शोध अध्ययन बताते है कि भारतीय मुसलमान लंबे समय से विक्टिमहुड से आगे बढ़कर ज़मीनी संघर्ष कर रहा है। गुजरात से लेकर आसाम तक लोग सकारत्मक काम कर रहे हैं, खासतौर पर मुस्लिम नौजवान। इन सब चीज़ों को देखने के लिए हमको अपने खोल से बाहर आना होगा। इस सन्दर्भ में सिर्फ गुजरात ही के बारे में दो किताबों, एक, बीइंग मुस्लिम एंड वर्किंग फॉर पीस और दूसरी, जस्टिस बिफोर रिकॉन्सीलिएशन का अध्ययन सहायक हो सकता है।

आखिरी बात, नसीर साहब की ही तरह मुझे भी लगता है कि हमारे समाज में बदलाव और सुधार की ज़रूरत है. पर मैं उनकी तरह मायूस नहीं हूं। वो इसलिए क्यूंकि मैं अपने आसपास हो रहे बदलाव को महसूस कर सकता हूं।

देख सकता हूं कि कैसे मुस्लिम नौजवान अपने समाज के अंदर और बाहर चीज़ों को चुनौती दे रहे हैं। हर रोज़ एक न एक पॉजिटिव पढ़ने और सुनने को मिलता है। यही उम्मीदों को नयी बुलंदियों तक ले जाता है। चूंकि, नसीर साहब ने अपने लेख के अंत में अल्लामा इक़बाल की मशहूर कविता 'सारे जहां से अच्छा..." का ज़िक्र किया है, इसलिए मैं भी अपनी बात इक़बाल के ही एक शेर से ख़त्म करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था:

नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्ते-वीरां से

ज़रा नाम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी।

मैं ऐसी उम्मीद करता हूं कि नसीर साहब भी इस "किश्ते- वीरां" में जल्द सवार होंगे ताकि जितने बदलाव और सुधार की ज़रूरत है, वहां तक पहुंचा जा सके, मैं उनके सहयोग के लिए तैयार हूं, अपनी क्षमता के अनुसार।

(महताब आलम स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक हैं। पहले एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से भी जुड़े रहे  हैं।)


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