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भारतीयता का वास्तविक स्वरूप

कुलदीप कुमार - DEC 27 , 2019
भारतीयता का वास्तविक  स्वरूप
भारतीयता का वास्तविक स्वरूप
कुलदीप कुमार

संशोधित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता संशोधन कानून के मुद्दों पर देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है और अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सत्ता अपने चरित्र के अनुसार स्थिति को नियंत्रण में करने के बहाने बेरहमी के साथ दमन-चक्र चला रही है। ऐसे में यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो उठता है कि भारतीयता और भारत की नागरिकता के मानी क्या हैं? क्या अभी तक इनका जो अर्थ सर्व-स्वीकृत था, उसे बदला जा रहा है? क्या इन अवधारणाओं को नए सिरे से परिभाषित और व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है? और, क्या इस कोशिश का उद्देश्य इन अवधारणाओं के दायरे को संकुचित करना है? क्या संविधान की शपथ लेकर सत्तासीन होने वाले लोग संविधान की मूल आत्मा को ही नष्ट करने में लगे हैं?

इन प्रश्नों पर विचार करने से पहले यह समझना जरूरी है कि संविधान वास्तव में है क्या? क्या यह राजनीतिक व्यवस्था को नियंत्रित, परिचालित और निर्देशित करने का दस्तावेज भर है, जिसमें समय की जरूरत के अनुसार संशोधन किए जा सकते हैं? क्या इसकी भूमिका केवल विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिकों के अधिकारों और दायित्वों को परिभाषित और सुनिश्चित करने तक ही सीमित है? जब हम संवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं, तब हमारा आशय क्या होता है? भारत का संविधान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के ख‌िलाफ चले विभिन्न प्रकार के संघर्षों और उनके दौरान उभरे अनेक समाज सुधार आंदोलनों के मूल्यों को समाहित करके बनाया गया है। इसीलिए इसका मूल स्वर प्रत्येक तरह की समानता को सुनिश्चित और प्रोत्साहित करने का है। चाहे वह विभिन्न धर्मों के बीच समानता हो या विभिन्न जातियों या विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच की समानता हो। स्‍त्री और पुरुष के बीच समानता भी इसके मूल उद्देश्यों में से एक है। यही कारण है कि जब भारत के संविधान ने 26 जनवरी, 1950 को लागू होते ही सभी वयस्कों को, चाहे वे पुरुष हों या स्‍त्री, चुनावों में वोट देने का अधिकार प्रदान किया, उस समय कई यूरोपीय देशों तक में ‌स्‍त्रियों को वोट देने का अधिकार प्राप्त नहीं था। स्विट्जरलैंड में संघीय स्तर के चुनावों में स्त्रियों को वोट डालने का अधिकार 1971 में जाकर मिला और उसकी सबसे छोटी कैंटन में तो ‌स्‍त्रियों को यह अधिकार 1990-91 में प्राप्त हो पाया। भयंकर गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन के बावजूद जब भारत के संविधान ने हर वयस्क नागरिक को बिना भेदभाव के वोट देने के अधिकार से लैस किया, तब विश्व के विकसित देशों ने दांतों तले अंगुली दबा ली। कई राजनीतिक विचारकों ने तो यह भविष्यवाणी भी कर दी कि भारत में लोकतंत्र का यह महाप्रयोग एक दशक से अधिक समय तक नहीं चल सकेगा। जब पड़ोसी पाकिस्तान कुछ ही सालों में सैनिक शासन की गिरफ्त में आ गया, तो इस आशंका को और अधिक बल मिला। लेकिन अपनी तमाम कमियों के बावजूद भारत में लोकतंत्र आज भी जीवित है, भले ही उसे मारने की समय-समय पर कोशिशें की जाती रही हैं और की जाती रहेंगी। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि इस लोकतंत्र को एक ऐसा संविधान निर्देशित और नियंत्रित करता है जिसका जन्म एक लंबे राजनीतिक संघर्ष के गर्भ से हुआ है और उस संघर्ष के दौरान अर्जित जीवनमूल्य आज भी उसकी आधारशिला बने हुए हैं।

ब्रिटिश शासन के ख‌िलाफ कांग्रेस ने तो महात्मा गांधी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक आंदोलन चलाया ही, लेकिन इसी के साथ चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां और भगत सिंह जैसे उस समय आतंकवादी कहे जाने वाले देशभक्तों ने भी इसमें अपने ढंग से महान योगदान दिया। समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने भी इस महत्वपूर्ण कार्य में हाथ बंटाया। ये सभी एक ऐसे राष्ट्रवाद का स्वप्न लेकर चल रहे थे जिसमें सभी को एक जैसा सम्मान और स्थान मिले। किसी के साथ भी किसी भी आधार पर भेदभाव न हो। आज का हमारा संविधान और उसके आधार पर परिभाषित होने वाली भारतीयता और नागरिकता उनके इस स्वप्न को साकार करने के प्रयास के फलस्वरूप जन्मा है।

लेकिन इसी के बरक्स धर्माधारित राष्ट्रवाद भी पनप रहा था- हिंदू, मुस्लिम और सिख नेता अपने-अपने लिए अलग क्षेत्र की मांग कर रहे थे। 1940 के दशक के मध्य में बहुत ही अल्पकाल के लिए, उस समय के कम्युनिस्ट नेता भी इसे राष्ट्रीयता का सवाल समझ कर इसके साथ खड़े हो गए थे लेकिन वे जल्दी ही अपनी मूल राजनीति पर वापस आ गए। यह राष्ट्रवाद सर्वसमावेशी राष्ट्रवाद नहीं था। हिंदू राष्ट्रवाद की सबसे स्पष्ट अवधारणा विनायक दामोदर सावरकर की 1923 में प्रकाशित पुस्तिका हिंदुत्व और माधवराव सदाशिव गोलवलकर की 1938 में प्रकाशित पुस्तिका वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड (हम अर्थात हमारी परिभाषित राष्ट्रीयता) में मिलती है और मुस्लिम राष्ट्रवाद की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति के लिए 1940 में लाहौर में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मुहम्मद अली जिन्ना के अध्यक्षीय भाषण को पढ़ा जा सकता है। ये दोनों वास्तव में हिंदू पृथकतावाद और मुस्लिम पृथकतावाद हैं और इन्हें राष्ट्रवाद कहना राष्ट्रवाद की अवधारणा के साथ अन्याय करना है।

विदेशी शासन के ख‌िलाफ संघर्ष से इन दोनों धर्माधारित ‘राष्ट्रवादों’ ने अपने-आप को अलग रखा। इसीलिए इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान के संविधान की नींव उन जीवनमूल्यों पर नहीं रखी जा सकी जिन पर भारत के संविधान की रखी गयी थी। इसलिए अस्तित्व में आने के कुछेक वर्षों बाद ही पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों के ख‌िलाफ हिंसक आंदोलन छेड़ा गया। बाद में ज़ु‌िल्फकार अली भुट्टो जैसे रोशनखयाल समझे जाने वाले शासक ने तो उन्हें गैर-मुस्लिम ही करार दे दिया। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ जो व्यवहार हुआ, उसका पता इसी तथ्य से चल जाता है कि जहां 1947 में पाकिस्तान (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल था) में गैर-मुस्लिमों की संख्या कुल आबादी का 23 प्रतिशत थी, वहीं आज तीन प्रतिशत से भी कम है। धर्म के आधार पर राष्ट्रीयता और नागरिकता को परिभाषित करने का यही परिणाम होता है। प्रश्न यह है कि क्या हम भारत को भी इसी तरह का बनाना चाहते हैं?

तथाकथित हिंदू राष्ट्रवाद, जिसके सबसे बड़े और प्रभावशाली प्रवक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन हैं, भी उस सर्व-समावेशी राष्ट्रवाद का विरोधी है जिसने ब्रिटिश शासन के ख‌िलाफ संघर्ष की भट्टी में तप कर आकार ग्रहण किया। शायद लोगों को याद न हो पर हकीकत यही है कि भारत के स्वाधीन होने के बाद जब तिरंगे झंडे को राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार किया गया, तब संघ ने उसका खुलकर विरोध किया क्योंकि उसकी राय में राष्ट्र और हिंदू पर्यायवाची शब्द हैं और वह चाहता था कि भगवा ध्वज को ही राष्ट्रध्वज की मान्यता मिले। यही कारण है कि कुछ वर्ष पहले तक नागपुर में उसके मुख्यालय पर तिरंगा झंडा नहीं फहराया जाता था। इसी तरह वह संविधान का आधार ग्रंथ उस मनुस्मृति को बनाने के पक्ष में था जिसमें निहित जीवनमूल्य राष्ट्रीय आंदोलन के समानतामूलक जीवनमूल्यों के नितांत विपरीत थे।

इस संदर्भ में मुझे एक घटना याद आ रही है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के कुछ ही दिन बाद नई दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद के नॉर्थ एवेन्यू-स्थित कार्यालय में एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसमें रामजन्मभूमि आंदोलन के एक बड़े नेता और अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी मुक्तानंद सरस्वती द्वारा लिखित एक पुस्तिका जारी की गई। इस पुस्तिका का शीर्षक काफी लंबा-चौड़ा था- भारत की एकता, अखंडता, भाईचारे एवं सांप्रदायिक सद्‍भाव को मिटाने वाला, भारत में भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार एवं अधर्म को बढ़ाने वाला कौन? वर्तमान इंडियन संविधान। इस पुस्तिका में एक नए संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी जिसके प्रमुख बिंदु थे- मुसलमानों और ईसाइयों को कोई अधिकार प्राप्त न हो, ‘जन गण मन’ के स्थान पर ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान बनाया जाए, तिरंगे झंडे से अशोक चक्र को हटाया जाए, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों समेत सभी क‌िस्म का आरक्षण समाप्त किया जाए और एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए किसी भी प्रकार की सुविधाओं या अनुदान की व्यवस्था न हो।

इतिहास को मनमाने ढंग से गढ़ने की संघी आदत के अनुसार, पुस्तिका में पाठकों को यह विशेष जानकारी भी दी गई थी कि जब संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के पास संविधान का मसविदा भेजा गया, तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। जब जवाहरलाल नेहरु ने उनसे आग्रह किया और वचन दिया कि शीघ्र ही उसे बदल दिया जाएगा, तब जाकर उन्होंने उस पर हस्ताक्षर किए। इस पुस्तिका में भारत के नागरिक के लिए आवश्यक अर्हता भी बताई गई है: “राष्ट्र का नागरिक होने के लिए केवल जन्म लेना या अधिवास काफी नहीं है। राष्ट्र का नागरिक होने के लिए राष्ट्र के प्रति आस्था होना आवश्यक है। जो व्यक्ति भारत को मातृभूमि न समझे, भारत के प्रति राष्ट्रीयता का भाव नहीं रखे, केवल यहां जन्म लेने के कारण नागरिक नहीं हो सकता। संविधान की इसी कमजोरी ने भारत के नागरिकों में राष्ट्रभूमि, राष्ट्रीयता या मातृभूमि का भाव पैदा नहीं होने दिया। अतः नागरिक होने के लिए यह आवश्यक होना चाहिए था कि वह भारत को अपनी मातृभूमि समझे और राष्ट्र के प्रति आस्थावान हो।” पुस्तिका में यह नहीं बताया गया कि इस बात की जांच कैसे होगी कि कौन भारत को मातृभूमि समझता है और उसके प्रति आस्थावान है और कौन नहीं?

इसका जवाब बहुत पहले विनायक दामोदर सावरकर दे चुके थे। उनकी स्थापना थी कि भारत का नागरिक वही हो सकता है जिसकी यह केवल मातृभूमि ही नहीं बल्कि ‘पुण्यभूमि’ भी हो यानी जिसके धार्मिक स्थल भारत के भीतर ही हों। इस परिभाषा के अनुसार मुसलमान और ईसाई स्वतः ही पूर्ण नागरिक की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं क्योंकि उनके धार्मिक स्थल भारत के बाहर हैं। सावरकर ने ‘हिंदुस्तान’ की जगह ‘हिंदुस्थान’ लिखना शुरू कर दिया था जिसका स्पष्ट उद्देश्य अरबी-फारसी के शब्द ‘हिंदू’ के साथ संस्कृत शब्द ‘स्थान’ को जोड़कर उसका संस्कृतकरण करना था। उनका स्पष्ट रूप से यह भी कहना था कि अपने घर हिंदुस्थान में हिंदुओं को उसका स्वामी होना चाहिए। गोलवलकर का कथन है: “भारतवर्ष में हिंदू को कभी सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। वह सदा भारतभक्त रहा है और भारत की गौरव-रक्षा एवं प्रगति के लिए उत्कट प्रयास हेतु सन्नद्ध रहा है। भारत के राष्ट्रीय जीवनमूल्य वास्तव में हिंदुओं के जीवनमूल्य से उद्‍भुत हुए हैं। इस प्रकार वह यहां का ‘राष्ट्रीय’ है।” इसका स्पष्ट निहितार्थ है कि सांप्रदायिक केवल गैर-हिंदू ही होता है और ‘राष्ट्रीय’ एवं ‘हिंदू’ समानार्थी शब्द हैं। गोलवलकर का यह भी कहना था कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है, जहां जो भी आए टिक जाए और टिका ही रहे। यही नहीं, विदेश से आए समुदायों के लिए उनकी यह सलाह और चेतावनी भी है: “विदेशी तत्वों के लिए दो ही रास्ते खुले हैं। या तो वे राष्ट्रीय नस्ल में अपने को शामिल कर लें और उसकी संस्कृति को अपना लें, या फिर उसकी कृपा पर तब तक रहते रहें जब तक राष्ट्रीय नस्ल उसे ऐसा करने देती है और जब राष्ट्रीय नस्ल की इच्छा करे, वे देश छोड़ने के लिए तैयार रहें।” मुसोलिनी और हिटलर की प्रशंसा में गोलवलकर द्वारा कही गई बातें तो अब सर्वविदित हैं। यहूदियों के नस्ली सफाए की उन्होंने तारीफ की थी और कहा था कि भारत भी इससे सीख सकता है।

असम और कर्नाटक में बने डिटेंशन सेंटर किस ओर इशारा कर रहे हैं? खबर है कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून, जिसके तहत बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के भारत में लंबे समय से रह रहे नागरिक मकान आदि खरीद सकते हैं, केवल हिंदुओं, सिखों आदि गैर-मुस्लिम समुदाय के  सदस्यों पर ही लागू होगा।

नागरिकता संशोधन कानून के प्रावधान भी कुछ-कुछ इसी तरह के हैं। तो क्या अब स्वाधीन एवं लोकतांत्रिक भारत की नागरिकता और नागरिकों के अधिकार उनके धर्म के आधार पर तय किए जाएंगे? क्या यह हमारे संविधान की भावना के अनुरूप होगा? या यह उस राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप होगा जिसने स्वाधीनता संघर्ष से दूर रहकर केवल हिंदू समाज को संगठित करने का लक्ष्य ही अपने सामने रखा और उसी के हितों की बात सोची और अन्य धार्मिक समुदायों के हितों का विरोध किया? क्या नागरिकता की यह अवधारणा भारत जैसे विशाल देश में लागू की जा सकती है जिसका समाज अनेक धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और जीवन शैलियों से मिलकर बना है?

इन प्रश्नों के जवाब ही देश का भविष्य तय करेंगे। इस समय देश एक दोराहे पर खड़ा है और अपनी दिशा खोज रहा है।


(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)

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