Home नज़रिया सामान्य पाकिस्तान के भीतर निशाने मारने से बेहतर और भला क्या

पाकिस्तान के भीतर निशाने मारने से बेहतर और भला क्या

जनरल जे.जे. सिंह (पूर्व सेना प्रमुख) - MAR 07 , 2019
पाकिस्तान के भीतर निशाने मारने से बेहतर और भला क्या
नया संदेशः पाकिस्तान सीमा के पास भारतीय सेना की कार्रवाइयों पर खुशी जाहिर करते लोग, यह पाकिस्तान के हुक्मरानों के लिए भी सबक
PTI
जनरल जे.जे. सिंह (पूर्व सेना प्रमुख)
उसे समझाने का इससे अच्छा क्या विकल्प था

अब वक्त आ चुका है कि भारत दुनिया के सामने ऐलान करे कि अब उसकी सीमा में किसी तरह की हरकत या घुसपैठ करने वालों की खैर नहीं होगी। इस ऐलान का इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता था कि जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा के आसपास वाले इलाके में किसी अनुभवी सर्जन की तईं एकदम सटीक विशेष कार्रवाई की जाए या लड़ाकू विमान और मानवरहित एरियल व्हीकल (यूएवी) से निशानों पर सटीकता से मिसाइल दागे जाएं।  

यकीनन, उड़ी में सैन्य शिविर और पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के जवाब में हुई ऐसी कार्रवाइयों से पाकिस्तान के होश फाख्ता हो गए, क्योंकि पाकिस्तान को इसका अंदाजा भी नहीं रहा होगा। दरअसल, 26/11 के हमले के बाद भारत की प्रतििक्रया जैसे भारी राजनैतिक हो-हल्ले और बयानबाजियों तक ही सीमित रही, उससे पाकिस्तान कुछ बेपरवाह तक हो चला था। वह आश्वस्त हो चला था कि मीडिया में थोड़ा-बहुत हल्ला होगा, लोग कुछ दिन नाराजगी जाहिर करेंगे और फिर सब शांत हो जाएगा।

लेकिन पाकिस्‍तान के साजिशी हुक्मरान शायद भूल गए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में हालात बदल गए हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इन हवाई हमलों का सबसे ज्यादा असर नियंत्रण रेखा पर तैनात पाकिस्तान की सैन्य टुकड़ियों, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ और आतंकवादी जेहादी संगठनों पर हुआ है। आतंकी जेहादी संगठनों के हुक्‍मरानों को एक ओर जहां अपने साथियों का नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं उनके चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं। इस हमले के बाद वे सब चुपचाप मानो अपनी पूंछ दबाए अज्ञात जगहों पर छिप जाएंगे, क्लाशिनिकोव लिए बंदूकधारियों के साथ अब वे जल्दी नजर नहीं आएंगे।

एक सच्चाई ये भी है कि इस एयर स्ट्राइक को जिस गोपनीयता, दक्षता और मारक क्षमता के साथ अंजाम दिया गया है, उसको लेकर हमारे क्षेत्रीय इलाके के बाहर भी चर्चा हो रही है। इस हमले का असर चीन और अरब देशों पर भी हुआ है। लगभग सभी देशों ने अपने बचाव में भारत की आक्रामकता को प्रशंसनीय नजरों से देखा है। हालांकि कुछ देश प्रशंसा जताने में भी रणनीतिक तौर पर सोच-विचार कर रहे हैं। बहरहाल, ज्यादातर देशों ने इस बात को स्वीकार किया है कि पाकिस्तान प्रायोजित और पाकिस्तान की मदद से, उनके प्रशिक्षण और उनके दिशा निर्देशन और बहुत संभव है कि उनके नेतृत्व में हुए पुलवामा, पठानकोट और उड़ी हमले का जवाब देने का हक भारत को मिलना चाहिए था।

हमारे हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान ने किसी तरह के नुकसान से इनकार किया, लेकिन ठीक उसी वक्त वह मलबों को हटाने के काम में भी जुट गया। ट्रकों में भरकर हताहतों को हटाया गया ताकि वे इलाके की स्थिति को सामान्य बता सके। बाद में वह अपनी मीडिया को भी हमले की जगह पर ले गया, ताकि वह अपने दावे को सही ठहरा सके कि देखिए जिन जगहों पर स्ट्राइक हुआ है वहां कोई हताहत नहीं हुआ है। अगर ये कार्रवाई जमीनी हुई होती तो वह बताता कि ऐसी कोई कार्रवाई ही नहीं हुई है। ऐसी सूरत में 1999 के करगिल युद्ध की याद स्वाभाविक ही है जब पाकिस्तानियों को अपने कुछ सैनिकों के शव मिले थे तो परिवार वालों को आधी रात में शव सौंपे गए थे और उन्हें स्पष्ट निर्देश थे कि वे दिन निकलने से पहले उनका अंतिम संस्कार करें। उन सैनिकों को न तो कोई सम्मान मिला और न ही जनाजे की अंतिम रस्म अदा की गई और न ही उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आम नागरिकों को अनुमति ही दी गई। यह सब गोपनीयता के नाम पर किया गया।

मुशर्रफ की चालबाजी और दोहरेपन का अच्छा उदाहरण तब देखने को मिला जब एक ओर उन्होंने तख्तापलट कर खुद को पाकिस्तान का मुख्य प्रशासक और बाद में राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया और दूसरी ओर उन्होंने अपनी पुस्तक इन द लाइन ऑफ फायर में लिखा, जब भी सेना को मार्शल लॉ लागू करके सरकार चलाने को आगे आना पड़ा, वह अपनी महत्वपूर्ण सैन्य भूमिका से भटक गई। इससे प्रशिक्षण और सैन्य अभियान चलाने की तैयारी पर प्रतिकूल असर पड़ा। उन्होंने भारत-पाक के 1971 के बाद की सबसे खराब स्थिति में अपनी सेना को उस समय धकेल दिया जब उन्होंने बिना विचार किए करगिल की चोटियों को कब्जाने का जुआ खेला। उन्होंने इसकी भी योजना नहीं बनाई कि इस संघर्ष को कैसे समाप्त किया जाएगा। उन पर आखिरी टिप्पणी मुर्तजा रजवी ने इंडियन एक्सप्रेस में 9 अक्टूबर 2010 के लेख में की, त्रासदी यह नहीं है कि मुशर्रफ ने ‘बनाना रिपब्लिक’ का शासन चलाया, बल्कि त्रासदी यह है कि जब वे गए, उन्होंने देश को बर्बाद कर दिया।

नवंबर 2010 में अपने पहले भारतीय दौरे के समय बराक ओबामा ने कहा कि भारत उभरती ताकत नहीं, बल्कि वैश्विक ताकत है। वैश्विक मामलों में भारत की बढ़ती भूमिका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पांच स्थाई सदस्य देशों ने पिछले कुछ वर्षों में भारत का दौरा किया। इनमें से कुछ राष्ट्राध्यक्षों ने एक बार से ज्यादा दौरे किए और कुछ तो हमारे गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि भी बने। कुछ तो एक से अधिक बार गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि रहे। उभरती हुई अर्थव्यवस्था और करीब 7-8 फीसदी की वृद्धि दर बनाए रखकर भारत 21वीं सदी में वैश्विक पटल पर अपना प्रभाव छोड़ने को तैयार है। कोई भी देश अपने मूल मूल्यों को महफूज रखने और विरोधियों की आक्रामक कार्रवाई का जवाब देने की क्षमता के बगैर चीन जैसी विशाल आर्थिक ताकत नहीं बन सकता। और शांति की एकतरफा चाहत सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती। साथ ही, हमने प्राचीन और हालिया दोनों इतिहासों से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सबक सीखा है।

दुर्भाग्य से भारत एक अस्थिर और अशांत क्षेत्र में है, जहां पाकिस्तान से वैश्विक आतंकवाद का संचालन होता है और अशांत तथा अनिश्चित अफगानिस्तान-पाकिस्तान का सीमाई इलाका है, जो जेहादियों की भाषा में ‘इलाका गैर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके बावजूद अपने पड़ोस में सुरक्षा और स्थिरता बढ़ाने के लिए हमें सकारात्मक और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तमाम मुश्किलों के बावजूद जीवंत लोकतंत्र, मजबूत अर्थव्यवस्था और शक्तिशाली तथा आधुनिक सैन्य उपकरणों के साथ आधुनिक राष्ट्र के अन्य सभी तत्व आज भारत की पहचान हैं। ‘सख्त कार्रवाई और नरम व्यवहार’ की हमारी रणनीति ने पंजाब, पूर्वोत्तर, मिजोरम, नगालैंड और मणिपुर में आतंकवाद को प्रभावी तरीके से समाप्त किया और इन जगहों पर आज शांति है। घाटी के अलावा जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों में भी शांति है। आतंकियों और उनके मददगारों के खिलाफ निश्चित तौर पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है, जबकि इस तरह के हिंसक माहौल में फंसे निर्दोष नागरिकों को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करने की जरूरत है। ऐसे नागरिकों का दिल और दिमाग जीतने के लिए नरमी बरतना भी जरूरी है।   

भारत के साथ पाकिस्तान कई मुद्दों पर विपरीत राय रखता है। मुख्य मुद्दा कश्मीर है, जो विभाजन का एक अधूरा एजेंडा है। पाकिस्तान कभी इस सच को स्वीकार नहीं कर पाया कि जम्मू-कश्मीर का 1947 में भारत में विलय हुआ था और उसका पूरा इलाका भारत का है। पाकिस्तान की स्थापना के बाद से ही उसकी सेना ने जम्मू-कश्मीर को मुक्त कराने के नाम पर एक अव्यवहारिक और ‘शेख चिल्ली’ रवैया अपना रखा है, क्योंकि यह मुस्लिम-बहुल राज्य है। वह इस सच को कभी स्वीकार नहीं कर पाया कि कश्मीर घाटी के अलावा लद्दाख, करगिल, डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और जम्मू जैसे इलाके भी जम्मू-कश्मीर के हिस्से हैं, जो सांस्कृतिक, जातीय, धार्मिक और भौगोलिक तौर से भिन्न हैं। यही कारण है कि कश्मीर की घाटी, जो राज्य का केवल पांचवां हिस्सा है, पूरे जम्मू-कश्मीर की भावनाओं का इजहार नहीं करती है। कश्मीर को छीनने के लिए घुसपैठियों के रूप में सैनिकों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान तीन बार 1947, 1965 और 1999 (करगिल) में सुनियोजित और छद्म सैन्य अभियान चला चुका है। हर बार इसमें उसने बुरी तरह मुंह की खाई। उसके दुस्साहस ने गरीबी उन्मूलन के मामले में पाकिस्तान को दशकों पीछे धकेल दिया और कुछ हद तक भारत की प्रगति को भी धीमा किया। हालांकि, अपने बड़े आकार, संसाधनों, युवा आबादी और लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ कई तूफान झेल चुका भारत एक प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर अपनी जगह लेने के लिए आगे बढ़ रहा है। पाकिस्तान अब भी लचर शासन और कमजोर नेतृत्व में फंसा हुआ है। उसके इतिहास में ज्यादातर वक्त सत्ता में सेना का नियंत्रण रहा है।

पाकिस्तान को उसके संस्थापक जिन्ना किसी मध्यकालीन इस्लामी राज्य के बजाय एक प्रगतिशील और आधुनिक मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहते थे, जहां अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक मान्यताओं के साथ जीने की आजादी हो और वे पाकिस्तानी नागरिक होने पर गर्व कर सकें। जाहिर है, पाकिस्तानी प्रतिष्ठानों ने जो रास्ता चुना, वह देश को पूरी तरह से अलग दिशा में लेकर चला गया। 

दुर्भाग्य से, पिछले सात दशकों से पाकिस्तान ने ऐसी बुनियादी गड़बड़ियां और खाइयां बनाई हुई हैं, जो अब लाइलाज होती जा रही हैं। इनमें सबसे अहम अमीर और गरीबों के बीच भारी खाई है। गरीबों की हालत इतनी बदतर है कि पिछले कुछ दशकों से उन्हें अतिवादी कट्टरपंथ में ही अपनी मुक्ति दिखती है। वे अधिकांश जेहादी और आतंकी गतिविधियों के लिए आसानी से चारा बन जाते हैं। दूसरी गंभीर खाई सुन्नी-शिया के बीच है, जो इस्लाम के अन्य सभी पंथों जैसे अहमदिया वगैरह के मामले में और तीखी हो गई है। तीसरी खाई पंजाबी बनाम अन्य की है। पाकिस्तानी समाज के ज्‍यादातर हिस्सों में पंजाबियों का दबदबा है।

चौथे, पाकिस्तान में बसे मुहाजिर समुदाय को अभी भी बाहर का ही माना जाता है। ये वे लोग हैं जो पाकिस्तान बनने के बाद भारत के विभिन्न हिस्सों से वहां जा बसे थे। लेकिन अब तो इस समुदाय की अगली पीढ़ियां पाकिस्तान में पैदा हुईं और पली-बढ़ी हैं। फिर भी उन्हें मुहाजिर ही माना जाता है। उनके नाती-पोते भी मुहाजिर ही कहलाएंगे। इसका दूसरा रूप भारत में पाकिस्तान से आए हिंदू और मेरे जैसे सिख परिवारों के मामले में देखने को मिलता है, जो अपना सब कुछ खोकर आए थे। उन्हें यहां जमीन, संपत्ति सब कुछ मिली। कुछ वर्षों के बाद शरणार्थी भी कहना लोगों ने छोड़ दिया। हम सब भारतीय समाज में समाहित हो गए और न केवल खुद को समृद्ध किया बल्कि भारत को मजबूत राष्ट्र बनाने में भी अपनी भागीदारी निभाई।

ऊपर बताई गई विध्वंसक नीतियों की वजह से आज पाकिस्तान के लोग ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं। जेहादियों की अनियंत्रित गतिविधियों को जिस तरह से उन्होंने बढ़ावा दिया है, उसकी वजह से पाकिस्तान आज पूरी दुनिया में इस्लामिक चरमपंथ और आतंकवाद का चेहरा बन गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान आज झूठ और अहंकार की राष्ट्रीय नीति पर चल रहा है। हालांकि अब समय आ गया है कि वह इस बात को समझे कि दोमुंही रणनीति पर ज्यादा समय तक नहीं चल सकता। ऐसी रणनीति निश्चित तौर पर आपको जल्द या कुछ समय के बाद नुकसान ही पहुंचाएगी। यह अपने लिए गड्ढा खोदने के समान है। उन्हें अपने संगठन जमात-ए-इस्लामी की उस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जो उसने अपने मुखपत्र जसरत में करगिल युद्ध के समय कहा था कि जेहाद झूठ की इमारत पर नहीं किया जा सकता है।

मैंने अपनी किताब ए सोल्जर जनरल में लिखा है कि पाकिस्तान को स्थिर और संपन्न राष्ट्र बनाने की अमेरिका, भारत, चीन और दुनिया के दूसरे देशों की इच्छा के बावजूद उसके तबाह होने की संभावना है। मैंने तो अपनी किताब में पाकिस्तान पर जाने-माने विशेषज्ञ स्टीवेन कोहेन की उस बात का उल्लेख किया है जो उन्होंने 2007 में एक कार्यक्रम में कही थी। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान तबाही का वह बटन है जिसे दबा दिया गया है। केवल पाकिस्तान के लोग ही उसे बचा सकते हैं। उनके लिए यह समय ऐसा है जैसे किसी बम की सुतली में अाग लगा दी जाए और आग को डेटोनेटर तक पहुंचने से पहले बुझाना हो। सौभाग्य से कुछ संकेत ऐसे मिल रहे हैं, जिससे उम्मीद की किरण दिखती है।

पाकिस्तान की जनता और नेतृत्व को इस समय अहम कदम उठाना होगा। पाकिस्तान के हित में यही है कि वह अपने यहां फल-फूल रहे आतंकी संगठनों को तबाह करे। एक मार्च 2019 को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह अहमद कुरैशी का यह बयान कि पाकिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा, काफी उम्मीद जगाता है। हम ऐसी आशा करते हैं कि कुरैशी का यह बयान 2002 में परवेज मुशर्रफ के दिए बयान जैसा नहीं होगा, जिसने उस समय कहा था कि पाकिस्तान ने अपनी जमीन से आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का ठेका नहीं ले रखा है। लेकिन मुशर्रफ ने यह बयान केवल दुनिया को भ्रम में डालने के लिए दिया था, जिससे पाकिस्तान उस वक्त भारत के किसी सख्त एक्शन से बच जाए।

मुझे पता है कि 2002 में ऑपरेशन पराक्रम के समय, जब हम वन स्ट्राइक काॅर्प में थे, उस वक्त हम पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। लेकिन अमेरिकी हस्तक्षेप की वजह से हमें रोक दिया गया था। मुशर्रफ पूरी दुनिया को मूर्ख बनाने में सफल हो गया था। जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि हम अपना पड़ोसी बदल नहीं सकते, हमें शांति से रहना सीखना होगा। साथ ही गरीबी के खिलाफ जारी लड़ाई को जीतना होगा। मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान भी इसे समझेगा।

(लेखक पूर्व सेना प्रमुख हैं)

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से