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एम्सटर्डम में आतंकी हमला; यूरोप के जागने का समय

SEP 03 , 2018

शांतनु मुखर्जी

31 अगस्त के दिन भीड़भाड़ वाले स्टेशनों में शामिल एम्सटर्डम रेलवे स्टेशन पर उस समय अफरा-तफरी मच गई जब अमेरिका के दो टूरिस्टों पर एक आतंकवादी ने हमला कर दिया। हमला करने वाला यह आतंकवादी अफगानिस्तान से आया शरणार्थी था जो जर्मनी में रह रहा था। एम्सटर्डम को निशाना बनाने का अपना एक मतलब है। यहां ढाई लाख टूरिस्ट रोज होते हैं। डच सुऱक्षा कर्मियों के लिए यह एक विफलता है। वे न सिर्फ इसे रोक सके बल्कि उनका खुफिया तंत्र भी इसकी भनक पाने में नाकाम हो गया। हालांकि यह सही है कि हर व्यक्ति पर चाक-चौबंद निगाह नहीं रखी जा सकती लेकिन अफगानिस्तान से जर्मनी आने वालों पर तो उनको जरुर सर्तक हो जाना चाहिए था, उन पर नजर रखी जानी चाहिए थी। डॉयच पुलिस अब कह सकती है कि उसे गिरफ्तार करने या शूट करने की स्थिति में वह अधिक नुकसान पहुंचा सकता था।

19 वर्षीय अफगानी जावेद एस जर्मनी में एक अमेरिकी पर चाकू से हमला करके दहशत पैदा कर, खबरों में जगह पाना चाहता था। ऐसे में यह निश्चित है कि ये आतंकी इस्लामिक स्टेट से प्रेरित रहा हो। घायलों का इलाज किया जा रहा है और उनकी स्थिति में सुधार भी हो रहा है। हालांकि अभी जांच होनी बाकी है औऱ उसके बाद ही चीजें स्पष्ट होंगी कि जावेद का असल मकसद क्या था लेकिन जर्मनी में उसके घर से मिले दस्तावेज आंतकी संगठनों से उसकी लिंक की ओर इशारा कर रहे हैं। इसी बीच डच काउंटर टेररिज्म चीफ डिक स्कॉफ द्वारा नीदरलैंड को हाईअलर्ट पर रखने की बीच डच प्रधानमंत्री ने इस बात की पुष्टि की है कि यह अफगानी आतंकी था। हाई अलर्ट पर रखा जाना इस बात की संभावना को बल देता है कि आगे और भी इस तरह से हमले हो सकते हैं।

थोड़ा रुककर इस पूरे सुरक्षा तंत्र में डच सिक्योरिटी की भूमिका देखते हैं। हॉलैंड इस मामले में अकेला देश नहीं है बल्कि लगभग पूरा यूरोप सीरिया, सोमालिया, लीबिया और दूसरे देशों से आने वाले शरणार्थियों की शरणस्थली बना हुआ है।

मानवीय दृष्टि से ये देश शरणार्थियों के लिए बेहद नरम रुख अपनाते हैं, उनसे संवेदना दर्शाते हैं लेकिन इसी बीच सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ज्यादा अलर्ट नहीं रहते परिणाम स्वरुप आंतकियों को आसानी से अपनी गतिविधियों को अंजाम देने का मौका मिल जाता है। इनमें से तमाम लोग पश्चिम की समृद्धि और संस्कृति से नफरत करने वाले होते हैं। उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया आदि देशों से आने वाले शरणार्थियों से नीदरलैंड भर रहा है। उनमें से कइयों को डच पासर्पोर्ट भी मिल चुका है लेकिन दिल में वे अभी भी नफरत पाले बैठे हैं। 

इस एक उदाहरण को देखिए। मोरक्को मूल के दो लड़के अहमद अल बकौली और खाक अल मस्सनई जनवरी 2002 में भारत की यात्रा करते हैं। इस दौरान इन्होंने श्रीनगर में बीएसएफ के जवानों की हत्या करने की कोशिश की थी। हालांकि इन दोनों को मार गिराया था लेकिन उस वक्त नीदरलैंड की सरकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का बहुत रोना-धोना हुआ था और भारतीय सुरक्षा कर्मियों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाए गए थे। हम देखते हैं कि मानवाधिकारों की बहस हर बार आतंकवाद से आगे निकल जाती है।

हम देखेंगे तो पाएंगे कि इस तरह के हमलों का यूरोप में एक पैटर्न सा बन चुका है। याद कीजिए साल 2015 में फ्रांस को, जिसमें चार्ली ऐब्दो पर हमला हुआ, या फिर उत्तरी अफ्रीका से आए अब्दुल्ला ने कुल्हाड़ी से प्रसिद्ध लॉवरे म्यूजियम के गार्ड को मार दिया था।

वीजा देने के मामले में फ्रांस बहुत उदारता दिखाता है। लेकिन उसको आतंकी हमले के रुप में इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है। बेल्जियम में भी इसे अच्छी खासी संख्या में देखा जा सकता है और जर्मनी या यूरोप के अन्य देशों में भी ऐसी छिटपुट घटनाएं सामने आती रही हैं। साल 2016 की फरवरी में मोरक्को से आए एक शरणार्थी जाओदद ने नीदरलैंड की एक सार्वजनिक जगह में भीड़ के बीच इस्लामिक स्टेट का झंडा फहराया। पुलिस की पूछताछ में बाद में पता चला कि वह रॉटरडम पोर्ट पर हमले की योजना बना रहा है। अगर वह  अपने मकसद में कामयाब हो गया होता तो बहुत गंभीर परिणाम होते।

इस तरह की घटनाएं बता रही है कि ये शरणार्थी इस्लामिक स्टेट से प्रेरित हैं और यूरोप की जटिल स्थिति इसे आसान टारगेट बना रही है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि इस्लामिक स्टेट के कमजोर होने के बाद उसके लड़ाके वापस लौटने लगे हैं, यही लड़ाके इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। हालांकि यूरोप की सीमाएं सुरक्षा के लिहाज से बहुत चाक-चौबंद हैं लेकिन फिर भी यह डर बना रहता है बाल्कन देशों से कहीं कोई  न आ जाए।

इन परिस्थितियों से बीच यूरोपीय एजेंसियों और खासकर हॉलैंड की एजेंसियों के लिए यह जरुरी हो गया है कि वे अपने खुफिया तंत्र को मानवीय और तकनीकि, दोनों ही रुप से मजबूत करें। उन्हें चाहिए कि वे आने वाले शरणार्थियों के बारे में अधिक जानकारी जुटाएं जिससे उनके गलत इरादों को अंजाम तक पहुंचाने से पहले रोका जा सके।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि आतंकवादियों द्वारा यूरोप के बाहर भी अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए और व्यापक योजना का ब्लू प्रिंट बनाया गया हो।

(लेखक सुरक्षा मामलों के जानकार हैं और मॉरीशस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं। व्यक्त विचार निजी हैं)


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