Home नज़रिया सामान्य ‘ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों से इनकार करना मरने वालों का अपमान है’

‘ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों से इनकार करना मरने वालों का अपमान है’

रूबेन बनर्जी - JUL 21 , 2021
‘ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों से इनकार करना मरने वालों का अपमान है’
‘ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों से इनकार करना मरने वालों का अपमान है’
पीटीआइ
रूबेन बनर्जी

मुझे अचरज है कि उस समय कनिका दुग्गल के दिमाग में क्या चल रहा होगा, जब केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार को यह कहते हुए सुना होगा कि देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी के कारण कोई मौत नहीं हुई हैं।

कनिका, जिन्हें हमने अपने हाल के आउटलुक कवर में चित्रित किया था, ने अपने एक दु:खद विवरण में बताया था कि कैसे दिल्ली के विवेक विहार निवासी उनकी 54 वर्षीय मां रमन की ऑक्सीजन की कमी के कारण दर्दनाक मौत हो गई थी। कोरोना वैक्सीन की पहली डोज लगने के कुछ दिनों बाद ही रमन का कोविड टेस्ट पॉजिटिव आया था। धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती गई और उन्होंने खुद को एक ऐसे अस्पताल में पाया जहां धीरे-धीरे ऑक्सीजन खत्म हो रहा था। हालांकि कनिका और उनकी बहनें भी कोविड पॉजिटिव थीं, लेकिन वे एक दिन भी रुके बिना ऑक्सीजन सिलेंडर लेने के लिए इधर-उधर भागती रहीं, जब सिलेंडर मिला तब तक रमन की मौत हो चुकी थी।

कनिका की यह कहानी उस दौर की है जो अप्रैल-मई के दौरान चरम पर रहने वाले कोविड महामारी के सबसे बुरे दिनों के दौरान आम थी। हम सभी ने ऐसी दिल दहला देने वाली कहानियां सुनी हैं, भले ही हम भाग्यशाली हों कि हमें खुद इसका अनुभव नहीं हुआ। उन महीनों के दौरान ऑक्सीजन की काफी कमी थी और पूरी तरह से वास्तविक थी। जैसे-जैसे कोविड के मामले बढ़ते गए, हर एक परिवार को ऑक्सीजन की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा जिसकी अचानक कमी दिखने लगी थी। ऑक्सीजन सिलेंडर के अचानक कमी के कारण हमने भीख मांगा, उधार लिया और संभवत: सिलेंडर भी चुराए ताकि हम अपने परिवार वालों या करीबियों की जान बचा सकें। इस स्थिति के बीच कई बच गए, लेकिन सैकड़ों ने अपनी जान गंवा दी। उन बुरे दिनों की यादें आज भी एक भयावह वास्तविकता के रूप में हमारे दिमाग में अमिट रूप से अंकित हैं, जो कभी नहीं मिटेगी।

लेकिन जब मंगलवार को स्वास्थ्य राज्य मंत्री, संसद के ऊपरी सदन में समकालीन भारत में सबसे खराब संकट के दौरान सरकार का बचाव करने के लिए सामने आए तो हमारे साझा अनुभवों की गिनती बहुत कम हो गई। उन्होंने अपनी सरकार का बचाव करते हुए जोर देकर कहा कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई किसी भी मौत की सूचना नहीं दी है। सरकार के नजरिये से मंत्री ने कुछ राजनीतिक अवसरों को हासिल करने के लिए उन्होंने एक विश्वसनीय काम किया। उन्होंने इस दौरान आंकड़ों के बाद आंकड़ें जारी किए, ताकि इस बात पर जोर दिया जा सके कि केंद्र सरकार ऑक्सीजन की कमी को दूर करने के लिए संकटग्रस्त राज्यों के बचाव में कैसे आई। एक के बाद एक आंकड़े जारी करते हुए उन्होंने बताया कि इतने अधिक ऑक्सीजन का उत्पादन हुआ, इतने अधिक ऑक्सीजन को ट्रांसपोर्ट किया गया।  

मंत्री की बात को हमने भी सुना लेकिन अविश्वसनीय रूप से। उन्होंने जो दावा किया और जो हमने किया, उसके बीच का अंतर बिल्कुल अलग था। उसका बचाव चाहे कितना ही नैदानिक क्यों न हो, यह करुणा से रहित लग रहा था। इसमें संभवतः पश्चाताप का भी अभाव था और किसी भी तरह से उनके बयान ने हमें उन कई त्रासदियों को भूलने में मदद नहीं की, जो उन अंधकारमय और भयानक महीनों के दौरान एक बड़े स्तर पर हमारे सामने आई थीं।

मंगलवार को मंत्री ने जो भी कहा, उसने हमारी चिंता को और बढ़ा दिया। सरकार चाहे कुछ भी कहे, ऑक्सीजन संकट ने लोगों की जान ले ली। इसे नकारने का अर्थ है कि हमने सबक नहीं सीखा है और लोगों की ताड़ना से दूर हैं। इसका मतलब यह भी है कि विशेष रूप से कोई भी जिम्मेदार नहीं था और कभी भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा, हालांकि केवल जवाबदेही ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि इस तरह का संकट कभी हमारे ऊपर न आए।

राजनीतिक कारण जो भी हो, लेकिन सरकार ने ऐसा कदम क्यों चुना? ऐसा नहीं हो सकता कि वह इतनी भोली नही हो सकती है कि उसे पता ही नहीं चला कि उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है। वर्तमान सरकार को भी एक ऐसे कोकून में सीमित नहीं माना जा सकता है जिसने खुद को कठोर वास्तविकताओं से पूरी तरह से अलग कर लिया है। 

"अविश्वसनीय" इनकार के पीछे हो सकता है कि सरकार अपनी ताकत को सही ढंग से पेश करने में भरोसा रखती हो। बाहरी और आंतरिक दोनों रूप में खतरों से प्रभावित न होते हुए, इसने हमेशा खुद को एक शक्ति शाली इकाई के रूप में खड़ा किया है। इसके आलोचकों का कहना है कि अनुमानित शक्ति जरूरत से अधिक है। जो अक्सर झांसा और धमकी देकर हासिल की जाती है, लेकिन मजबूती से इसे हमेशा किसी भी चुनौती का सामना करते हुए देखा जाना चाहिए। यह कोविड में शामिल है।

यह बड़ा उद्देश्य होने के कारण मंत्रियों का इनकार तत्काल लक्ष्य को पूरा करता है। हालांकि यह कनिका दुग्गल जैसी लड़कियों के लिए कोई सांत्वना नहीं है। उसने देखा कि उसकी मां धीरे-धीरे दम तोड़ रही है, लेकिन सरकार के इनकार के बाद उसे नए सिरे से सोचना चाहिए कि उसकी मां की मौत बेवजह कैसे हुई।

हमें इस पर भी सोचना चाहिए कि हाल ही में राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने संसद में मार्मिक ढंग से क्या कहा था। बिहार के सांसद ने ऑक्सीजन संकट की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि हम न केवल जीवन में, बल्कि मृत्यु में भी सम्मान के पात्र हैं। असम्मानजनक मृत्यु के बाद कनिका की मां को संभवतः उस सम्मान से भी वंचित किया जा रहा है जो सरकार के इनकार के कारण है।

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