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सपा-बसपा के अंकगणित से बढ़कर है भाजपा की हार का गणित

MAR 14 , 2018

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर, फूलपुर और बिहार की अररिया लोकसभा सीट पर हुए उपचुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। बसपा की मदद से गोरखपुर और फूलपुर में सपा को मिली जीत ने धुर विपक्षी दलों के गठबंधन की संभावना को पुख्ता कर दिया है। अररिया में राजद की जीत भी लालू परिवार की हिम्मत बढ़ाएगी। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में भाजपा का तीन दशक से चला आ रहा वर्चस्व टूटा, जबकि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर भी भाजपा बरकरार नहीं रख पाई। बिहार में राजद नेता मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के निधन से खाली हुई अररिया सीट पर उनके बेटे सरफराज आलम ने जीत हासिल कर नीतीश कुमार को झटका दिया।  जदयू छोड़कर लालू के पाले में गए सरफराज आलम 61 हज़ार वोटों से जीते हैं। 

इन नतीजों ने मोदी-शाह-योगी की चुनाव ‌जिताऊ तिकड़ी का जादू कुछ फीका कर दिया है। सपा-बसपा की एकजुटता को मिली काययाबी भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। मायावती और अखिलेश की यह जुगलबंदी 1993 के मुलायम-कांशीराम गठजोड़ की याद दिलाती है। हालांकि, मजबूरी के गठजोड़ निभाने के मामले में दोनों ही दलों का रिकॉर्ड खराब है। सपा का कांग्रेस से गठबंधन पिछले साल ही फेल हुआ है। बसपा के सामने अपनी सियासी जमीन बचाने की मजबूरी है। ऐसे में गोरखपुर जैसे गढ़ में भाजपा की हार 2019 के लिए कई संकेत दे रही है। जैसे, सपा की जीत विपक्षी एकता के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। 

मायावती ने गोरखपुर और फूलपुर में बहुत सोच-विचार के बाद सपा उम्मीदवारों को समर्थन देने का ऐलान किया था। लेकिन साथ ही कहा था कि गठबंधन पर बाद में बात होगी। फिलहाल भाजपा को हराना है। तभी से इन उपचुनावों को सपा-बसपा के संभावित गठबंधन का ट्रायल माना जाने लगा था। लेकिन संशय था कि दोनों पार्टियों के लोग एकजुट हो पाएंगे कि नहीं। गोरखपुर योगी का गढ़ था तो फूलपुर में निर्दलीय अतीक अहमद सपा-बसपा का खेल बिगाड़ने के लिए मैदान में थे। दोनों जगह कांग्रेस भी मुकाबले में थी। फिर तेजी से उभरे एक सियासी समीकरण ने योगी के गढ़ और मौर्य के मैदान में खलबली मचा दी। और पासा पलट गया।

सपा को मिला बसपा से भी ज्यादा: उपचुनाव के नतीजों ने यह गलतफहमी दूर कर दी है कि बसपा के वोट दूसरे को ट्रांसफर होने मुश्किल हैं। गोरखपुर और फूलपुर के नतीजे बताते हैं कि बसपा के वोट न सिर्फ सपा के खाते में गए बल्कि स्थानीय स्तर पर सपा और बसपा कार्यकर्ताओं के बीच जोरदार तालमेल देखने को मिला। दोनों पार्टियां अतीत की कड़वाहट भुलाकर एक साथ आईं और इनकी जीत ने भावी गठबंधन की जमीन तैयार कर दी। 

अखिलेश यादव बसपा सुप्रीमो मायावती को बुआजी कहकर बुलाते हैं। सियासी मजबूरी के बीच मायावती के साथ अखिलेश की कैमिस्ट्री ने नया समीकरण तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। जबकि भाजपा के नेता गलतफहमी पाले रहे कि बसपा के वोट सपा को ट्रांसफर नहीं होंगे। फूलपुर हारने के बाद केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि हमें बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि बसपा के वोट भी इस तरह से सपा के खाते में चले जाएंगे। योगी आदित्यनाथ ने सपा-बसपा के तालमेल को समझने में चूक और अति-आत्मविश्वास को दोनों सीटों पर हार की प्रमुख वजह माना है। 

बिगड़ा भाजपा का गणित: सपा-बसपा के तालमेल को गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। नतीजों को देखने से लगता है कि मुस्लिम और दलित मतदाताओं के साथ-साथ ओबीसी के वोट भी सपा के खाते में गए। लेकिन सपा-बसपा की एकजुटता के साथ-साथ भाजपा के अंदरूनी नुकसानात की अनदेखी भी नहीं जा सकती।

गोरखपुर में 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ को 5.39 लाख वोट मिले थे, जो कुल पड़े मतों का करीब 52 फीसदी थे। लेकिन इस उपचुनाव में यहां भाजपा उम्मीदवार उपेंद्र शुक्ला को 4.34 लाख मत मिले हैं, जो पहले से 5.5 फीसदी कम हैं। भाजपा को गोरखपुर में एक लाख से ज्यादा वोटों का नुकसान हुआ है। यह भाजपा का अपना नुकसान है। विपक्षी दलों की लामबंदी के अलावा भाजपा के हाथ से फिसले इन वोटों ने सपा की जीत में अहम भूमिका निभाई।

2014 में गोरखपुर में सपा और बसपा को मिलाकर कुल 4.02 लाख वोट मिले थे, जो करीब 39 फीसदी थे। इसमें सपा को 22 फीसदी और बसपा को 17 फीसदी वोट मिले थे। इस बार बसपा के समर्थन से सपा उम्मीदवार प्रवीण निषाद को 4.56 लाख वोट मिले, जो कुल पड़े मतों का 49 फीसदी हैं। इस तरह 2014 में योगी आदित्यनाथ को मिली 3 लाख वोटों से ज्यादा की जीत करीब 21 हजार वोटों से भाजपा की हार में बदल गई। 

अगर मान भी लिया जाए कि बसपा के पूरे 17 फीसदी वोट सपा को ट्रांसफर हो गए, तब भी 2014 के मुकाबले सपा को 10 फीसदी ज्यादा वोट मिले हैं। समझने वाली बात यह है कि ये 10 फीसदी वोट सपा के हिस्से में कहां से आए? बेशक, निषाद पार्टी और पीस पार्टी जैसे छोटे दलों का साथ भी कारगर रहा। इसके अलावा 2014 में कुल 5.5 फीसदी वोट कांग्रेस और आप के खाते में गए थे, इस बार आप मैदान में नहीं थी और कांग्रेस को सिर्फ 2 फीसदी वोट मिले। यानी कांग्रेस का वोट भी सपा की ओर शिफ्ट हुआ। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि सपा-बसपा के एकजुट होने और जिताऊ गठबंधन सामने होने से भाजपा विरोधी मतदाता लामबंद हुए। जाहिर है इस दोतरफा मुकाबले में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। गोरखपुर और फूलपुर में कांग्रेस की जमानत जब्त होने और सपा का वोट बढ़ने से भावी गठबंधन में कांग्रेस की दावेदारी प्रभावित हो सकती है। यहां मैदान में उतरकर कांग्रेस ने अपनी कमज़ोरी उजागर की है।

गोरखपुर में भाजपा को हुए 5 फीसदी वोटों के नुकसान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस नुकसान में कुछ योगदान ठाकुरवाद से त्रस्त ब्राह्मण और जीएसटी से परेशान व्यापारी वर्ग का भी हो सकता है। कम मतदान एक बड़ा कारण है। लेकिन भाजपा के मतदाता का जोश अगर ठंडा पड़ा तो इसके कारण भी पार्टी को तलाशने होंगे।

फूलपुर की कहानी गोरखपुर से अलग नहीं है। 2014 में फूलपुर में भाजपा उम्मीदवार केशव प्रसाद मौर्य को करीब 5.03 लाख वोट मिले जो कुल पड़े मतों का 52 फीसदी था। तब सपा को 20 फीसदी और बसपा को 17 फीसदी यानी दोनों को मिलाकर कुल 37 फीसदी वोट मिले थे। अब बसपा के समर्थन से यहां सपा उम्मीदवार नागेंद्र पटेल को 3.43 लाख यानी करीब 47 फीसदी वोट मिले हैैं। जबकि भाजपा के वोट 5 लाख से घटकर 2.83 लाख यानी 39 फीसदी रह गए। भाजपा को 13 फीसदी वोटों का नुकसान हुआ और 2014 के मुकाबले 2.17 लाख वोट कम मिले। इसे कम मतदान से जोड़कर देख सकते हैं। मगर मतदाता की यह बेरुखी भी भाजपा को चिंतित करेगी।

यहां भी अगर मान लिया जाए कि फूलपुर में बसपा के पूरे17 फीसदी वोट सपा को ट्रांसफर हो गए तब भी सपा को 10 फीसदी वोट ज्यादा मिले हैं। भाजपा को हुआ 2 लाख से ज्यादा मतों का नुकसान इसमें निर्णायक रहा। इसका कुछ श्रेय सत्ता विरोधी लहर और उसे भुनाने में अखिलेश की कामयाबी को भी दिया जाना चाहिए। जिसके कारण केशव प्रसाद मौर्य की 3 लाख से ज्यादा वोटों की जीत फूलपुर में भाजपा की 59 हजार वोटों से हार में तब्दील हो गई। बेशक, बसपा के समर्थन ने सपा को एकमुश्त वोट और मजबूत आधार दिया। 

ये नतीजे बताते हैं कि गठबंधन का गणित अपनी जगह था, मगर सपा ने गठबंधन के अंकगणित से बढ़कर कामयाबी हासिल की है। हालांकि, फूलपुर में अतीक अहमद ने 48 हजार वोट हासिल कर मुस्लिम मतदाताओं में थोड़ी सेंध लगाई। मगर कांग्रेस के वोट 58 हजार से घटकर 19 हजार रह गए। संभव है कांग्रेस का यह वोट सपा की तरफ शिफ्ट हुआ। कांग्रेस के ब्राह्मण उम्मीदवार से कुछ न कुछ नुकसान भाजपा को भी हुआ होगा। लेकिन सपा को बसपा का समर्थन सबसे बड़ा फैक्टर साबित हुआ। सपा और बसपा मिलकर दो दुनी पांच हो गए!

एक बात और साफ है कि भाजपा के खिलाफ मजबूत गठबंधन होने की स्थिति में मुकाबला दोतरफा हो जाता है। सपा और बसपा दोनों मैदान में हो तो मुकाबला त्रिकोणीय या चौतरफा होने से भाजपा फायदे में रहती है। 2014 और 2017 के नतीजों से इस बात को समझा जा सकता है। तब मोदी और योगी लहर के अलावा भाजपा विरोधी मतों का विभाजन भी भाजपा के लिए फायदेमंद रहा। इस कमजोरी को विपक्ष कारगर गठबंधन से दूर करना चाहेगा।

अररिया में लालू प्रसाद यादव की राजद के उम्मीदवार को 2014 में 42 फीसदी वोट मिले थे जो इस बार बढ़कर 49 फीसदी तक पहुंच गए। भाजपा को वहां 43 फीसदी वोट मिले जो 2014 में भाजपा को मिले 27 फीसदी और जदयू को मिले 23 फीसदी के योग के कम हैं। मतलब जैसे सपा-बसपा दो दुनी पांच हुए, अररिया में जदयू-भाजपा वो कमाल नहीं दिखा सके। वहां जदयू का वोट राजद और भाजपा में बंट गया। वैसे अररिया राजद की मजबूत सीट है लेकिन 1998, 2004, 2009 में भाजपा यह सीट जीती थी। भाजपा-जदयू गठजोड़ का अररिया में राजद से हारना मायने रखता है। नीतीश के पाला बदल के बाद यह एनडीए की बिहार में पहली हार है। लालू का जादू बरकरार है।

कम मतदान, भाजपा को नुकसान: ऐसा लगता है कि गोरखपुर और फूलपुर में हुआ कम मतदान भी भाजपा के खिलाफ गया। 2014 में गोरखपुर में 54 फीसदी से ऊपर मतदान हुआ था और कुल 10.4 लाख वोट पड़े थे। इस बार वहां सिर्फ 47 फीसदी मतदान हुुुआ और करीब 9.33 लाख वोट पड़े। एक लाख वोटों की इस कमी को भाजपा के वोटों में आई करीब इतनी ही कमी से जोड़कर देखा जा सकता है। 

बहरहाल, तीनों लोकसभा सीटों के नतीजों से भाजपा को झटका लगा है। गठबंधन के बूते ही सही मगर विपक्ष को मोदी मैजिक से टकराने की राह दिखी है। अब देखना होगा कि इन नतीजों से भाजपा, उसके साथी और विरोधी क्या सबक लेते हैं! एक बात तो साफ है कि 2019 की राह गठबंधनों से होकर गुजरेगी। 


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