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बवाना जीत के मायने: केजरीवाल की चुप्पी दे सकती है मोदी लहर को मात

राजौरी गार्डन उपचुनाव और दिल्ली नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी की नाकामी के बाद जो लोग केजरीवाल की राजनीति को खत्म मान चुके थे, बवाना का नतीजा उनकी राय बदलने के लिए काफी है।
बवाना जीत के मायने: केजरीवाल की चुप्पी दे सकती है मोदी लहर को मात

देश भर से करीब 4120 विधायक चुने जाते हैं। ऐसे में किसी एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी की जीत ज्यादा मायने नहीं रखती। लेकिन भारतीय राजनीति का यह अलग दौर है, जब राज्यसभा की एक सीट राष्ट्रीय दलों के लिए नाक का सवाल बन जाती है। ऐसे में ताज्जुब की बात नहीं कि दिल्ली की बवाना विधानसभा सीट भी आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई थी। 

बवाना की अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राम चंदर ने भाजपा के वेद प्रकाश को 24,052 वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की। वोटों के लिहाज से दिल्ली की इस सबसे बड़ी विधानसभा सीट पर आप को कुल 59,886 वोट मिले जो कुल पड़े मतों का 45.39 फीसदी हैं। भाजपा 35,834 मतों (27.16 फीसदी ) के साथ दूसरे और कांग्रेस 31,919 (24.19 फीसदी) मतों के साथ तीसरे स्थान पर रही है। हालांकि, 2015 के चुनाव में आप को बवाना में 57.91 फीसदी वोट मिले थे। फिर भी यह बड़ी जीत है। 

कांग्रेस को पिछले चुनाव में मिले 7.8 फीसदी वोटोंं के बाद अब 25 फीसदी वोट मिले हैं जो दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति में सुधार का संकेत है। जबकि भाजपा के वोट 31.52 फीसदी से घटकर 27.16 फीसदी रह गए हैं। देश भर मेें मोदी लहर के बावजूद राजधानी में भाजपा की इस हार को दिल्ली इकाई में गुटबाजी से जोड़कर देखा जा रहा है। 

लोगों की नाराजगी को आप ने भुनाया 

यह सीट आप विधायक रहे वेद प्रकाश के भाजपा में शामिल होने की वजह से खाली हुई थी। जिस तरह राजौरी गार्डन सीट छोड़कर पंजाब में चुनाव लड़ना आप उम्मीदवार को भारी पड़ा था, ठीक वैसी ही नाराजगी वेद प्रकाश के भाजपा में जाकर चुनाव लड़ने को लेकर थी। बेवजह थोपे गए इस चुनाव को लेकर लोगों की नाराजगी को आम आदमी पार्टी ने खूब भुनाया। जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि जनता ने दल-बदलू वेद प्रकाश को सबक ‌सिखा दिया है। बवाना की यह जीत न सिर्फ आप के नेताओं और कार्यकर्ताओं का आत्म-विश्वास बढ़ाएगी, बल्कि नगर निगमों में मिली नाकामी से उबरने में भी मदद करेगी। 

कारगर रही बदली रणनीति

इस साल दिल्ली के तीन नगर निगमों में से एक में भी बहुमत न मिलना मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए तगड़ा झटका था। दिल्ली विधानसभा में 67 विधायक जीताने के बाद नगर निगमों में आप के सिर्फ 48 पार्षद जीत पाए थे। इस असफलता ने पीएम नरेंद्र मोदी और ईवीएम पर तीखे हमले बोल रहे अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को ठहरकर सोचने पर मजबूर किया। संगठन में भी उथल-पुथल रही। दिल्ली संयोजक दिलीप पांडे को इस्तीफा देना पड़ा।

आप के नेता और कार्यकर्ता भी मानने लगे थे कि ज्यादा नकारात्मक बयानबाजी को लोगों ने पसंद नहीं किया। इसके बाद शुरू हुआ केजरीवाल की चुप्पी और मंथन का दौर। उनके साथ-साथ मनीष सिसोदिया व अन्य नेता भी अनावश्यक बयानबाजी से बचते नजर आए। दिन-रात रेडियो पर गूंजने वाले केजरीवाल के विज्ञापन बंद हो गए। टीवी पर भी वह कम ही दिखे। बेहद जरूरी मुद्दाेें पर सोशल मीडिया के जरिए ही अपनी बात रखते थे। लोग कहने लगे कि हार के बाद केजरीवाल की बोलती बंद हो गई है! जबकि इस दौरान कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर हल्ला बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर भी केजरीवाल शांत रहे। 

बहरहाल, यह बदली रणनीति बवाना में कारगर साबित हुई, जहां ज्यादातर मतदाता ग्रामीण इलाकों और झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। आप ने इन मतदाताओं को लुभाने के लिए घर-घर जाकर संपर्क और दिल्ली सरकार के काम गिनाने की रणनीति अपनाई। बसपा के टिकट पर 17 हजार वोट पा चुके राम चंदर को उम्मीदवार बनाना भी सही साबित हुआ।

बवाना सीट के दो दर्जन से ज्यादा गांवों की जनता को केजरीवाल सरकार ने लैंड पूलिंग और फसलों के बेहतर मुआवजे से लुभाने के प्रयास किए। हालांकि, ग्रामीण जाट मतदाताओं का रुझान कांग्रेस के सुरेंद्र कुमार के पक्ष में दिखा। लेकिन झुग्गी बस्तियों ने आप की जीत पक्की कर दी। भाजपा के खिलाफ आप ने विधायकों की "खरीद-फरोख्त" और कांग्रेस के खिलाफ "वोट खराब जाने" को मुद्दा बनाया। जबकि दिल्ली सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर से बचने में आप कामयाब रही।

ढाई साल के काम पर फोकस 

आम आदमी पार्टी ने अपनी प्रचार रणनीति में पीएम मोदी पर निशाना साधने के बजाय अपने ढाई साल के काम पर जोर दिया। आप की इस जीत का एक संदेश यह भी है कि भाजपा द्वारा विधायकों की तोड़-फोड़ का जनता में अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। अगर रणनीति सही हो तो स्थानीय मुद्दों और समीकरणों के बूते मोदी लहर को मात दी जा सकती है। बशर्ते चुनाव को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में न उलझने दिया जाए।

गोपाल राय जीत के सूत्रधार 

अरविंद केजरीवाल की राजनीति के लिए निर्णायक माने जा रहे इस उपचुनाव में आप की जीत के सूत्रधार दिल्ली प्रदेश संयोजक और श्रम मंत्री गोपाल राय रहे। राय पिछले दो हफ्तों से बवाना में डेरा डाले हुए थे। केजरीवाल के लिए नाक का सवाल बनी इस सीट के लिए उनके मंत्रियों और नेताओं ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। चुनाव प्रचार का तरीका बदलते हुए रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया के बजाय पद यात्राओं और घर-घर जाकर वोट मांगने पर ज्यादा जोर दिया गया। 

बवाना में जीत के बाद केजरीवाल और आप के बाकी नेताओं की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई है, उसमें भी उनकी नई रणनीति की झलक मिलती है। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि बवाना की जनता ने उनके पिछले ढाई साल के कामों पर मुहर लगाई है। इस दौरान वह सीधे तौर पर पीएम मोदी पर हमला करने से बचे। हालांकि, मनीष सिसोदिया ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि दिल्ली की जनता ने तोड़फोड़ की राजनीति को अस्वीकार कर दिया है। वैसे, इस सीट पर मुकाबला दलबदलुओं के बीच ही था। भाजपा ने आप विधायक रहे वेद प्रकाश को टिकट दिया तो आप ने बसपा में रह चुके राम चंदर को अपना उम्मीदवार बनाया था।

वीवीपीएटी में बढ़ा भरोसा 

दिल्ली में पहली बार बवाना सीट पर वीवीपीएटी (वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) युक्त इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया था। इस मशीन से मतदाता को पता चल जाता है कि उसका वोट किसे पड़ा है। ईवीएम पर सवाल उठाते हुए आम आदमी पार्टी वीवीपीएटी की वकालत करती रही है। बवाना जीत के बाद अरविंद केजरीवल ने भाजपा को सभी चुनाव वीवीपीएटी से कराने की चुनौती दे डाली। 

आप विधायक सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जब एमसीडी चुनाव में वीवीपीएटी के बगैर मतदान हुआ तो आप बवाना के 6 में 5 वार्ड हार गई थी, जबकि विधानसभा उपचुनाव में 24 हजार से जीत हासिल की है। भारद्वाज ने सभी चुनावों में कम से कम 25 फीसदी बूथों पर वीवीपीएटी लगाने की मांग की है।

बहरहाल, छोटी ही सही लेकिन इस जीत से आम आदमी पार्टी को स्वच्छ राजनीति पर बात करने का साहस फिर से मिल गया है जो चुनावी असफलताओं और उसके मंत्री-विधायकों पर एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोपों के शोर में गुम-सा हो गया था। 

 

 

 

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