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भारतीय कला एवं संस्कृति के प्रसार में हिंदी की भूमिका

संतोष चौबे - OCT 28 , 2022
भारतीय कला एवं संस्कृति के प्रसार में हिंदी की भूमिका
भारतीय कला एवं संस्कृति के प्रसार में हिंदी की भूमिका
संतोष चौबे

हिंदी से ही संभव है भारतीय कला एवं संस्कृति का वैश्विक विस्तार 

 

 

भारत प्रारंभ से ही कला एवं संस्कृति की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध राष्ट्र रहा हैं। भारतीय कला एवं संस्कृति की विकास यात्रा हजारों वर्षों की विरासत संजोए आज भी अनवरत जारी है। प्राचीन समय में हमारे यहाँ कला, संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के दस्तावेजीकरण का कार्य प्राच्य, पाली, संस्कृत आदि भाषाओं में हुआ था। इस परंपरा को हिंदी ने काफी आगे बढ़ाया। किसी भी देश की कला एवं संस्कृति का वहाँ की भाषा से गहरा रिश्ता होता है। हिंदी ने अपने विकास क्रम में भारतीय कला एवं संस्कृति के विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। वर्तमान समय में भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है। यह भारत की राजकीय भाषा है एवं विश्व के अनेक देशों में हिंदी का प्रभाव बड़ा है। विश्व के 116 विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई सुलभ है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हिंदी को अधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकारा हैं। यह इस बात का भी प्रमाण है कि हिंदी के वैश्विक भाषा बनने के सुनहरे द्वार खुले हैं। हिंदी को वैश्विक भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता है।

 

हमने इस दिशा में बहुत विराट पहलकदमी 'विश्व रंग' अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के रूप में प्रारंभ की हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी भोपाल में 'विश्व रंग' टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव 2019 के प्रथम अद्भुत–भव्य आयोजन का जिस तरह से पूरे विश्व ने अभिनंदन किया था वह भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य, शिक्षा एवं सामाजिक सरोकारों के वैश्विक फलक पर रोशन सितारों की मानिंद सदैव के लिए अविस्मरणीय है।

 

इसके बाद कोरोना विभीषिका के रूप में सदी की सबसे भीषण त्रासदी के दौरान भी वर्चुअल प्लेटफार्म पर ऑनलाइन आयोजित विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक महोत्सव 'विश्व रंग 2020' की विश्व के 16 मुल्कों ने मेजबानी की। इसी रचनात्मक ऊर्जा के बल पर 'विश्व रंग 2021' का आयोजन कोरोना के बावजूद विश्व के 27 देशों में वर्चुअल प्लेटफार्म पर किया गया। इसमें 50 से अधिक देशों के हजारों रचनाकारों एवं लाखों-करोड़ों लोगों ने वर्चुअल प्लेटफार्म पर रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराकर 'विश्व रंग' को कई गुना अधिक भव्यता के साथ अद्भुत, अकल्पनीय और अविस्मरणीय बना दिया।

 

 यह देश के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी शैक्षिक संस्थान– रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय, आइसेक्ट विश्वविद्यालय, टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र, वनमाली सृजन पीठ, वनमाली सृजन केंद्रों एवं देश–विदेश की 100 से अधिक सांस्कृतिक संस्थाओं को साथ लेकर भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य के महोत्सव का अद्भुत संसार रचा।

 

 देश में आयोजित होने वाले कई अन्य साहित्य उत्सव में अंग्रेजी का प्रभुत्व होता है। वेस्टर्न कल्चर की प्रधानता रहती है। इन उत्सवों के बदले 'विश्व रंग' ने हिंदी और भारतीय भाषाओं को केंद्रीयता प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच अपनत्व और परस्पर सम्मान का रिश्ता कायम करने का ऐतिहासिक कार्य किया। साथ ही इस बात को भी विशेष रूप से ध्यान में रखा की हमारी भाषा को समृद्ध करने के लिए हमारी बोलियों का समृद्ध होना बहुत जरूरी है। अपनी भाषा से अपनी बोलियों को जोड़ना भी बहुत आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व रंग में हिंदी के साथ उसकी बोलियों–मालवी, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी,अवधि आदि के जमीनी रस भरे संवाद को वैश्विक फलक प्रदान किया। हिंदी और सहोदर बोलियों के संवर्धन में ही भारतीय कला, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता निहित है। 

 

 हमारे देश में राजनीति ने सभी भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का काम किया है जबकि सभी भारतीय भाषाएं परस्पर एक दूसरे से गहरे तक जुड़ी हुई है। वे सहोदर है और एक दूसरे से शक्ति अर्जित करती है। हमारे यहां बोलियों को भी हिंदी के विरुद्ध खड़ा करने के प्रयास किए गए जबकि स्वयं हिंदी भाषा अपना रस इन जीवन सिक्त बोलियों से ही प्राप्त करती है। भारतीय कला एवं संस्कृति का विस्तार एवं प्रसार भी इनके गहरे मजबूत नातों पर ही कायम है। भाषाओं और बोलियों पर बहुत ही महत्वपूर्ण सत्र और विमर्श विश्व रंग में आयोजित हुए। उल्लेखनीय है कि इन सत्रों में दूरदराज के ग्रामीण आदिवासी अंचलों के रचनाकारों ने विभिन्न रसभरी बोलियों में रची रचनाओं की यादगार प्रस्तुतियों से बोलियों के महत्व को प्रतिपादित किया।

 

 विश्व रंग की सबसे महत्वपूर्ण बात– टैगोर की वैश्विकता विश्व रंग का मूल आधार रहा है। यह महोत्सव टैगोर की रचनात्मकता से शुरू होकर पूरे विश्व तक फैलता है। हिंदी भाषी क्षेत्र में टैगोर की विराट रचनात्मकता विशेषकर उनकी पेंटिंग स्टाइल एवं नाटकों को लेकर कोई बहुत चेतना नहीं है और इसका पुनरावलोकन बहुत आवश्यक है। विशेषकर टैगोर और महात्मा गांधी का स्वतंत्रता आंदोलन के समय का रिश्ता और टैगोर की अंतर्राष्ट्रीयता तथा शैक्षिक दृष्टि को एक बार पुनः देखा जाना जरूरी है। भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम की परंपरा भी इसी में अंतर्निहित है। अतः वसुधैव कुटुंबकम के आधार पर रबीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के दर्शन को भी विश्व रंग का मूल आधार बनाया गया। 

 

विश्व रंग में भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य, दर्शन एवं भारतीय अस्मिता को आत्मसात किया गया। विश्व रंग में भारतीयता को प्राथमिकता देना कोई जड़ राष्ट्रीयता नहीं है। यहां भारतीयता वैश्विक संदर्भ से जुड़ी और अपने अनोखेपन में प्रकाशित भारतीयता है। विश्व कविता, कथा, उपन्यास सहित साहित्य की सभी विधाओं का उतना ही स्थान है जितना भारतीय साहित्य का।

 

उल्लेखनीय है की सात समंदर पार प्रवासी भारतीय रचनाकार भी अपनी मातृशक्ति, मातृभाषा, मातृभूमि, कला, साहित्य, संस्कृति से, अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं लेकिन उनके लेखन के बेहतर प्रकाशन और रचनात्मक मूल्यांकन को लेकर कोई ठोस प्रयास देश में नहीं हुए। विश्व रंग में विश्व के प्रमुख भारतीय रचनाकारों–युवा रचनाकारों को साझा मंच प्रदान कर उनके साहित्य और रचनाकर्म के रचनात्मक मूल्यांकन और बेहतर प्रकाशन की सार्थक पहल कदमी की गई। विश्व रंग में प्रवासी भारतीय रचनाकारों की उत्कृष्ट पुस्तकों के आकर्षण कलेवर के साथ प्रकाशन, भव्य लोकार्पण एवं सार्थक विमर्श को पूरी दुनिया ने सराहा।

 

विश्व रंग कि हमारी अवधारणा, विश्व के बारे में हमारी समझ से ही निकली है। यदि आप सचेत रूप से अपने आसपास देखें तो पाएंगे कि विकास की जो प्रक्रिया हमने अपनाई हैं और प्रकृति का जिस तरह अंधाधुन दोहन किया है, किया जा रहा है वह स्वयं हमारे अस्तित्व के लिए ही घातक होता जा रहा है। दूसरी ओर बायोटेक्नोलॉजी एवं बायो इनफॉर्मेटिक्स के कन्वर्जेंस से जिस तरह के मनुष्य के निर्माण की बात की जा रही है उससे इस बात में भी संदेह पैदा हो रहा है कि क्या मनुष्य स्वयं वैसा बचा रह पाएगा जैसा कि हम उसे जानते हैं। तीसरे टेक्नोलॉजी ने जीवन की गति इतनी तेज कर दी है कि उसे जानना– पहचानना ही मुश्किल होता जा रहा है। जैसा कि फ्रेडरिक जेम्सन ने कहा है, हमें नये नक्शे और नये को–आर्डिनेंट्स की तलाश करनी होगी। हमें लगता है कि जीवन के नए उपकरणों को तलाशने के साधन विज्ञान के पास उतने नहीं है जितने भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत के पास है। विश्व के तमाम रचनाकारों, कलाकारों और संगीतज्ञों को इस संबंध में बातचीत शुरू करना चाहिए और एक प्रभावी हस्तक्षेप करना चाहिए। 'विश्व रंग' कला, संस्कृति, साहित्य, शिक्षा और भाषा के लिए काम करने वाले समूचे विश्व के रचनाकारों के बीच इसी दिशा में वैश्विक विमर्श का एक सार्थक रचनात्मक वैश्विक मंच के रूप में स्थापित हो चुका है।

 

विश्व रंग के पहले संस्करण के बाद साल 2020 आया। इस साल के शुरुआती दिनों में ही कोरोना बीमारी से दुनिया का सामना हुआ। देखते ही देखते यह वैश्विक महामारी के रूप में तब्दील हो गई। विश्व के कई देशों में लॉकडाउन लगा जो काफी लंबा चला। इस दौरान जीवन मानो थम सा गया था। ऐसा लग रहा था मानो कुदरत ने अपना चक्का उलटा घुमा दिया हो। लोग अपने–अपने घरों में ही बंद होकर रहने को मजबूर हो गए थे। जो बाहर निकल रहे थे वह भी एक भय के साथ निकल रहे थे। पूरे विश्व में अफरा– तफरी सी मची हुई थी। विदेशों में रहने वाले प्रवासी लोग, देश के विभिन्न प्रांतों से प्रवासी मजदूर अपने–अपने घर–गांव की ओर लौटने को मजबूर थे। कुछ साधन के साथ अधिकांश साधन विहीन पैदल ही थकेहारे लहूलुहान कदमों से लौटने को मजबूर थे। 

 

कोरोना काल की विभीषिका ने संपूर्ण विश्व को झकझोर दिया था। धीरे धीरे अनलॉक का चलन बढ़ा तो ऐसे समय में ज्यादा सावधानी बरतने के बजाय महामारी के दुष्परिणामों के प्रति लोगों की गंभीरता में कमी आती गई, लापरवाही बढ़ती गई। ऐसा मजबूरीवश भी हो रहा था। इसके घातक परिणाम भी सामने आने लगे। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, बदहाली के मंजर में आर्थिक मार ने सभी को बेहाल कर दिया। सामाजिक दूरियां जो पहले से ही बढ़ रही थी इस कोरोना काल में और अधिक गहराती चली गई। 

 

इन सबके बावजूद समाज के हर तबके से परोपकार करने वालों ने निस्वार्थ भाव से मानव सेवा के माध्यम से समूचे विश्व में मनुष्यता और मानवता का बड़ा पैगाम पहुंचाया।

 

कोरोना विभीषिका से उपजे भय निराशा एवं अवसाद से भरे इस कठिन समय के विरुद्ध आशा, विश्वास, प्रेम, करुणा और टैगोर के विश्व मानवता के सिद्धांत को आत्मसात करते हुए वैश्विक स्तर पर एक बड़े सांस्कृतिक रचनात्मक हस्तक्षेप के रूप में विश्व रंग 2020 एवं विश्व रंग 2021 की संकल्पना की गई। 

 

कोरोना काल से उपजे हालातों ने साफ संकेत दिए हैं कि हमें विकास का रास्ता बदलने की जरूरत है। इस दिशा में भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य के रचनात्मक हस्तक्षेप के द्वारा हम उच्चतर शक्ति को जागृत कर सकते हैं। हम प्रेम और घृणा में से किसे चुने इसे साहित्य, कला और संस्कृति ही हमें सिखाती है। कला ही उस शब्द युग्म का निर्माण करती है। शब्द युग्म चयन करने में जीवन निकल जाता है। इसके लिए हमें अनवरत रचनात्मक और सृजनात्मक प्रयत्न करते रहना होंगे। हम अपने इन सार्थक प्रयासों से संभावनाओं की नई जमीन और फलक तैयार कर सकते हैं।

 

 इस समय हिंदी और भारतीय भाषाओं के पास बहुत बड़ा अवसर है टेक्नोलॉजी ने यह संभव किया है कि पूरे विश्व में हम इनको फैला सके। हमने विश्व रंग टैगोर अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के माध्यम से वैश्विक स्तर पर यह कर दिखाया है। इसी संकल्पना के साथ 'विश्व रंग 2020' एवं 'विश्व रंग 2021' का आगाज विश्व के 27 देशों में वर्चुअल प्लेटफार्म पर विश्व के सबसे बड़े ऑनलाइन फेस्टिवल के रूप में किया गया। भारत सहित सभी देश जहां विश्व रंग 2020 एवं विश्व रंग 2021 के आयोजन हुए उन सभी देशों ने कहा कि इस कठिन समय में विश्व रंग की हमें सबसे ज्यादा जरूरत थी। 'विश्व रंग' अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव ने हिंदी के माध्यम से भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य एवं संगीत के प्रसार और विस्तार के लिए एक स्वर्णिम फलक बुना है। 

 

 

(संतोष चौबे, कुलाधिपति रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल)

 

 

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