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संपादक की कलम से -क्यों मैं दिल्ली का मतदाता नहीं बनना चाहता

रूबेन बनर्जी - MAR 25 , 2021
संपादक की कलम से -क्यों मैं दिल्ली का मतदाता नहीं बनना चाहता
दिल्ली
File Photo
रूबेन बनर्जी

 मैं दिल्ली का वोटर नहीं हूं, इस बात की मुझे खुशी है। क्योंकि, अगर मैं यहां का वोटर होता तो संसद द्वारा पारित किए गए नए संशोधन से बहुत अपमानित महसूस करता। जो एक चुनी हुई सरकार की कीमत पर लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) को सशक्त बनाता है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2021 के बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों और वॉकआउट के बीच अब विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। यह एक औपचारिकता मात्र है। और एक बार इसके कानून बन जाने के बाद इसका मतलब यह होगा कि दिल्ली के लोगों की पसंद का कोई मूल्य नहीं है।

 इस बात से बेपरवाह होकर कि हमारी राजनीतिक संबद्धताएं क्या हैं, दिल्ली में किसने किसे वोट दिया। इस बात से किसी भी तरह का कोई इनकार नहीं है कि यह कानून लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पूरी तरह से खत्म करने जैसा है। जबकि लोकतंत्र में जनादेश सबसे ज्यादा मायने रखता है। ये सच है कि दिल्ली देश की राजधानी है जहां प्रशासनिक समस्याएं  हैं और ये बेहद जटिल भी हैं। दिल्ली एक अर्ध केंद्र शासित प्रदेश है जहां स्थानीय सरकार केंद्र द्वारा नियुक्त किए गए उपराज्यपाल के माध्यम से सत्ता साझा होती है। इस वक्त अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार है।

 अधिकारों  को लेकर लड़ाई  का मुद्दा केजरीवाल के सरकार में आने से पहले से ही गर्म रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने जब इस मुद्दे पर विचार-विमर्श कर 2018 में फैसला सुनाया था, उसके बाद पूरे  बहस पर थोड़ा विराम लग गया। कोर्ट ने फैसले में चुनी हुई दिल्ली सरकार की प्रधानता को स्वीकार किया था। पुलिस, पब्लिक ऑर्डर और भूमि के अलावा सारे मामलों का अधिकार दिल्ली सरकार के पास है। हालांकि, कोर्ट अभी भी इस बात पर चुप है कि सेवाओं से संबंधित मामलों में, अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर किसके पास अधिकार है। पीठ ने बिना चुने हुए उपराज्यपाल की शक्तियों के दायरे और पैमाने को सीमित  किया है।

नया कानून अब इन सभी चीजों को खत्म कर देगा, जबकि पिछले समय से ऐसा लग रहा था कि आप और एलजी के बीच दिल्ली पर शासन करने को लेकर आपाधापी चल रही है। आप बिल को गलत बता रही है क्योंकि बिल के पारित होने से वह सिर्फ सांकेतिक सरकार बनकर रह जाएगी। नए कानून के मुताबिक एलजी, केजरीवाल की सरकार, जो एक चुनी हुई सरकार है और जिसे बड़े जनादेश के साथ दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 62 सीटों पर जीत हासिल की है, उसे दूसरे नंबर पर कर देगा। हर छोटी-छोटी बातों के लिए केजरीवाल सरकार को एलजी की सहमति लेने के लिए मजबूर किया जाएगा।

 कुल मिलाकर  साफ शब्दों में कहा जाए तो दिल्ली के लोगों ने जनादेश का मतलब खो दिया है। भाजपा बीते साल के चुनाव से पहले वाले विधानसभा चुनाव में भी बुरी तरह हार गई थी। इससे पहले 1998 के बाद से प्रत्येक चुनावों में भाजपा हारती रही है। फिर भी पार्टी के पास दिल्ली सरकार चलाने के तरीके में बेलगाम अधिकार होगा, जो एक व्यक्ति को एलजी के रूप में चुनता है। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और सहकारी संघवाद के सिद्धांत इसके बाद बदल दिए गए हैं।

 लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि केंद्र ने दिल्ली में ऐसा करने का फैसला क्यों किया?

 संविधान के जानकारों का कहना है कि यह कदम गैरकानूनी है और कानून के पैमाने पर ये खड़ा नहीं उतरेगा। लेकिन, ये तभी होगा जब मामला कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचेगा और संविधान पीठ इस कानून को स्थगित कर देगी। सुप्रीम कोर्ट के हालिया रिकॉर्ड के मुताबिक इस पर किसी भी तरह का कोई निर्णय जल्द आने की बहुत कम, या न के बराबर संभावना है। जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने वाले और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का महत्वपूर्ण मामला अभी तक अटका हुआ है। ये इस बात को कहने के लिए बेहद काफी है कि दिल्ली के मामले को जल्द निपटाया जाएगा और जितने वर्ष न्यायधीश को इस मुद्दे को देखने में लगेंगे। तब तक जनता के मुख्यमंत्री केजरीवाल को छोटी बातों पर भी एलजी के इशारों पर चलने के लिए मजबूर किया जाएगा।

 इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि बदलते सत्ता समीकरणों का मतलब है कि दिल्ली के लोग के अधिकारों का महत्व खत्म हो चुका है। लोगों ने अपने प्रतिनिधि को चुना। लेकिन, इसके बाद बिना चुने हुए केंद्र द्वारा नियुक्त एलजी इस दिल्ली के भविष्य पर फैसला करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भाजपा संसद में मिलने वाले बहुमत के आधार पर जो बदलाव लाती है उसमें उसे कुछ भी खामियां नहीं दिखाई देती है लेकिन, केजरीवाल सरकार के अधिकारों को सीमित करना साबित करता है कि बीजेपी के लिए सिर्फ नजदीक की चीजों को देखने का सामर्थ्य रखती है।

कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस कानून के समर्थन किस तरह की दलील दी जाती है। लेकिन हकीकत यही है कि  2015 और 2020 के चुनाव में अपमानजनक हार का बदला लेने का ये अनुचित प्रतिशोध है। लेकिन, केजरीवाल भी संत नहीं हैं। इन सब चीजों के बीच उन्होंने जम्मू-कश्मीर पर केंद्र के उठाए गए कदम का समर्थन किया था। फिर भी उनकी सरकार के खिलाफ ये कदम चिंताजनक है। हालांकि, पूरी तरह से ये आश्चर्य की बात भी नहीं है।

लोकतांत्रिक परंपराओं को कायम रखने के लिए चाहे जो भी लंबे चौड़े दावे राजनीतिक दलों द्वारा किए जाए लेकिन  हर रंग के राजनीतिक दल निरंकुश और प्रतिशोधी होने के नए मानक स्थापित कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले बिहार विधानसभा में जो हुआ इससे नया सबूत आपको कुछ नहीं मिलेगा। बिहार में अराजकता तब भड़क उठी जब विपक्षी विधायक मुखर रूप से एक बिल का विरोध कर रहे थे।  जिसमें स्पष्ट रूप से पुलिस को व्यापक अधिकार देने की मांग की गई थी। विधायकों को सदन से बाहर निकाल दिया गया था। लेकिन पुलिसकर्मियों द्वारा कैमरे के सामने लात मारते हुए और उनमें से कुछ को मुक्का मारते हुए कदम कैद हो गए हैं। विपक्ष के नेता और लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने कहा कि असंतुष्ट विधायकों में से प्रत्येक के पास लाखों मतदाताओं का समर्थन है। जबकि लालू के शासन के काल को बिहार में "जंगल राज" कहा जाता है।

इसमें कोई शक नही है कि दिल्ली का नया बिल राजधानी के मतदाताओं को अपमानित करता है। उन्होंने किसी दल व्यक्ति को चुनने के लिए कष्ट उठा कर वोट किया था। लेकिन अब किसी और का शासन होगा। मैं केवल अपनी किस्मत को धन्यवाद दे सकता हूं कि मैंने खुद को इस तरह से अपमानित होने के लिए दिल्ली में मतदान नहीं किया।

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