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संपादक की कलम से: अगर अर्नब बुरा है, तो राज्य की बदले की कार्रवाई और बदतर

रूबेन बनर्जी - NOV 04 , 2020
संपादक की कलम से: अगर अर्नब बुरा है, तो राज्य की बदले की कार्रवाई और बदतर
अर्नब गोस्वामी
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रूबेन बनर्जी

मैं अर्नब गोस्वामी का कोई प्रशंसक नहीं हूं। महाराष्ट्र पुलिस ने दो साल पहले आत्महत्या के एक मामले में रिपल्बिक टीवी के जिस संपादक को गिरफ्तार किया है, दरअसल वे हर रात चीख-चिल्लाकर और धमकी भरे अंदाज में पत्रकारिता की भलाई के बदले नुकसान ही ज्यादा किया है। उन्होंने लगभग अपने अकेले दम पर निर्लज्ज राजनैतिक पक्षपात के जरिए, टेलीविजन मीडिया की साख को धूल में मिला दिया है। यही नहीं वह खबरों को नाटकीय बनाने और अपने चैनल की टीआरपी में इजाफे के लिए कुछ चुनिंदा लोगों को टारगेट भी करते रहे।

इसके बावजूद, मुझे उनकी गिरफ्तारी से गुरेज है। क्योंकि इस गिरफ्तारी में प्रतिशोध की बू आ रही है। अर्नब कोई सर्वोपरि नहीं है। देश का कानून उन पर भी उतना ही लागू होता है, जितना कि वे बड़े हो-हल्ले के साथ वह, दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते हैं। मसलन जून में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद उनकी पूर्व गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के ऊपर मीडिया ट्रायल चला। जिस ट्रॉयल में रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी सबसे आगे थे, जिन्होंने सुशांत की मौत के लिए रिया को दोषी ठहराने का कैंपेन चला रखा था। सुशांत की हत्या के नाम पर रिया पर लगातार सभी तरह के आरोप लगाए। 

यह विडंबना है कि वही अर्नब अब आत्महत्या करने के लिए उकसाने के आरोपी हैं, पीड़िता ने कथित तौर पर अपने सुसाइड नोट में अर्नब के नाम का उल्लेख किया था। एक लंबी कहानी को छोटा करके कहूं तो अर्नब ने कथित तौर पर उस व्यक्ति को पैसे नहीं दिए जिसकी वजह से उस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। जाहिर तौर पर उसे अपना जीवन समाप्त करने के लिए उकसाया गया। आरोप गंभीर है और जांच की मांग उठती है। लेकिन जिस तरह से यह किया जा रहा है वो बहुत हद तक अविश्वास की गुंजाइश छोड़ देता है।

अर्नब की बेलगाम और धुंधली पक्षपाती पत्रकारिता ने उन्हें शिवसेना की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार के साथ टकराव के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है।  महाराष्ट्र सरकार राज्य पुलिस के साथ टीवी संपादक पर जितना हो सके, कीचड़ उड़ेलने का प्रयास कर रही है। उनके चैनल की अब टीआरपी में हेराफेरी के मामले में जांच की जा रही है। साथ ही उनके दर्जनों पत्रकारों को विभिन्न आरोपों पर लंबी पूछताछ के लिए बुलाया गया है, जिसमें मुंबई के शीर्ष पुलिस वाले के खिलाफ पुलिस बल को उकसाने के प्रयास भी शामिल हैं। फिर भी, अर्नब के खिलाफ वर्षों पहले हुई आत्महत्या के मामले को फिर से खोलकर उनकी गिरफ्तारी की गई है, जिससे प्रतिशोध की बू आ रही है।

अर्नब ने अपने  स्तर पर कई गलतियां की हैं। लेकिन, वो संभवतः यह दावा करने में सही है कि महाराष्ट्र पुलिस ने पक्षपातपूर्ण रुप से उनकी गिरफ्तारी की है। पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए, यह सब कर  रही है। अर्नब को खुद एक प्रोपेगेंडा फैलाने वाला होने के नाते , यह सब बातें पता होनी चाहिए।

हालांकि, मुंबई पुलिस का ये उपयोग या दुरुपयोग कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अर्नब हाई-प्रोफाइल हैं और इसलिए, गिरफ्तारी की निंदा करते हुए उनके समर्थन में केंद्रीय मंत्रियों की बड़ी टीम आ गई। लेकिन, मुंबई से इतर देखें तो ये बताने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि भारत पत्रकारों के लिए एक सुरक्षित आश्रय नहीं रह गया है। वर्तमान में विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों की सूची में भारत 142 वें स्थान पर है, यहां तक कि हम अफगानिस्तान और माली से भी बदतर हैं।

इससे भी बुरी बात ये है कि सरकार के बड़े-बड़े मंत्रियों और नेताओं का समर्थन शायद ही कभी किसी पत्रकार को मिलता है  जैसा अर्नब को मिल रहा है।

हमे इन घटनाओं पर विचार करना चाहिए। मणिपुर के पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को एक फेसबुक पोस्ट की वजह से जेल भेज दिया गया हैं। इसी तरह की परिस्थितियों के लिए एक साल पहले जेल में महीनों गुजारना पड़ा था। जब कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप किया था तब उन्हें रिहा किया गया, मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई थी और आरोप को खारिज कर दिया था।

हालांकि, आलोचना के बावजूद भी राज्य सरकार ने वांगखेम को फिर से जेल भेज दिया है। इसी तरह से एक अन्य पत्रकार, जो केरल के हैं। उसे हाथरस जाने के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था। वर्तमान में वो उत्तर प्रदेश की जेल में है। देश भर में ऐसे और भी कई मामले हैं। अगर उनकी तलाश शूरू की जाय तो कई ऐसे मामले सामने आएंगे। इस तलाश में कश्मीर को भी शामिल करना चाहिए। जहां पत्रकारों के साथ बुरा वर्ताव किया जा रहा है। जहां कई पत्रकारों पर उनकी अपनी रिपोर्ट के लिए एफआईआर दर्ज की गई और उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।

कई राज्य सरकारें चाहे, कोई भी राजनीतिक दल हो, वो अच्छे से मीडिया को टारगेट करना जानती है। कुछ ब्रेजेन हैं और ओप्राब्रियम का सामना करने के लिए तैयार हैं जैसा कि महाराष्ट्र के मामले में है। अन्य सरकार की तरह ओडिशा में अन्य लोगों ने शोर मचाया और राष्ट्रीय उथल-पुथल से बचने का मन बनाया।

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत जय पांडा के परिवार के स्वामित्व वाली ओटीवी अब तक का सबसे लोकप्रिय ओडिया चैनल है। हालांकि, जाहिर है कि राज्य की नाराजगी तब शुरू हुई जब पांडा सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का साथ छोड़ बीजू जनता दल (बीजेडी) से अलग हो गए। उस समय से  पांडा और चैनल के लिए परिस्थितियां विपरीत होती जा रही हैं। पांडा के हेलीकॉप्टर को जब्त कर लिया गया था, जिसमें बाद में पाया गया कि कानून का उल्लंघन ही नहीं हुआ था। जबकि कथित उल्लंघन पर एक परिवार द्वारा संचालित औद्योगिक प्लांट को बंद कर दिया गया।

लेकिन, अब ओटीवी को 'नाराजगी' का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। पिछले दो महीनों से, कब्रिस्तान की जमीन, यौन उत्पीड़न से लेकर आपदा प्रबंधन कानूनों के उल्लंघन के मामले में चैनल को कम से कम 15 मामलों में शिकायतों को झेलना पड़ा है। और चैनल के पत्रकारों को पुलिस द्वारा बार-बार पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है। जबकि पुलिस ने एक संपादक को एक साल पुराने मामले के संबंध में पूछताछ के लिए सड़क से ही उठा लिया था, जिसके लिए पहले से ही एक आरोप-पत्र दायर किया गया था। चैनल के सीएफओ कथित धोखाधड़ी के एक मामले में जेल में है। इस बीच,पुलिस ने पूरी ताकत के साथ चैनल के दफ्तर पर बार-बार पहुंचती रही है।

स्पष्ट रूप से अर्नब इस कठिन दौर में अकेले नहीं है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा की गई समान ज्यादतियों के उदाहरण इस देश में बहुतों हैं और यह किसी एक राजनीतिक दल या राज्य तक सीमित नहीं है। यह देश की मीडिया के लिए एक बड़ा खतरा है, जिसके पीड़ित अर्नब हैं। यह निश्चित है कि अर्नब अंतिम नहीं होंगे।

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