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मेरा दोस्त मेरा उस्ताद: मनोज बाजपेयी पर देवाशीष मखीजा का नजरिया

देवाशीष मखीजा - SEP 17 , 2021
मेरा दोस्त मेरा उस्ताद: मनोज बाजपेयी पर देवाशीष मखीजा का नजरिया
अभिनेता मनोज बाजपेयी
देवाशीष मखीजा

“मनोज में वह खासियत है कि रिश्ते को एक्टर-डायरेक्टर के दायरे से आगे ले जाते हैं”

अभिनेता मनोज के बारे में सुनाने के लिए मेरे पास ऐसी कोई कहानी नहीं है, जिसे आप पहले से न जानते हों। मैं खुशनसीब हूं कि मुझे कला सिनेमा के योद्धा मनोज के साथ कलात्मक संघर्ष करने का मौका मिला। मैंने किस्से सुने थे कि कैसे मनोज ने सत्या के लिए अनुराग (कश्यप) को रामू (राम गोपाल वर्मा) से मिलवाया, कैसे अनगिनत युवा अभिनेताओं, लेखकों, निर्देशकों को मौके दिलवाए, जिनकी उन्हें तलाश थी।

भोंसले को लेकर हम तीन साल से पगलाए फिर रहे थे कि 2014 में स्क्रिप्ट के साथ मैं मनोज से मिला। उस वक्त तो मुझे यह भी एहसास नहीं था कि मैं मनोज से साठ साल के मराठी कॉन्सटेबल की भूमिका कराना चाहता हूं। मगर स्क्रिट पढ़कर वे मुझसे मिले तो शायद उन्होंने मेरी आंखों में आग देखी, मेरे दिल की धड़कन सुनी। उन्होंने मेरी बांह पकड़ी और कहा, वे यह फिल्म करना चाहते हैं, चाहे जो हो जाए। तब उसके लिए हमारे पास पैसा नहीं था। उन्होंने कहा कि उनके सह-निर्माता के रूप में जुड़ने से पैसा लाने में मदद मिलती हो, तो वे उसके लिए भी तैयार हैं।

मुंबई मायानगरी में यह असंभव-सा है, इसलिए मेरे मन में तब भी संशय था। ज्यादातर जाने-माने अभिनेता आपकी फिल्म करने की हामी भरने के बाद आपको अपने हाल पर छोड़ देते हैं। वे टका-सा कह देते हैं, फंडिंग का मसला सुलझ जाए, तो आ जाना। यानी फंडिंग न मिले, तो परेशान मत करना।

मनोज का रवैया चौंकाने वाले अपवाद सरीखा था। फिल्म के शुरुआती दिनों से ही उन्होंने फोन करना शुरू कर दिया था। स्टूडियो, फाइनेंसरो को। नए और पुराने दोनों ही तरह के निर्माताओं को, जिनके साथ वे पहले काम कर चुके थे और युवाओं को भी जो जोश से भरे थे। वे जानते थे, कौन वरिष्ठ फिल्म निर्माता है, जो स्क्रिप्ट पसंद आने पर दूसरों के लिए मदद के दरवाजे खोल सकता है।

वे लगातार जोश में रहते थे। उनका विश्वास गजब का था। यहां तक कि मुझे अपनी ऊर्जा कम लगने लगती थी जब हमारे मुंह पर ही दर्जनों दरवाजे बंद हो जाते थे। मैं खुद से सवाल करता था, आखिर मैं इस तरह की फिल्म क्यों बनाना चाहता हूं जब कोई इस पर पैसा ही नहीं लगाना चाहता। इसके बन जाने पर कौन इसे देखना चाहेगा? लेकिन एक मनोज ही थे, जो कहते थे कि दुनिया जितना भोंसले को बनते देखना नहीं चाहेगी, इस फिल्म को बनता देखने की उतनी ही जिद वे पालेंगे। मनोज सिर्फ मेरे मुख्य किरदार नहीं थे। वे आशा की अग्नि थे, बुरे दिनों में जिसकी आंच में मैं खुद को तपाने गया था।

साल भर बीत गए। 2015 में मेरी कुछ शॉर्ट फिल्मों ने ऑनलाइन सरगर्मी पैदा की, तो मनोज के दिमाग में कुछ हलचल हुई। उन्होंने कहा, क्या हम मिलकर एक शॉर्ट फिल्म बना सकते हैं, दुनिया को साबित करने के लिए कि हम पर ध्यान दिया जाना चाहिए और इन पर पैसा लगाना घाटे का सौदा नहीं। मनोज पहली बार निर्माता बन रहे कुछ लोगों को लाए। इस तरह तांडव के हम सह-निर्माता बने।

अंतत: 2017 में हमने भोंसले पर काम शुरू किया। एकाधिक बार शूटिंग में पैसे की कमी आड़े आई। यहां तक कि योद्धा मनोज भी देर रात तक मेरे साथ अपने शॉट्स खत्म करते, अपने वैन में जाते और कुछ पैसे, थोड़े से ही सही, जितने भी मिल जाएं की तर्ज पर उनकी व्यवस्था करने के लिए दर्जनों कॉल करना शुरू कर देते, ताकि शूटिंग रुक न जाए।

शूटिंग पूरा करने में हमें साढ़े तीन साल लगे। मैं पागलों की तरह शूट कर रहा था। मनोज में मुझे एक अपनापन मिला, जो निर्देशक-अभिनेता, मेंटर से कहीं आगे का था। एक कठिन, अवांछित, कष्टप्रद फिल्म को बनता देखने के लिए हमने उन्मादी दीवानापन साझा किया था। भोंसले के लिए उन्होंने जो बेस्ट एक्टर का खिताब जीता, मुझे महसूस होता है कि मैंने भी यह अवॉर्ड जीत लिया। फिल्म को उनकी परफॉर्मेंस से अलग नहीं किया जा सकता। उनके शब्दों में पुरस्कार एक कठिन लड़ाई के लिए ‘प्राकृतिक न्याय’ है, जिस पर हमारे अलावा शायद ही किसी को विश्वास था। मनोज ऐसे स्टेडियम में लंबी दूरी के धावक हैं, जिसमें धावकों की टोलियां सीमाओं में बंधी हैं।

मैं चाहता हूं कि देश में हर कला फिल्म बनाने वाले को मनोज जैसे अभिनेता, मेंटर, संरक्षक, मार्गदर्शक, सहयोगी, साथी, योद्धा मिलें जो हर तरह की बाधाओं के खिलाफ कठिन कहानियों को देखना चाहें। इस प्रतिभावान व्यक्ति ने तय किया कि मेरे जैसा फिल्मकार कड़वे और आत्मसंदेह के बोझ से खत्म न हो जाए। इस क्रूर शहर में हममें से कई हैं, जिनकी यह नियति हुई है। मैं भाग्यशाली था कि मनोज बाजपेयी ने मेरी भाग्य रेखा बदल दी।

देवाशीष मखीजा

(लेखक की फिल्म भोंसले के लिए मनोज बाजपेयी को श्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यहां व्यक्त विचार निजी हैं)