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उपेक्षा के भी मारे जवान

एस.के. सूद - FEB 21 , 2019
उपेक्षा के भी मारे जवान
बीएसएफ जवानों को बीस साल बाद मिलती है प्रोन्नति
एस.के. सूद

चौदह फरवरी को पुलवामा में आतंकी हमले में जान गंवाने वाले 40 से अधिक सीआरपीएफ जवानों के परिवारों के साथ मेरी संवेदनाएं है। ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करे। हालांकि, ऐसे हमलों से केंद्रीय अर्द्धसैन्य बलों के मनोबल पर पड़ने वाले गंभीर असर को दूर करने के लिए की जाने वाली प्रशासनिक पहल को लेकर मैं बेहद उत्साहित नहीं हूं। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजु ने बीते साल छह मार्च को लोकसभा में बताया था कि 2015 से 2018 के बीच तीन साल में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या इस्तीफा देकर केंद्रीय सशस्‍त्र बलों के 27,862 जवानों और अधिकारियों ने नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने वालों में सबसे ज्यादा सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से थे, जो देश के दो सबसे बड़े अर्द्धसैन्य बल हैं। 2015 से जनवरी 2018 के बीच बीएसएफ छोड़ने वालों की संख्या 11,198 (करीब 4.5 फीसदी) और सीआरपीएफ छोड़ने वालों की संख्या 10,620 (करीब चार फीसदी) थी।

इतने व्यापक पैमाने पर नौकरी से मोहभंग के कारण “निजी और पारिवारिक” बताए गए। इसमें बच्चों और परिवार से जुड़ा मसला, जवान या उसके परिजनों के स्वास्थ्य अथवा बीमारी और सामाजिक या पारिवारिक दायित्व शामिल हैं। यह भी बताया गया कि 20 साल की सेवा पूरी होने के बाद आराम से जीवन गुजारने और पेंशन का लाभ पाने के लिए भी कुछ जवानों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी। दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों से तकरीबन हर साल पूछे जाने वाले इस सवाल का इसी तरह रटा-रटाया जवाब दिया जाता है।

लिखित तौर पर दिए गए कारणों पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते, क्योंकि कानूनन सशर्त इस्तीफा और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन स्वीकार नहीं किए जा सकते। लेकिन, नौकरी छोड़ने वाले जवानों से बातचीत करने पर पूरी तरह से एक अलग तस्वीर सामने आती है।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या इस्तीफा देकर अर्द्धसैन्य बल छोड़ने वाले जवानों और अधिकारियों की संख्या से जाहिर है कि दक्ष प्रतिभाओं को बनाए रखने के लिए गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि इनके प्रशिक्षण पर काफी खर्च किया जाता है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले अर्द्धसैन्य बलों के अन्य रैंकों के कर्मियों की संख्या 2015 के मुकाबले 2017 में करीब चार गुना बढ़ गई। इसी दौरान बीएसएफ में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले कर्मियों की संख्या में करीब 12 और सीआरपीएफ में छह गुना की वृद्धि देखी गई, जो और भी चिंताजनक है। राजपत्रित अधिकारियों (गजेटेड ऑफिसर्स) और अधीनस्थ अधिकारियों (सबऑर्डिनेट ऑफिसर्स) के मामले में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिल रहा है। ऐसे वक्त में जब बाजार में आसानी से नौकरी उपलब्ध नहीं है, अर्द्धसैन्य बलों से जवानों का मोहभंग होना बताता है कि इस संबंध में गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। इतने सारे राजपत्रित अधिकारी, अधीनस्थ अधिकारी और अन्य रैंकों के कर्मियों का एक छोटी सेवा अवधि के बाद ही अपेक्षाकृत बेहतर वेतन वाली नौकरी से इस्तीफा देने के विकल्प का इस्तेमाल करना जड़ जमा चुकी बीमारी की तरफ इशारा करता है।

अर्द्धसैन्य बलों के जवानों की सेवा शर्तें ऐसी हैं कि उनकी तैनाती एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर होती रहती है। इसके उलट सेना की तैनाती बारी-बारी से शांत और अशांत जगहों पर होती है। बीएसएफ की टुकड़ियां इन हालात की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हैं कि अब मजाक में कहा जाता है कि टुकड़ियों की तैनाती की जगह में बदलाव सीमा स्तंभों की संख्या बदलने के सिवा कुछ नहीं है। अन्य सीमा रक्षक बलों की स्थिति भी ऐसी ही है। आंतरिक सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ यूनिट की लगातार तैनाती की जाती है, जिसमें उनके लिए नए सिरे से तैयार होने का वक्त नहीं होता।

यहां तक कि इन बलों के प्रशिक्षण के लिए भी कंपनियां उपलब्ध नहीं होतीं, क्योंकि वे तकरीबन हर वक्त कानून-व्यवस्था बनाए रखने, चुनाव कार्यों या अन्य आंतरिक सुरक्षा मोर्चे पर प्रशासन की सहायता के लिए तैनात रहती हैं। इससे कमांडर हों या अन्य रैंक के कर्मी उन्हें खुद को तरोताजा रखने के लिए प्रशिक्षण, आराम, राहत और छुट्टी देने की व्यवस्था बाधित होती है। चुनावों के दौरान खासकर पंचायत चुनावों में तैनाती तो कभी-कभी बेतुकी लगती है! ऐसे में नीति निर्माताओं के लिए यह तय करना जरूरी है कि इन बलों की दक्षता में कमी न आए। ‘एक बल, एक भूमिका’ को लेकर करगिल हमले के बाद नियुक्त मंत्री-समूह की सिफारिशें निश्चित तौर पर लागू की जानी चाहिए, ताकि ये बल खास मामलों में विशेषज्ञता हासिल कर सकें और बेहतर अभियान और प्रशिक्षण व्यवस्था को अपना सकें।

इन बलों की तैनाती की जगह पर वर्षों बाद भी बुनियादी ढांचा और सुविधाएं मानक के अनुसार नहीं हैं। बल में शामिल होने वाले युवा शिक्षित और आधुनिक तकनीक तथा लाइफस्टाइल से परिचित हैं। उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में बल सक्षम नहीं हैं। इसके दो मूल कारण हैं। पहला, इन बलों का नेतृत्व कर रहे लोगों की गलत प्राथमिकताएं। वे बॉर्डर आउट पोस्ट (बीओपी) पर सुविधाओं से ज्यादा मुख्यालय में अधिकारियों के संस्थान को तरजीह देते हैं। दूसरा, बेतरतीब विस्तार के कारण मौजूदा बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त बोझ बढ़ना। अतिरिक्त बुनियादी ढांचे के निर्माण की रफ्तार का इन बलों के विस्तार की गति से तालमेल नहीं है। मसलन, बाड़मेर में बीएसएफ के ज्यादातर बीओपी में पीने के पानी की पाइपलाइन की सुविधा नहीं है और वे पानी के टैंकर पर आश्रित हैं। जैसलमेर और बीकानेर सेक्टर में भी ऐसी ही स्थिति है। यदि हम जवानों को पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता भी मुहैया नहीं करा सकते, तो हम अच्छी प्रतिभा को साथ बनाए रखने की उम्मीद भी नहीं कर सकते। ऐसा बताया जाता है कि इस संबंध में एक प्रस्ताव पिछले कुछ साल से सत्ता के गलियारों में धूल खा रहा है। नीति निर्माताओं के लिए जरूरी है कि वे हालात को तत्काल दुरुस्त कर प्रशासन में सुधार लाएं।

परिवार से दूर जीवन व्यतीत करने वाले जवानों के घर जाने के लिए दो महीने के अर्जित अवकाश और 15 दिन के आकस्मिक अवकाश की व्यवस्था है। छुट्टी की योजना साल के शुरुआत में बनाई जाती है, लेकिन ड्यूटी में अनिश्चितताओं के कारण शायद ही कभी इसका पालन हो पाता है। परिसरों में उपलब्ध पारिवारिक आवास का स्केल केवल 14 फीसदी है और तेजी से विस्तार के कारण जवान आवास साझा करने को मजबूर हैं। इससे मनोबल पर विपरीत असर पड़ता है, खासकर यदि जरूरत के वक्त जवान अपने परिवार के साथ रहने में असमर्थ हो। इससे वे सामान्य पारिवारिक जीवन से वंचित होते हैं, जो तनाव पैदा करता है। कभी-कभी यह अनुशासनहीनता और यहां तक कि साथियों की हत्या के रूप में बाहर निकलता है। प्रोन्नति के मौकों की कमी खासकर, राजपत्रित अधिकारियों के बीच, भी इसका एक अहम कारण है। बीएसएफ में जवान को 20 साल की सेवा से पहले प्रोन्नति नहीं मिलती। लगातार विस्तार की वजह से अन्य बलों में स्थिति थोड़ी बेहतर है। इतनी देरी से प्रोन्नति मिलना नौकरी छोड़ने का प्रमुख कारण है।

अधिकारियों के मामले में स्थिति और भी खराब है। इस सदी के पहले दशक में बीएसएफ में शामिल होने वाले कुछ अधिकारी अपने पूरे करिअर में सिर्फ एक प्रोन्नति पाकर सेवानिवृत्त हो जाएंगे! हालिया कैडर समीक्षा (25 साल से अधिक समय के बाद) से हालात बदलने की कोशिश केवल समस्या को टालने में सफल रही है। ऐसे में ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि मौजूदा स्थिति से कमतर और आर्थिक लाभ नहीं होने पर भी युवा अधिकारी और अधीनस्थ अधिकारी पहला मौका मिलते ही इस्तीफा दे देते हैं। उच्च स्तर पर नीति तय करने वाले पद कैडर अधिकारियों के लिए उपलब्ध नहीं हैं, जो बल की कार्य संस्कृति और उसके मिजाज से बखूबी परिचित होते हैं। अशांत राज्यों से बचने या दिल्ली अथवा अपने गृह नगर में नियुक्ति के वादे पर प्रतिनियुक्ति पर आने वाले इन बलों के आइपीएस अगुआ की न तो सुधार में रुचि होती है और न ही उनका कुछ दांव पर लगा होता है। इसलिए, पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की हालिया सिफारिशों को, जो केंद्रीय अर्द्धसैन्य बलों के लिए आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति पर गंभीरता से अंकुश की वकालत करती हैं, का कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए। इन कदमों से उन कारणों पर कुछ हद तक अंकुश लगेगा जिसके कारण जवानों का सेवा से मोहभंग हो रहा है। इन मसलों पर गौर कर सरकार को सुधार के लिए कदम उठाने चाहिए। इसमें किसी भी तरह की देरी से इन बलों की दक्षता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बलों का नेतृत्व अब इनके खुद के कैडर के अधिकारियों के हवाले कर देना चाहिए, जिससे इन बलों को लेकर उनके गहन ज्ञान का लाभ नीतिगत स्तरों पर हालात में सुधार लाने के लिए मिल सके।

(लेखक बीएसएफ के रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर जनरल और सुरक्षा विश्लेषक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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