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महामारी से और बढ़ा डिजिटल फासला

संतोष चौबे - JUN 15 , 2020
महामारी से और बढ़ा डिजिटल फासला
महामारी से और बढ़ा डिजिटल फासला
संतोष चौबे

शहरी गरीब और ग्रामीण अभी तक डिजिटल क्रांति के आसपास भी नहीं, तिस पर रोजगार गंवाने से इंटरनेट, मोबाइल पहुंच भी घटी

पिछले दो दशकों में हमारे देश में डिजिटल सेवाओं का काफी विस्तार हुआ है। उसका सबसे बड़ा प्रभाव बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में देखने को मिलता है। सरकार की तरफ से ऑनलाइन पेमेंट को बढ़ावा देने के कारण ऑनलाइन लेन-देन में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। माना जाता है कि अब लगभग चालीस प्रतिशत लेन-देन ऑनलाइन माध्यमों से हो रहा है। देश भर में पंचायत स्तर तक नागरिक सुविधा केंद्रों यानी कॉमन सर्विस सेंटर का जाल बिछाया गया है जो कई तरह की सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। किताबें हों, कपड़े हों या घरेलू उपयोग का कोई और सामान, सब कुछ घर बैठे मंगवाया जा सकता है। अब तो राशन और सब्जियां आदि भी सीधे स्टोर से घर पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। शिक्षा, आवागमन, यातायात, चिकित्सा, शोध और विकास जैसे सभी क्षेत्रों में सूचना तकनीक ने अपना हस्तक्षेप बढ़ा लिया है। यह प्रगति की दिशा में एक अच्छा सूचक है। भारत सूचना सेवाओं के लिए एक निर्यातक देश माना जाता है और हमें विश्व में सॉफ्ट पावर की तरह देखा जाता है।

इस तरह ऊपर से देखने पर लग सकता है कि हमारे देश में सूचना क्रांति बदस्तूर जारी है, पर वर्तमान त्रासदी ने डिजिटल डिवाइड का एक नया चेहरा सामने ला दिया है। लॉकडाउन का पहला झटका झेलने के बाद अधिकतर शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग अपने घरों में बंद हो गया। उससे अपेक्षा भी यही की जा रही थी। उसके पास अन्य लोगों से बेहतर डिजिटल सुविधाएं थीं, जिनसे वह वर्क फ्रॉम होम जैसी लग्जरी का लाभ उठा सकता था। उसके पास शायद घर में कंप्यूटर और लैपटॉप थे, ब्राड बैंड कनेक्टिविटी थी और कंप्यूटर का प्रारंभिक ज्ञान भी था। वह अपने काम को घर से करने की स्थिति में था। समय गुजारने के लिए उसके पास मनोरंजन के कई डिजिटल साधन थे, वह स्ट्रीमिंग कर सकता था, नेटफ्लिक्स, प्राइम और हॉटस्टार जैसे चैनलों पर फिल्म देख सकता था, संगीत सुन सकता था। वह दुनिया भर की गतिविधियों में ऑनलाइन कम्युनिटी बनाते हुए शामिल हो सकता था। ऐसे लोगों ने तत्काल अपने ऑनलाइन समूह बना लिए और वैश्विक विमर्श में वेबिनार आदि के माध्यम से शामिल हो गए।

अब इसकी तुलना सड़कों पर निकले उन लाखों मजदूरों से कीजिए जिन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा और जो जीवनयापन के संसाधन ढूंढ़ने के लिए वापस अपने गांवों की ओर पलायन कर रहे थे। उनके पास शायद एक मोबाइल फोन था जिसका प्रयोग वे अपने घर पर या सगे-संबंधियों से बात करने के लिए कर रहे होंगे, वह भी तब अगर सौभाग्य से उस फोन में कुछ चार्ज उपलब्ध हो। आप कह सकते हैं कि डिजिटल माध्यमों से सरकार उन तक दो हजार रुपये पहुंचाने की बात कर रही है और कई प्रदेशों में उन्हें यह रकम वितरित भी की जा चुकी है। यह अच्छी बात है, लेकिन इन रुपयों को प्राप्त करने के लिए उनका नाम किसी न किसी डाटाबेस में होना आवश्यक है, फिर उनका एक अकाउंट भी होना चाहिए और अकाउंट तक उनकी पहुंच भी बनी रहनी चाहिए। फिलहाल, घर जैसी सुविधाओं की बात तो हम छोड़ ही देते हैं और मनोरंजन के उन साधनों की भी, जो डिजिटल टेक्नोलॉजी के माध्यम से मध्य वर्ग या उच्च वर्ग को प्राप्त है। उसे दो हजार रुपये मिल भी गए तो उनका उपयोग वह परिवार के भोजन के लिए करेगा, मनोरंजन के लिए नहीं। वह मोबाइल फोन का उपयोग भी शायद इसलिए कर पाता है कि वहां भाषा या इंटरफेस बाधक नहीं बनता।

एक दूसरा उदाहरण मैं स्कूली शिक्षा के क्षेत्र से देना चाहता हूं। फिलहाल, स्कूल बंद हैं और बच्चे अपने-अपने घरों में हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक स्कूल अपनी शाला में पढ़ने वाले बच्चों से संपर्क रखना चाहता है और ऑनलाइन माध्यमों से कुछ न कुछ कंटेंट उन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। टेलीविजन चैनलों पर कुछ बड़ी कंपनियों के फिल्मी सितारों से जगमग विज्ञापन देखने को मिलते हैं जिनमें यह बताया जाता है कि अगर आप उस बड़ी कंपनी का एप डाउनलोड कर लें तो आपके बच्चे की सारी समस्याएं सुलझ जाएंगी। फिलहाल मैं टेक्नोलॉजी के माध्यम से स्कूली शिक्षा के औचित्य की बहस में नहीं जाना चाहता और न ही इस बात पर कि अधिकतर कंटेंट अब भी हमें अंग्रेजी में ही मिलता है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को इसमें निश्चित ही दिक्कत आती होगी।

यहां मैं ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में बच्चों के साथ ऑनलाइन शिक्षण के प्रयोग का जिक्र करना चाहता हूं। कुछ दिनों तक तो उन्हें इसमें आनंद आया क्योंकि यह एक नई तरह की चीज थी, लेकिन कुछ ही दिनों में स्पष्ट हो गया कि अधिकतर ग्रामीण बच्चों के पास एंड्रॉयड फोन नहीं हैं। अगर उनके परिवार में माता-पिता के पास एक फोन है भी तो वह उसका उपयोग बच्चों को करने नहीं देते, और एक घंटे के लिए फोन उन्हें मिल भी जाए तो डाटा की स्पीड इतनी कम है कि पढ़ाई-लिखाई या शिक्षण ठीक से हो नहीं पाता। एकाध हफ्ते में डाटा समाप्त हो जाता है और रिचार्ज कराने में पैसे लगते हैं, जिसका टोटा हमेशा बना रहता है।

इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों के बच्चों के पास एंड्रॉयड फोन की उपलब्धता ज्यादा है। यहां बच्चों के पास लैपटॉप या टैबलेट भी हो सकता है और वे ऑनलाइन माध्यम से थोड़ा ज्यादा हासिल कर सकते हैं। लेकिन शहरी गरीब बच्चों की हालत अपने ग्रामीण दोस्तों से कोई बहुत अलग नहीं। बड़े पैमाने पर ग्रामीण और छोटे कस्बों के बच्चे, आदिवासी और समुद्री तथा पहाड़ी इलाकों के बच्चे शिक्षा में हो रही इस डिजिटल क्रांति के करीब ही नहीं पहुंच पाते। इसलिए फासला और बढ़ता जाएगा।

पूर्व राष्‍ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कहा था कि हमारे देश में डिजिटल डिवाइड कई रूपों मे देखने मिलता है। वह अमीर और गरीब के बीच टेक्नोलॉजी के उपयोग का डिवाइड तो है ही, लेकिन वह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच तकनीकी खाई के रूप में भी दिखता है, और जेंडर डिवाइड के रूप में स्त्रियों और पुरुषों में टेक्नोलॉजी के उपयोग में असमानता के रूप में भी। कोविड-19 के रूप में आई वर्तमान आपदा ने इस डिवाइड के कुछ नए रूप हमें दिखाए हैं और शायद यह भी बताया है कि डिजिटल खाई को भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद यह डिवाइड जो अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आता है, वह मूलतः अमीर और गरीब के बीच का डिवाइड ही है। इस स्थिति में टेक्नोलॉजी संपन्न लोगों के साथ खड़ी नजर आती है।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि टेक्नोलॉजी साधन तो हो सकती है पर अपने आप में साध्य नहीं। अनाज वितरित करने के लिए पहले उसे उगाना पड़ेगा, उत्पादों को ऑनलाइन उपलब्ध कराने के लिए उत्पादन करना पड़ेगा तथा डिजिटल पेमेंट को सुलभ बनाने के साथ-साथ धन भी उपलब्ध कराना होगा। यह शायद रोजगार और क्रियाशीलता के माध्यम से ही संभव हो सकेगा। डिजिटल क्रांति विकास का आभास तो जरूर देती है पर वास्तविक विकास जमीन से जुड़ कर ही होगा।

(लेखक सीनियर अशोका फेलो और एआइएसईसीटी ग्रुप के संस्थापक तथा चेयरमैन हैं)

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