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शरणागत को शरण देने की परंपरा को आगे बढ़ाएगा नागरिकता कानून

रमेश पोखरियाल 'निशंक' - DEC 29 , 2019
शरणागत को शरण देने की परंपरा को आगे बढ़ाएगा नागरिकता कानून
शरणागत को शरण देने की परंपरा को आगे बढ़ाएगा नागरिकता कानून
रमेश पोखरियाल 'निशंक'

युग-युगांतर से भारतीय संस्कृति ने मानव सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक  अध्यात्मिक विकास में हमेशा ही बहुत बड़ा योगदान दिया है| भारत की संस्कृति इस देश की आत्मा है। यह संस्कृति एक निरंतर प्रवाहमान धारा है, जिसे ऋषियों, संतों और सूफियों ने अपनी साधना और दर्शन से सींचकर एक वट वृक्ष के रूप में विकसित कर विश्व को प्रेरित किया है|सर्वधर्म संभव, करुणा, प्रेम, सहिष्णुता, समरसता, समर्पण त्याग, परोपकार की भावना इस संस्कृति के मूल तत्व है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 अल्पसंख्यक शरणार्थियों को वर्षों से चली आ रही यंत्रणा से निजात दिलाने के उद्देश्य से लाया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अधिनियम की मूल भावना को बड़े अच्छे ढंग से अभिव्यक्त किया है। उन्होंने कहा, "नागरिकता संशोधन विधेयक कोई उपकार नहीं है । यह अधिनियम भारत मां में आस्था रखने वालों के हितों की रक्षा करेगा।"

यह अधिनियम जहां एक ओर देश के संविधान की मूल भावना को पोषित, रक्षित करता है, वही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को पुष्पित पल्लवित करता है। इस अधिनियम का बड़ा सीमित उद्देश्य है। मूलतः यह अधिनियम पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के संबंध में है जो निर्मम अत्याचार से त्रस्त रहे हैं| 31 दिसम्बर 2014 या उससे पहले से भारत में रह रहे हिदू, सिख,बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई, जिन पर निर्मम अत्याचार हुए हैं, उनको भारत की नागरिकता देने की बात कही गयी है। नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद इन तीन देशों के उपरोक्त अल्पसंख्यक समाज के लोग तभी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन दे सकते हैं, जब उन्हें भारत में रहते हुए पांच वर्ष पूरे हो चुके हों, इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? उपेक्षित, त्रस्त, प्रताड़ित, सताए लोगों को अगर शरण देने की बात है तो यह तो युगों-युगों से होता आया है। वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु  सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया; की भावना से प्रेरित होकर दुनिया के हर असहाय, कमजोर व्यक्ति को हमने आसरा दिया है। हमारा गौरवमयी इतिहास रहा है, एक समृद्ध परंपरा रही है कि हम सदैव से उत्पीड़ित लोगों को हमेशा आश्रय देते आये हैं। चाहे मामला पारसी लोगों को अथवा हाल ही में तिब्बत समुदाय के लोगों को आश्रय देने का हो, भारत ने हमेशा अपनी धरती पर दूसरे देशों में पीड़ित अल्पसंख्यकों का दिल खोलकर स्वागत किया है। यहां पर ध्यान देने योग्य है कि नागरिकता संशोधन कानून केवल हिंदू समुदाय के लिए नहीं बल्कि दूसरे अल्पसंख्यक सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लिए भी है। 12 जुलाई 1947 की प्रार्थना सभा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "जिन लोगों को पाकिस्तान से भगाया गया था, उन्हें पता होना चाहिए कि वे पूरे भारत के नागरिक थे.... उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की सेवा करने और उनकी महिमा से जुड़ने के लिए पैदा हुए थे।" केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर अल्पसंख्यको के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। यहां पर यह बताना आवश्यक है कि विश्व के किसी भी देश के मुस्लिम भारतीय नागरिकता के लिए मूल भारतीय अधिनियम के नियम के तहत आवेदन दे सकते हैं और नागरिकता पा सकते हैं|यहां तक की पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमान भी भारतीय नागरिकता कानून के नियमों के तहत आवेदन कर सकते हैं और शरण ले दे सकते हैं| देश के विभिन्न भागों में लोगो को भ्रम जाल में फंसाकर राजनीति की जा रही है। राजनीति, सत्ता लोलुपता और स्वार्थ की पराकाष्ठा का यह आलम है कि कुछ इसे भारतीय संविधान और भारतीय मूल्यों के विरुद्ध बता रहे हैं। विरोध कर रहे विद्यार्थियों और आम लोगों को यह नहीं पता कि वे विरोध किस बात का कर रहे हैं। यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि राजनीति से प्रेरित एक दुष्प्रचार किया जा रहा है कि भारत में अनधिकृत रूप से रह रहे विदेशियों को देश से बाहर निकालने के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत प्रत्येक व्यक्ति की जांच होगी। सच बात यह है कि ऐसे मामलों पर निर्णय फॉरिनर एक्ट विदेशियों से सम्बंधित  अधिनियम के तहत ही होगा, न कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के अंतर्गत। ऐसा नहीं है की भारत में पूर्व में किसी को शरण नहीं दी गयी। पहले भी भारत में तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका और युगांडा  के लोगों को पूर्व में शरण दी जा चुकी है।

यह भ्रान्ति फैलाई जा रही कि भारत में रह रहे अल्पसंख्यकों को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। पूरे देश को यह बताना जरूरी है कि कि इस नये अधिनियम के तहत नागरिकता साबित करने हेतु कोई भी दस्तावेज नहीं दिखाना होगा| यहां पर हास्यास्पद लगता है कि कुछ लोग रोहिंग्या की बात कर रहे हैं। जहां तक रोहिंग्या का प्रश्न है उनमें से अनेक लोग म्यांमार में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं|कुछ लोग सविधान के अनुछेद 14 और 21 की दुहाई देकर इस बात को साबित करने में जुटे हैं कि इस अधिनियम को लाकर सरकार ने इन  दो अनुच्छेदों का उल्लंघन किया है। जबकि सच यह है कि यह अधिनियम इन अनुच्छेदों की किसी भी प्रकार से अवहेलना नहीं करता है। संसद विशेष परिस्थितियों को देखकर कानून बना सकती है, जैसे हज पर जाने वाले यात्रियों को सब्सिडी देती है। मोदी सरकार संकल्प लेने के बाद उसे सदैव सिद्ध करती है। देशवासियों से जो भी वादा किया जाता है, उसे पूरी ईमानदारी से अमल में लाया जाता है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं कि यह बिल परंपरागत भारतीय मूल्यों के साथ उन सार्वभौमिक मूल्यों के सरंक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है जिनसे भारत की विश्व में पहचान बनी है। इस अधिनियमके संबंध में कई भ्रांतियां हैं जो निराधार हैं| लोगों ने अपने ढंग से और अपनी आवश्यकता के अनुसार उसकी व्याख्या शुरू कर दी। राजनीति, सत्ता लोलुपता और स्वार्थ की पराकाष्ठा का यह आलम है कि कुछ इसे भारतीय संविधान और भारतीय मूल्यों के विरुद्ध बता रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि यह हमारे सांस्कृतिक मूल्यों  से प्रेरित और संविधान की मूल भावना से ओत प्रोत है। भाजपा ने हमेशा राजनीति को छोड़कर राष्ट्रहित के लिए समर्पित भाव से काम किया है। यही बात हमको दूसरों से अलग करती है, चाहे 370 का मामला हो, 35ए का निरस्तीकरण हो, चाहे राम जन्म भूमि विवाद सुलझाने की बात हो, छोटे किसानो और व्यापारियों को पेंशन देने की बात हो या फिर एकीकृत जल शक्ति मंत्रालय का गठन का विषय हो, चाहे देश के गरीब, पिछड़े, उपेक्षित लोगों का सामाजिक आर्थिक विकास हो, भाजपा ने अपने वादों को निभाया है। पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों की भाषाई सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के लिए हमारी प्रतिबद्धता कई बार विभिन्न स्तरों पर दोहराई जा चुकी है। इतिहास के जानकारों को यह ज्ञात होगा कि पाकिस्तान संसद में मोहम्मद अली जिन्ना ने यह कहा था कि पाकिस्तान धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और आधुनिक देश होगा। लेकिन दुर्भाग्य से यह सबसे बड़ा ऐतिहासिक झूठ निकला और पाकिस्तान के बनते ही अल्पसंख्यको पर जमकर अत्याचार शुरू हो गया और उनका शारीरिक और मानसिक शोषण होने लगा, जिससे वे लोग भागने पर मजबूर हो गए। कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में 27 फरवरी 1950 को जारी बयान पट्टाभि सीतारमैया ने कहा था, "संघर्ष और पीड़ा का सिलसिला जारी है और बार-बार संकट पैदा करता है। वर्तमान में अनिवार्य रूप से पूर्व और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की रक्षा करने का मुद्दा है।" आखिर क्या कारण है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का अनुपात घटता चला गयाl आखिर ये लोग कहां चले गए? या तो यह लोग शरणार्थी बन गए या उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया या फिर उन्हें साम्प्रदायिक हिंसा झेलनी पडी। आज जो अधिनियम बनाया गया है, वह पिछले कई दशकों में अल्पसंख्यकों पर हुए घोर अत्याचारों का परिणाम है। आज जो लोग इस अधिनियम का विरोध कर रहे हैं, क्या वे इस बात को भूल गए कि 2005 में यूपीए सरकार ने लोकसभा में पाकिस्तानी मानवाधिकार कमीशन का हवाला बताया था कि पाकिस्तान के हिंदुओं के खिलाफ हिंसा हो रही है। वर्ष 2007, 2010 और 2011 में सरकारों ने सदन को पाकिस्तान में हिंदुओं के उत्पीड़न के विषय में विस्तार में बताया। बांग्लादेश के विषय में भी ऐसी जानकारी सदन को समय-समय पर दी जाती रही है। हाल में देखने में आया है कि विपक्षी दलों द्वारा विभिन्न कारणों से अनुच्छेद 14 की संकीर्ण व्याख्या की है। इन लोगो ने इस अनुच्छेद की व्यापकता एवं वास्तविक संदर्भ में नहीं लिया। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता का अधिकार अत्यंत व्यापक है। हमें यह समझना होगा कि नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 अत्यंत मानवीय आधार पर लाया गया है। इन प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदायों के पास अपना देश छोड़कर भारत में आकर शरण लेने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं था।

महात्मा गांधी ने 26 सितंबर 1947 को प्रार्थना सभा में खुली घोषणा की थी कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख हर नजरिए से भारत आ सकते हैं, अगर वे वहां निवास नहीं करना चाहते हैं। उस स्थिति में उन्हें नौकरी देने और उनके जीवन को सामान्य बनाना भारत सरकार का पहला कर्तव्य है। आखिर यही कुछ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश ने इस अधिनियम के माध्यम से किया है। फिर विरोध क्यों? इस बात में कोई भी शक नहीं कि प्रधानमंत्री को आम चुनाव में एक बड़े जनादेश के साथ चुना गया है। 30 मई 2019 को गठन होने के बाद छह महीने में ही सरकार ने जिस तरह से सारे देश को बदला है, उसकी सर्वत्र चर्चा है  इस अधिनियम के लिए कवायद 2014 में प्रारंभ हुई थी और आज यह प्रयास सफल हुआ हैं। अगर आप क्रमवार ब्यौरा देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि भाजपा इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हमेशा गंभीर रही है और इसके लिए समर्पित भाव से काम किया है। 15 जून 2015 को आंकड़े जारी किये गए कि पाकिस्तान अफगानिस्तान से 4300 हिंदू और सिख एक साल में शरणार्थी बनकर भारत आए। हमारी पिछली सरकार ने उनकी दुर्दशा को देखकर 19 जुलाई 2016 को नागरिकता संशोधन विधेयक को लोकसभा में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात अधिक विचार विमर्श, मंथन के लिए अगस्त 2016 को इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। पूरे ढाई साल तक संयुक्त संसदीय समिति ने नागरिकता संशोधन मसौदे का गहन अध्ययन किया और जनवरी 2019 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। यह बिल लोकसभा में प्रस्तुत किया गया जनवरी 2019 में विधायक लोकसभा में पास हुआ, लेकिन राज्यसभा में रुक गया। पिछली लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह विधायक सौदा रद्द हो गया था इसलिए अब इसे पुनः संसद के दोनों सदनों में पारित कराया गया।  

भारत में हमेशा शरणागत लोगों का स्वागत किया गया है। उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए उचित वातावरण भी दिया गया। चाहे महात्मा गांधी हो, सीतारामय्या हो, जेबी कृपलानी हों, अब्दुल कलाम आजाद हो, श्यामा प्रसाद मुखर्जी हों या त्रिदेव कुमार चौधरी हों, सब ने इस बात की चिंता की है कि शरणार्थी को सम्मान सहित घर मिलना चाहिए। हमेशा से ही विश्व कल्याण की भावना से ओत-प्रोत भारत ने मानवता के हित में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं, उसे दुनिया जानती है। मोदी सरकार के प्रयास से जब ये प्रताड़ित भारत में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर प्राप्त करेंगे  तो निश्चित रूप से भारत की कीर्ति, गौरव और सम्मान पूरे विश्व में बढे़गा।

(लेखक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री हैं, प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं)

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