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गठजोड़ों के गणित

महेश रंगराजन - JAN 24 , 2019
गठजोड़ों के गणित
एकताः पिछले दिनों नई दिल्ली में विपक्षी नेताओं की जुटान से एकजुटता का संकेत देने की कवायद
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महेश रंगराजन
“इस बार चुनाव तय करेंगे कि निर्णायक, मजबूत नेतृत्व चाहिए या साझा संतुलित नेतृत्व”

नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में इतिहास रचा। अटल बिहारी वाजपेयी 2004 में अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। लेकिन उनकी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं था। अब देश पहली बार हिंदुत्व काडर आधारित पार्टी भाजपा को 2019 में पांच साल पूरा करते देखेगा।

इस आम चुनाव में कांग्रेस और उसके नेता की लोगों तक पहुंच और ताकत ही है कि कई बड़े राज्यों में प्रमुख विपक्षी दलों ने हाथ मिला लिया है। ऐसी ही तस्वीर 2004 के आम चुनावों के पहले भी सामने आई थी और एनडीए सरकार को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

लेकिन एक फर्क भी है। उस समय कांग्रेस 145 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी और 55 सांसदों के साथ वामपंथी दल अहम ताकत बनकर उभरे थे। इसके अलावा, सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में कोई गठबंधन नहीं था। इस बार उत्तर प्रदेश में मंडल और दलित पार्टियों का गठबंधन है। साथ ही, दक्षिण में संभावित सहयोगियों के साथ आने से कांग्रेस बढ़त की स्थित में है।

देश में एक से अधिक दलों वाली सरकारों का होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन 1977 से पहले तक कभी भी गठबंधन सरकार नहीं बनी थी। शायद यह बहुत कम लोगों को पता है कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल की अगुआई वाले आजाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में छह गैर-कांग्रेसी मंत्री थे। इनमें डॉ. भीमराव आंबेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और एन.सी. चटर्जी प्रमुख नाम थे। लेकिन पहली गठबंधन सरकार मार्च 1977 में जनता पार्टी, अकाली और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी की बनी।

इसके पहले 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने पूरे देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन किया। इंदिरा कांग्रेस ने 1971 में 352 सीटें जीतीं और भाकपा को 23 सीटों पर सफलता मिली। इंदिरा गांधी ने केरल में क्षेत्रीय पार्टियों और तमिलनाडु में द्रमुक के साथ भी गठबंधन किया। इससे द्रमुक के खाते में 23 सीटें गई थीं। लेकिन लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत वाली कांग्रेस को सदन में सहयोगियों की जरूरत नहीं पड़ी।

हालांकि, कांग्रेस के लिए 15 साल पहले तक सत्ता का बंटवारा अभिशाप की तरह था। लेकिन कांग्रेस के डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही देश में सबसे लंबे समय 10 वर्षों तक गठबंधन सरकार चली। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके अपने पतन और भाजपा के लगातार उदय से लोगों का मन बदला।

अब फिर 2019 में लोगों के रुझान में बड़े बदलाव की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। हालांकि पांच साल पहले कांग्रेस बमुश्किल 19.5 फीसदी वोट और 44 लोकसभा सीटों के साथ सबसे कमजोर नजर आई। इससे भी बढ़कर तेलुगु भाषी क्षेत्र में उसे बड़े उलटफेर का सामना करना पड़ा, जहां लोकसभा की 42 सीटें थीं। अविभाजित आंध्र प्रदेश 2004 और 2009 में इसका गढ़ हुआ करता था। अब हालात बदल गए हैं। कांग्रेस तमिलनाडु और बिहार में तो अपने सहयोगी दलों का छोटा घटक बनकर रह गई है।

तीन उत्तर भारतीय राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों में जीत से कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन तथ्य यह भी है कि सबसे अधिक आबादी वाले दो हिंदी भाषी राज्यों बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन काफी मायने रखते हैं। पिछड़े वर्गों में भाजपा के जनाधार में बढ़ोतरी के कारण नब्बे के शुरुआती दशक की वापसी की संभावना कम ही दिखाई देती है। लेकिन बिहार में 2015 के चुनाव और उत्तर प्रदेश में हालिया उप-चुनावों में सामाजिक गोलबंदी का एक नया दौर दिखा है।

इस मामले में नोटबंदी के दूरगामी असर से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान और छोटे कारोबारियों तथा मजदूरों की पतली हालत से उपजी नाराजगी पर भी गौर करने की जरूरत है। बिहार और उत्तर प्रदेश में जाति आधारित संगठन और आर्थिक असंतोष भाजपा को परेशानी में डाल सकते हैं, जो दिल्ली में मोदी सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा चुके हैं। इसी पृष्ठभूमि ने सपा-बसपा गठबंधन के लिए मजबूत आधार तैयार किया।

बेशक, हिंदुत्व की राजनीति ने उत्तर भारतीय परिदृश्य को कई मायनों में बदल दिया है लेकिन वह जाति या वर्ग आधारित राजनीति को खत्म नहीं कर पाई है। नोटबंदी की कारीगरों और स्वरोजगार वालों पर गहरी मार पड़ी। इनमें ज्यादातर लोग पिछड़ी तथा निचली जातियों और अल्पसंख्यक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। इसी तरह खेती करने वालों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है, क्योंकि यूपीए सरकार के दौर के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि नहीं हुई थी और नई सरकार शहरों में महंगाई कम करना चाहती थी। कांग्रेस को उत्तर, पश्चिम, मध्य भारत के प्रमुख राज्यों से काफी उम्मीदें हैं। इन्हीं में भाजपा से उसका सीधा मुकाबला है। 2014 में महाराष्ट्र सहित इन राज्यों ने सरकार बदलने के लिए जोरदार मतदान किया। इस बार किसानों की दुर्दशा और बेरोजगारी का मुद्दा ज्यादा अहम होगा। गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 45-50 प्रतिशत शहरी आबादी है और यहां छोटे व्यवसायियों में मोदी के लिए पहले जैसा उत्साह नहीं है।

 "दक्षिणी राज्यों की 131 सीटों पर कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी। इससे भाजपा की चिंता बढ़ सकती है"

यह भी तय है कि अभी रास्ता लंबा है और कई सीढ़ियां चढ़नी हैं। कांग्रेस के लिए चिंता का सबब वे प्रमुख राज्य हैं, जहां मजबूत क्षेत्रीय दल मुख्य खिलाड़ी होंगे। इनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। त्रिशंकु चुनावी नतीजे आने के बाद ओडिशा और तेलंगाना एक संभावित संघीय मोर्चे के प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने की कोशिश कर सकते हैं। अगर जगन मोहन रेड्डी की पदयात्रा का संकेत देखें, तो वे आंध्र प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं और उन पर सबकी नजरें होंगी।

यहां ध्यान देने की बात है कि पिछली गैर-कांग्रेसी सरकारों (यहां तक कि वाजपेयी की भी) के विपरीत मोदी की अगुआई वाली सरकार अधिक केंद्रीकरण में यकीन रखती है। इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा की 29 में से 18 राज्यों में गठबंधन या खुद की सरकार है। 1989-90 की वीपी सिंह सरकार के साथ शुरू हुई सत्ता के विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति के उलट, राष्ट्रीय राजधानी में आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण स्पष्ट रूप से दिखता है। कांग्रेस पहले की तुलना में कमजोर है और इस लिहाज से उसकी अगुआई वाले गठबंधन और संघीय मोर्चे के बीच मोलभाव का विकल्प अधिक हो सकता है।

यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस दक्षिण भारत में कैसे चुनाव लड़ेगी। 1977 में इंदिरा गांधी और 1989 में राजीव गांधी ने विंध्य के दक्षिण में मजबूत प्रदर्शन किया था। आज कांग्रेस को पहली बार आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में सीटों का बंटवारा करना पड़ रहा है।

दक्षिणी राज्यों की 131 सीटों पर कांग्रेस गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी। इससे भाजपा की चिंता बढ़ सकती है, लेकिन इसका मतलब यह भी होगा कि कांग्रेस के हिस्से कम और उसके सहयोगियों के हिस्से अधिक सीटें आएंगी।

यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या देश के लोग ‘निर्णायक, मजबूत नेता’ को पसंद करेंगे, जो निहितस्वार्थी समूहों पर अंकुश लगा सके और ‘देश को मजबूत’ बना सके, या क्या वे उसके राजनैतिक और आर्थिक रिकॉर्ड पर सवाल उठाएंगे, उसके वादों का हिसाब लेंगे और बदलाव के लिए फैसला करेंगे?

विकल्प पर नजर दौड़ाएं, तो क्या फिर सत्ता में साझेदारी की व्यवस्था की वापसी होगी, जहां बड़ी पार्टी केंद्र में होगी, लेकिन अन्य दल भी सत्ता साझा करेंगे। यह मनमोहन सिंह मॉडल के अनुरूप होगा। या फिर वाजपेयी वाला रास्ता अपनाया जाएगा? इससे जुड़ा एक बुनियादी सवाल भी है, जो इस कदर उलझन भरा और जटिल है कि बिना किसी खांचे में खड़े हुए उस पर बहस ही असंभव हो गई है। वाजपेयी पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो कभी कांग्रेसी नहीं रहे थे। लेकिन मोदी भाजपा सरकार का पहला चेहरा हैं।

इस दौर में ये सब सवाल बेहद पेचीदा हो उठे हैं कि हम अपने अतीत को कैसे देखते हैं, भारतीय होने का अर्थ क्या है, हिंदू धर्म के मायने क्या हैं और राष्ट्रवाद से उसका क्या नाता है, भारत का एशिया और पूरी दुनिया से क्या संबंध है, हमारे  अतीत और वर्तमान के बीच क्या संबंध है?

वास्तव में समस्या यह है कि गहरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के कारण इन सवालों पर भाजपा का नजरिया उन लोगों को समझाना मुश्किल होता है, जो भाजपा और संघ परिवार के विचारों से ताल्लुक नहीं रखते हैं। उनकी बहस का मुद्दा यह है कि राजनीति में आस्था की क्या जगह है या भारतीय होने का मूल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक विशिष्ट विचारधारा में निहित है। लेकिन कांग्रेस के साथ-साथ उसके क्षेत्रीय सहयोगियों की एक अलग विचारधारा, परंपरा और पहचान है। लिहाजा, चुनावों में जितनी बहस दाल-रोटी,  कर्ज और नौकरियों के मुद्दे पर होगी, उतनी ही यह विचारधारा और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी होगी। गठबंधन मायने रखेगा, लेकिन यह जनता तय करेगी कि अगले पांच साल कौन और कैसे शासन करेगा।

(लेखक हरियाणा स्थित अशोका यूनिवर्सिटी में हिस्‍ट्री और एनवायर्नमेंटल स्टडीज के प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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