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दशकों पीछे जाने का डर

कौशिक बसु - APR 30 , 2020
दशकों पीछे जाने का डर
दशकों पीछे जाने का डर
कौशिक बसु

अभी यह अंदाजा लगाना जल्दबाजी होगी कि जब हम कोविड-19 की सुरंग से निकले तो दुनिया कैसी दिखेगी। फिलहाल, हम इस सुरंग के बाहर रोशनी नहीं देख पा रहे हैं। हमें यह भी नहीं मालूम है कि कोई सटीक टीका भी मिल पाएगा, जिससे हम कोविड के थोड़े-बहुत डर के साथ जीना और काम करना शुरू कर पाएंगे, जैसे हम अब इन्फ्लूएंजा के साथ कर पा रहे हैं। या कुछ साल तक भरोसेमंद टीका ईजाद नहीं हो पाता है और हमें सामाजिक मेलजोल में दूरी रखकर और लगातार टेस्ट के जरिए वायरस के संक्रमण से बचे रहने के लिए आश्वस्त होना पड़ेगा और अपनी जिंदगी और आजीविका चलाते रहना होगा।

कोविड-19 के रहस्यमय संकट और उसके माकूल आर्थिक जवाब पर अनेक तरह के विचार चर्चा में हैं। हमें विश्व युद्धों और महामारियों के इतिहास से मालूम है कि ऐसी आपदाएं देशों के हालात पलट देती हैं, विजेता पिछड़ जाते हैं और पिछड़े अगुआ हो जाते हैं। फिर भी, तमाम अनिश्चितता के बावजूद, यह बेहद जरूरी है कि भविष्य के बारे में सोचा जाए और अपनी तरफ से भरसक कोशिश की जाए कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और उसके हिस्सेदार देश बेहतर करें और लोगों को बेवजह तकलीफ न झेलनी पड़े।

हमने देशों की अर्थव्यवस्थाओं के हालात के शुरुआती लक्षण देखना शुरू किया है और हम उसके आधार पर कुछ नतीजे निकाल सकते हैं। लिहाजा, अगर संभव हो तो, इस वक्त तमाम मतभेदों को दूर रखकर मानवता के सामने खड़ी इस चुनौती के मुकाबले के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए। वायरस के प्रकोप की रोकथाम और अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के बीच सही संतुलन बैठाने की चुनौती है। हम वायरस के प्रकोप की रोकथाम की कीमत गरीबों, कामगारों और प्रवासी मजदूरों को ही अदा करने नहीं दे सकते और न ही अर्थव्यवस्था की नींव इस कदर कमजोर होने दे सकते हैं कि हम महामारी से उबरने के बाद आर्थिक मलबे पर बैठे पाए जाएं। जिंदगियों और माली हालत के बीच चुनाव, दरअसल जिंदगियों और जिंदगियों के बीच चुनाव करने जैसा है।

वायरस के संक्रमण के फैलाव को रोकने की भारत की कोशिशों की तारीफ हुई है, सिर्फ केरल राज्य की नहीं, जिसे दुनिया भर से वाहवाही मिली है, बल्कि समूचे देश की। कोविड-19 के मामले भारत में अभी कम हैं। हर एक करोड़ लोगों में केवल पांच लोगों की जान गई है। यह आंकड़ा बेहद कम है, सिर्फ बेल्जियम के मुकाबले नहीं, जो इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है और प्रति एक करोड़ आबादी में 5,180 जानें गंवा चुका है, बल्कि कई दूसरे देशों के मुकाबले भी। मसलन, अमेरिका में यह अनुपात 1,370, स्पेन में 4,550, इटली में 4,080 और ब्रिटेन में 2,550 है।

जायज बात तो यह है कि प्रति एक करोड़ आबादी में मौत के आंकड़ों के मामले में भारत ही सबसे अलग नहीं है। अपेक्षाकृत कम आंकड़े फिलहाल लगभग समूचे अफ्रीका और दक्षिण एशिया के देशों में भी हैं। यह अनुपात बांग्लादेश में 7, श्रीलंका में 3, पाकिस्तान में 9, तंजानिया में 2, नाइजीरिया में 1 और इथोपिया में 0.3 है। कोई भी यह फर्क नहीं समझ पा रहा है कि एक तरफ यूरोप और उत्तरी अमेरिका है और दूसरी तरफ अफ्रीका और दक्षिण एशिया है। यह इसलिए तो हो नहीं सकता कि ये देश अलग-थलग हैं। बांग्लादेशी दुनिया भर में सबसे ज्यादा फैले हुए हैं और इथोपिया की चीन से आमदरफ्त काफी है। इसके बावजूद इन दोनों देशों में मृत्यु दर काफी कम है। आखिर, ऐसा क्यों है? इसका टका-सा जवाब तो यही है कि हम नहीं जानते। फिर भी, हमें वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के सभी वाजिब कदम उठाने ही होंगे। यह एहसास बेहद जरूरी है कि जोखिम शून्य नहीं हो सकता। जिंदगी में कुछ भी जोखिम से खाली नहीं होता। वायरस को हराने के लिए मकसद ‘प्रजनन दर’ या आर-ओ को एक से नीचे लाने का होना चाहिए। आर-ओ का मतलब है संक्रमण के शिकार एक व्यक्ति से औसतन कितने लोगों में संक्रमण फैल सकता है। किसी भी इलाके में अगर आर-ओ एक से नीचे आ जाता है, जैसा केरल में हुआ है, तो हम समझते हैं कि उस इलाके से बीमारी छंटने लगी है।

आर्थिक नीति की चुनौती यह है कि लॉकडाउन कैसे खोला जाए। यह बेहद सावधानीपूर्वक मगर फुर्ती से करना होगा। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया के 73 देशों में लागू सख्त लॉकडाउन में भारत सबसे ऊपर है। थोड़े समय के लिए यह फायदेमंद है। लेकिन सख्ती के पायदान पर कोई देश लंबे समय तक जमे रहना नहीं चाहेगा। उसका असर गरीबों की बर्बादी में दिखेगा और दीर्घावधिक आर्थिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएगा।

देश में बेरोजगारी दर आज 24 फीसदी है, जो अब तक की सबसे अधिक है। मार्च में भारत से पूंजी का पलायन सबसे अधिक हुआ है। मोटे तौर पर 15 अरब डॉलर देश से बाहर चले गए। यह मार्च में दुनिया की किसी भी उभरती हुई अर्थव्यवस्था से सबसे बड़ा पूंजी पलायन भी है। साफ है कि वैश्विक खिलाडि़यों की यह प्रतिक्रिया है कि अर्थव्यवस्था की गाड़ी थम गई है। लिहाजा, भारतीय रुपया कमजोर हुआ है और अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसी कुछ समस्याएं तो इस मनहूस दौर में उभरनी स्वाभाविक हैं। हम कुछ समय के लिए इन समस्याओं से निपट सकते हैं। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत विश्व व्यापार, निर्यात और कारोबार के मौके दूसरे देशों को थमा देगा और कामकाजी वर्ग को भारी दुर्दिन में धकेल देगा।

3 मई को लॉकडाउन का यह चरण खत्म होने पर हमें कारोबार खोलना शुरू करना होगा, निजी क्षेत्र, खासकर अनौपचारिक उद्यमों और छोटे उद्योगों को शुरू करने की इजाजत देनी होगी। आचार-व्यवहार के तौर-तरीकों, जैसे सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनने, हाथ धोने के नियम तो तय करने होंगे, लेकिन हमें गरीब मजदूरों को उनके काम की जगह पहुंचने की सुविधाएं भी शुरू करनी होंगी और हमारे फर्म और कारखानों को काम शुरू करने देना होगा। साथ ही, हमें आचार-व्यवहार से नियम-कायदों के प्रति सबकी ‘भागीदारी’ के लिए प्रोत्साहित करना होगा, न कि अफसरशाही के ‘फरमान’ से। भारत में ‘परमिट राज’ का लंबा इतिहास रहा है, जिसमें सारे कारोबार अफसरशाही की मर्जी पर निर्भर रहते थे। उसका रवैया यह था कि सबका गला दबाकर कुछ बड़ी कंपनियों को बढ़ने दिया जाए। नतीजतन, देश की आर्थिक वृद्धि लंबे समय तक अवरुद्ध रही। हमें उस पुराने रवैए के बढ़ जाने के खिलाफ चौकस रहना होगा।

भारत ही नहीं, सभी उभरते देश दोराहे पर खड़े हैं। इस अकाल-वेला में कोई भी अहम चूक सामान्य दौर जैसी नहीं होगी कि उसे सहज ठीक किया जा सके। कोई गलत कदम देश को कई दशकों तक पीछे धकेल सकता है।

(लेखक अमेरिका की कार्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्‍त्र के प्रोफेसर हैं, यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में भी प्रकाशित हुआ है)

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