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कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास

राजीव चंद्रशेखर - MAY 28 , 2020
कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास
कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास
राजीव चंद्रशेखर

कोविड-19 नामक महामारी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक जबदस्त झटका दिया है। इसमें अमेरिका जैसे बड़े देशों की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। अमेरिका में भी बेरोजगारी 25 फीसदी बढ़ गई है। तीन ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता देने के बाद भी आर्थिक वृध्दि में कमी आई है। इस महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भीषण संकट में डाल दिया है। जिन चार पैरों पर हमारी यह अर्थव्यवस्था बढ़ रही थी, उस पर इस महामारी का बुरा प्रभाव पड़ा है। जैसे-
1. उपभोग पर- लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के कारण वस्तुओं की मांग पर काफी प्रभाव पड़ा है।
2. मूलत: सप्लाई चेन पर आये व्यवधानों के कारण उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। पर मांग के मामले में इन व्यवधानों के कारण कोई भी व्यक्ति कुछ भी उत्पादित नहीं कर पा रहा है।
3. निर्यात- यह भी रुकी हुई स्थिति में है, क्योंकि वैश्विक उपभोक्ता भी विराम की स्थिति में आ गए हैं।
4. पूंजी प्रवाह- महामारी के कारण जोखिम बढ़ा है और उभरते बाजारों ने पूंजी प्रवाह के प्रभाव या मंदी को महसूस किया है।
यह सब और महामारी के सामान्य मनोवैज्ञानिक डर ने हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। कुछ लोगों ने 2020 के संकट की तुलना 2008 से की है, जो पूरी तरह से गलत है क्योंकि 2008 की मुश्किलें बैंकिंग सेक्टर की लिक्विडिटी से जुड़ी हुई थीं। मौजूदा मुश्किल का लगभग पूरी अर्थव्यवस्था पर गहरा व व्यापक प्रभाव है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में जैसे उपभोग, मांग, उत्पादन, सप्लाई चेन और पूंजी पर प्रभाव पड़ा है।


इस प्रकार की अचानक आई मुश्किल में, नरेंद्र मोदी सरकार ने तुरंत अपने तीन स्पष्ट उद्देश्य बताए हैं।
1.विभिन्न शहरों में स्थित अस्पतालों में आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरतों के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना।
2.अर्थव्यवस्था को संरक्षित कर और धीरे-धीरे कम नुकसान के साथ चालू किया जाए जिससे कंपनियां दिवालिया न हो जाए, नौकरियां खत्म न हो जाएं और कोविड के खतरे से वास्तविक अर्थव्यवस्था को झटका न लगे।
3.लॉकडाउन के कारण जिन गरीब एवं कमजोर वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा झटका पहुंचा है उन्हें धन, भोजन व आजीविका के लिए समर्थन की जरूरत है।

इस सरकार व आरबीआई ने तुरंत काम करना शुरु कर दिया था। पहली घोषणाओं में तीन महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बारे में बताया गया है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जरूरतमंदों की जरूरतों को पहचाना और कई हफ्तों और महीनों तक सोच-विचार कर, सावधानी से चरणबद्ध तरीके से आवश्यकता के अनुरूप ढील दी।
जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ता गया, और अब जब इसमें ढील दी जाने लगी, तब नरेंद्र मोदी सरकार के मध्यम एवं लंबे समय के उद्देश्य स्पष्ट होते गए और उनसे पॉलिसी एक्शन स्पष्ट नजर आने लगे। इसका उद्देश्य यह है कि अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे पटरी पर लाया जाए और, स्वास्थ्य सेवा एवं महामारी की निगरानी एवं प्रबंधन के क्षेत्र को कमजोर न किया जाए। 20 लाख करोड़ रुपये का पैकेज अर्थव्यवस्था और व्यवसाय को फिर से शुरू करने के लिए बनाया गया, ताकि नौकरियों को बचाया जा सके और साथ ही उन कमजोर एवं अनौपचारिक क्षेत्र के लोगों को सहायता दी जा सके।
इन पैकेजों की घोषणा और आर्थिक क्षेत्र में जो लिक्विडिटी मौजूद है, उस संबंध में किसी प्रकार का सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि वित्तीय सेक्टर अब तक की सबसे मजबूत स्थिति में है और और अर्थव्यवस्था को पुन: शुरू करने में मदद कर रही है। खासकर एमएसएमई, कृषि एवं अनौपचारिक क्षेत्र में। बैंकिंग सिस्टम में सात लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी उन कर्जदारों एवं निगमों को मिलनी चाहिए, जिन्हें उस क्रेडिट की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना सरकार एवं आरबीआई के लिए एक चुनौती है।
अर्थव्यवस्था में मांग को फिर से शुरू करना एक मुद्दा बना हुआ है। डिमांड शॉक सामाजिक दूरी, लॉकडाउन, सप्लाई में रुकावट और आम जनता में बने उनके भविष्य के लिए डर का मिलाजुला परिणाम है। मांग में इस गिरावट को व्यवस्थित तरीके से उलट कर भविष्य में उपभोक्ता के विश्वास को पुन:जागृत करने की आवश्यकता है।


अर्थव्यवस्था को 18 मई के लॉकडाउन के बाद फिर से पटरी पर लाने की व्यवस्था शुरू की गई है। इसके लिए कोई जादुई गोली नहीं चलाई जा सकती, इसको ठीक करने लिए कोई तुरंत उपाय भी नहीं है। 60 दिनों के लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था को फिर से शुरू करने और पटरी पर लाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। यह सिर्फ किसी प्रोत्साहन के जरिए शुरू नहीं किया जा सकता। हेल्थकेयर व नौकरियों में मीडियम टर्म के विश्वास से आर्थिक पुनरुत्थान के द्वारा इसे वापस लाया जा सकता है। अगर अर्थव्यवस्था को सही से मैनेज किया गया तो ब्याज की दरें कम रहेंगी। इसके लिए समय, धीरज एवं प्रयत्नों की जरूरत होगी।
मांग/उपभोग की वृध्दि दो चीजों पर निर्भर करती है:
1.कैसे लोग अपने घरों से बाहर निकलेंगे, कैसे वह अपनी जिंदगी फिर से शुरु करेंगे, यथार्थ में उसका क्या प्रभाव होगा।
2.जब बिजनेस तैयार होगा, व्यवसायियों को व्यवसाय शुरू करने और उत्पादन एवं सेवा की मांग के लिए पूंजी आसानी से उपलब्ध होगी, तब मांग बढ़ाने के लिए एक किकस्टार्ट की आवश्यकता हो सकती है।


जैसे जिस दिन लॉकडाउन खुला उस दिन से कर्नाटक में ई-कॉमर्स के जरिए टेक अवे खाने के व्यवसाय़ और अल्कोहल बिजनस ने वृद्धि दिखाई है। प्रोत्साहन देने से पहले सरकार को मांग को समझना पड़ेगा। कुछ सेक्टरों में अल्पकालिक डिमांड ग्रोथ नहीं दिखाई देगी। जैसे एयरलाइंस, हॉस्पिटालिटी, रेस्टोरेंट, होटल। जो उपभोक्ता के तेजी से बदलते व्यवहार से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं वह सरकार के प्रोत्साहन देने से बदल नहीं जाएंगे। वैसे अभी तो डिमांड ग्रोथ या डिमांड के गिरने को मापना जल्दबाजी होगी, इसके लिए एक या दो महीने का इंतजार करना होगा कि यह किधर जा रहा है। कुछ श्रेणियां तो तेजी से बढ़ रही हैं, कुछ को प्रोत्साहन की जरूरत है, और कुछ को बढ़ने के लिए सरकारी मदद की भी जरूरत होगी। मुझे विश्वास है कि कुछ समय में जीएसटी काउंसिल उन श्रेणियों को देखेगी जिनमें वृद्धि हो रही है और जिनमें वृद्धि की संभावना है। वह यह भी देखेगी कि इसमें और क्या किया जा सकता है।


राज्य के वित्त का मसला भी सामने है। आरबीआई ने राज्यों के सीमित तरीके और साधनों की सीमा में वृद्धि की है और साथ ही राज्यों की उधार लेने की शक्तियां बढ़ा दी हैं। वास्तव में राज्यों को इस संकट के कारण व्यय सुधार करना पड़ेगा। ऐसे कई राज्य हैं जिनकी अर्थव्यवस्था बहुत लचर है। जीएसटी कलेक्शन बहुत बुरी तरीके से गिरा है इसलिए वित्त मंत्री ने कहा है कि संशोधित जीएसटी के तहत जिन राज्यों को देना बकाया है, उनको भुगतान किया जा चुका है। मार्च में यह बात हुई थी। प्रधानमंत्री ने राज्यों को कहा है कि केंद्र, राज्यों के लिए दो फीसदी अतिरिक्त बॉरोइंग क्षमता देगी। मेरे विचार से, जो सबसे बड़ा सुधार होने वाला है, वह है राज्य की फाइनेंसिंग। इस महामारी ने राज्य सरकारों को सिखा दिया है कि वह कैसे उन गरीबों, विभिन्न व्यवसायों, हेल्थकेयर की लागतों को पूरा करेंगे और अपनी लचर व्यय व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार को कैसे खत्म करेंगे।


अगर अर्थव्यवस्था को सही से संभाल लिया जाएगा तो ब्याज की दरें भी कम हो जाएंगी। जैसे, केरल ने 9% की उच्च ब्याज दर से उधार लिया है। चूंकि राज्यों के लिए लिक्विडिटी कोई समस्या नहीं है, तो उनकी उधार लेने की लागत आदि का निर्धारण उनके वित्तीय प्रदर्शन एवं पारदर्शिता के आधार पर किया जाएगा। नरेंद्र मोदी की सरकार भलीभांति जानती है कि उनकी घोषणाएं एक जारी रहने वाली प्रक्रिया है। उन्हें पता है कि आनेवाले तीन-चार महीने में क्या होने वाला है। अगर कल फिर से महामारी में तेजी से वृद्धि होने लगती है, तो राज्यों को वित्तीय सहायता के लिए सहयोग की आवश्यकता होगी, खासकर हेल्थकेयर के क्षेत्र में।
इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार मांग बढ़ाने और बिजनेस को फिर से शुरू करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास करेगी, क्योंकि इस प्रकार की असामान्यता एक नई सामान्य बात हो गई है। जिस वातावरण में हम रह रहे हैं और जिसमें हम काम कर रहे हैं, उसमें यह वायरस और हेल्थकेयर जोखिम अब नये रूप से एक सामान्य बात है। जब तक इसके लिए कोई टीका या इलाज नहीं बन जाता, हमें स्वयं यह नहीं पता कि भविष्य के गर्त में क्या छिपा है। हम अनिश्चितता के युग में जी रहे हैं, और जब अनिश्चितता है, तो सरकार को बहुत ही बुद्धिमानी से, सावधानीपूर्वक अपने पैसों को खर्च करना होगा। सरकार को एक ही बार में अपनी सारी राजकोषीय क्षमता को खत्म नहीं कर देना चाहिए। जब संपूर्ण दुनिया इस भयावह संकट और अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है, ऐसे में एक राष्ट्र के रूप में अपने इस गनपाउडर को सुखाकर और सही समय पर उसका इस्तेमाल करना एक जिम्मेदारी भरा काम है।


(लेखक बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद हैं, लेख में विचार निजी हैं)

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