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पौराणिक पॉप

टीवी धारावाहिकों और अंग्रेजी पॉप साहित्य की देखादेखी हिंदी के लोकप्रिय साहित्य में पौराणिक पात्रों के इर्दगिर्द किस्सागोई की ओर युवा लेखकों और प्रकाशकों का रुझान बढ़ा
अंग्रेजी में धूम मचने लगी तो हिंदी में भी कई युवा लेखकों और प्रकाशकों की नई पीढ़ी ने पौराणिक और मिथकीय पात्रों की ओर रुख किया

अमूमन ‘जो रुचे, सो बिके’ ही कारगर मंत्र होता है। इसे पलट दें तो यह भी कह सकते हैं कि ‘जो बिके, सो रुचे।’ ‌‌‌डिजिटल दौर में स्मार्टफोन और आइ-फोन वगैरह की दीवानी नई पीढ़ी किताबों से बेरुख हुई तो इसी पीढ़ी या आसपास की पीढ़ी के लेखकों और प्रकाशकों ने नया फंडा ईजाद किया। राम, शिव और अन्य देवी-देवताओं तथा पौराणिक पात्रों के इर्दगिर्द बुनी नई किस्सागोई का बाजार बढ़ने लगा। वैसे, हर दौर के अपने फैशन होते हैं और उसकी सामाजिक-राजनैतिक वजहें भी स्पष्ट होती हैं। लेखन और प्रकाशन की दुनिया में फैशन की फिजा तो मुख्यधारा के साहित्य में भी परवान चढ़ती है लेकिन लोकप्रिय या ‘पॉप’ साहित्य में फैशन अमूमन ऐसे चढ़ता है कि उसका डंका बजने लगता है। पिछले दशक में यह फैशन कुछ अतीतोन्मुखी हुआ और कुछ जादुई एहसास दिलों को छूने लगा तो टीवी धारावाहिकों से लेकर लेखन-प्रकाशन में भी पौराणिक और रामायण-महाभारत के पात्रों के इर्दगिर्द नई किस्सागोई बिकाऊ बन चली। शायद यही एहसास कोरोनावायरस की रोकथाम के घोषित लक्ष्य से लगाए गए लॉकडाउन के शुरुआती दौर में टीवी पर पुराने रामायण और महाभारत धारावाहिकों का प्रसारण फिर करने की भी हो सकती है।

दिलचस्प यह भी है कि हमारे देश में हर फैशन, खासकर प्रकाशन के क्षेत्र में अमूमन अंग्रेजी से उतरता है, इस बार भी वही हुआ। अंग्रेजी में देवदत्त पटनायक, अमीष त्रिपाठी, अश्विन सांघी, आनंद नीलकंठन वगैरह की धूम मचने लगी तो हिंदी में भी कई युवा लेखकों और प्रकाशकों की नई पीढ़ी ने पौराणिक और मिथकीय पात्रों की ओर रुख किया। ‘मिलेनियल’ पीढ़ी को यह रुच रहा है, मानो उसे पश्चिमी सुपरमैन और अन्य तरह के कॉमिक्स का रुचिकर देसी वर्जन मिल गया है। यह कथानक लोकप्रिय संस्कृत साहित्य के अति परिचित नायकों और खलनायकों से बुना जाता है। कह सकते हैं कि यह नया चलन गीता प्रेस और जे.के. रॉलिंग (हैरी पॉटर वाली) का अजीबोगरीब मिश्रण है। 

हालांकि हिंदी और भारतीय भाषाओं के मुख्यधारा और लोकप्रिय साहित्य में पौराणिक, ऐतिहासिक और मिथकीय पात्रों को लेकर अकूत साहित्य भरा पड़ा है। गीता प्रेस, गोरखपुर ने तो बेहद सस्ते प्रकाशनों से वेद, पुराण, रामायण, महाभारत से लेकर तमाम पौराणिक साहित्य खासकर उत्तर भारत के हर घर में वर्षों से पहुंचाता रहा है। आधुनिक दौर में हिंदी में मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय से लेकर अनेक नामवर साहित्यकारों ने कई पौराणिक चरित्रों की नए सिरे से व्याख्या की है। हम सब उर्वशी, उर्मिला, यशोधरा की व्यथाएं, कर्ण की नई व्याख्या के कवित्त से परिचित हैं। यह फेहरिस्त काफी लंबी हो सकती है और मौजूदा दौर की कविताओं, कई उपन्यासों में भी उसकी गूंज सुनाई पड़ती है। इसी तरह मराठी, बांग्ला, ओडिया, असमी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलायम में भी प्रचुर साहित्य निरंतर लिखा जाता रहा है, जिसका कुछ अनुवाद हिंदी में भी हुआ है। मराठी में विष्णु सखाराम खांडेकर का ययाति, शिवाजी सावंत का मृत्युंजय और हाल में हिंदू जैसा रोचक उपन्यास हिंदी पाठकों को भी उपलब्ध है।

लेकिन लोकप्रिय या ‘पॉप’ साहित्य के नए लेखकों का पौराणिक और मिथकीय पात्रों के इर्दगिर्द कुछ जादुई अंदाज में कथा बुनने का रुझान अंग्रेजी से शुरू हुआ। अमीष त्रिपाठी की शिव त्रयी, देवदत्त पटनायक की द प्रेग्नेंट किंग और अशोक बैंकर की रामायण सीरीज बाजार में तहलका मचाने लगी। बाजार की तलाश में प्रकाशकों की नई पीढ़ी को फौरन इसमें संभावना दिखी और ये किताबें हिंदी पाठकों तक भी पहुंचीं। फिर तो हिंदी के कुछ अपने लेखक भी नमूदार हुए।

दरअसल देवदत्त पटनायक आउटलुक से बातचीत में कहते भी हैं, ‘‘मुझे लगता है कि शुरुआत हैरी पॉटर की लोकप्रियत से हुई है। हैरी पॉटर जब लोकप्रिय हो गया, उस पर फिल्में भी आने लगीं तो लोगों की रुचि लोककथाओं और दंतकथाओं, आख्यानों में बढ़ने लगी। यह सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हो रहा है। मैं यही मानता हूं कि दंतकथाओं की वापसी हुई तो पौराणिक चरित्रों में नई दिलचस्पी भी बढ़ी है’’ (देखें इंटरव्यू)। शिव त्रयी से चर्चित हुए अमीष त्रिपाठी के मुताबिक, भारत के लोग अपने देवी-देवताओं की कहानियों से कभी ऊबते नहीं हैं। वे आउटलुक से कहते हैं, ‘‘वे बार-बार नए ढंग से कही गई कहानियों में रस लेते हैं। उनका मन कभी उचटता नहीं।’’ हालांकि इसका एक सूत्र बाजार से भी जुड़ता है। देवदत्त की सबसे ताजा किताब कैसे बनें धनवान भी आ गई है। इसी वजह से ऐसे लेखन में कुछ विवाद और सुर्खियों के तत्व भी तलाशे जाते हैं। मसलन, अमीष त्रिपाठी की शिव त्रयी कुछ विवादों के लिए चर्चित हुई। वे कहते भी हैं, ‘‘मैं मानता हूं कि ज्यादातर कन्ट्रोवर्सी लोग खुद फैलाते हैं। इससे किताबों की मार्केटिंग हो जाती है। यह मार्केटिंग स्ट्रेटेजी है।’’ उनकी शिकायत यह भी है कि हिंदी के प्रकाशकों की मार्केटिंग स्ट्रेटजी सही नहीं है।

बेशक, यह मार्केटिंग स्ट्रेटजी भी अपना कमाल दिखा रही होगी। हिंदी के कुछ युवा लेखकों ने भी कई विवादास्पद, विरोधाभासी, उपेक्षित पौराणिक पात्रों की किस्सागोई पर कलम चलाई है। ये पात्र पुराण, उपनिषद, महागाथाओं से निकलते हैं और आज के दौर की लोकप्रिय बहसों के सूत्रों में पिरोए जाते हैं। लेकिन आलोचक विवादास्पद और रोचक किस्सागोई को ही इसकी कामयाबी का स्रोत मानते हैं। उन्हें ऐसी किस्सागोई में पुराणों की कथा-वस्तु में फेरबदल पर आपत्ति है। एक उपेक्षित मिथकीय पात्र शर्मिष्ठा को लेकर इसी नाम से उपन्यास लिखने वाली युवा लेखिका अणुशक्ति इससे सहमत नहीं हैं। वे कहती हैं, ‘‘पौराणिक कथाओं की अपनी शैली होती है। उसमें अमूमन स्त्रियां गौण होती हैं। इसलिए मैंने शर्मिष्ठा की कहानी कही, जैसे उसकी कहानी कही जानी चाहिए थी।’’ यह भी दिलचस्प है और आज के दौर के सियासी माहौल से मिलता-जुलता है कि महाभारत और रामायण के पात्र और कथाएं ही नए लेखकों को सबसे ज्यादा लुभाती हैं। आशुतोष नाड़कर ने महाभारत से शकुनि को विषय बनाया है। दरअसल माधवी, द्रोपदी, कर्ण, सत्यवती, कुंती, गांधारी, भीष्म, अश्वत्थामा, रावण, शकुनि पात्रों में बहुत-कुछ कहने की गुंजाइश है और लोगों की दिलचस्पी भी खासी है।

 

इस नए ढंग के लेखन पर प्रकाशकों में खासी दिलचस्पी है। वाणी प्रकाशन में नई पीढ़ी की अदिति माहेश्वरी कहती हैं, ‘‘मिथकीय या पौराणिक चरित्र पर किताब प्रकाशित करना बड़ी जिम्मेदारी होती है।’’ रेड ग्रेब बुक्स के वीनस केसरवानी के पास इस तरह के पात्रों पर लिखी किताबें सबसे ज्यादा हैं।  उन्होंने 2014 में सीता के जाने के बाद राम नाम की किताब से इस यात्रा की शुरुआत की थी और अब ज्यादातर किताबें मिथकीय या पौराणिक पात्रों पर ही हैं। वीनस कहते हैं, ‘‘हमने पुस्तक मेला और सोशल मीडिया से पाठकों तक पहुंच बनाई। हमारे लिए ज्यादातर नए लेखक ही इन विषयों पर किताबें लिखते हैं और युवा वर्ग ही इन किताबों को पढ़ता है।’’ हालांकि वे मानते हैं कि पाठको का वर्ग तैयार करने में शुरुआती दिनों में उन्हें दिक्कत हुई थी, लेकिन अब ऐसी किताबों की बिक्री बढ़ गई है।

खासकर मोबाइल और स्मार्टफोन युग की नई पीढ़ी में ये किताबें नई दिलचस्पी ठीक उसी तरह जगा रही हैं, जैसे इस मिलेनियम के शुरुआती वर्षों में चेतन भगत, शिवेंद्र सिंह जैसे ‘पॉप’ लेखकों ने जगाई थी। कक्षा बारहवीं में पढ़ने वाले अक्षत शर्मा कहते हैं, ‘‘रावण पर लिखी किताब मुझे बहुत प्रिय है। इससे मैंने रावण के कई पहलूओं को जाना और फिर शकुनि भी पढ़ी। हम जिन्हें डार्क कैरेक्टर समझते हैं, दरअसल उनके पीछे की कहानी मुझे बहुत अच्छी लगती है।’’ प्रकाशक पेंगुइन (भारतीय भाषा) की वैशाली माथुर कहती हैं, ‘‘युवा इसके जरिए अपनी जड़ों और आधुनिक स्थितियों में पात्रों की बेहतर समझ हासिल कर पा रहे हैं। मिथकीय साहित्य को पढ़ने की उनकी रुचि इतिहास और राजनीति को जानने के लिहाज से पैदा हुई है।’’

गौरतलब है कि बिक्री के आंकडों में उछाल के बिना यह रुझान परवान नहीं चढ़ता। रूपा पब्लिकेशंस के कपिश मेहरा स्वीकार करते हैं कि बिक्री के लिहाज से इन किताबों की सफलता अच्छी है। वे कहते हैं, ‘‘हमने पौराणिक पात्रों पर कई किताबें छापी हैं। इनकी कामयाबी हर माध्यम में दिख रही है। टीवी में ही देखिए, ऐसे कितने धारावाहिक चल रहे हैं।’’  

एक वक्त युवाओं की यह दिलचस्पी कॉमिक बुक्स, अमर चित्र कथा और चंदामामा जैसे प्रकाशनों से पूरी होती थी। लेकिन इनका प्रकाशन सीमित हो गया, टीवी के परदे ने कॉमिक्स पर अपना कब्जा जमा लिया। इसलिए ये किताबें युवाओं में नई दिलचस्पी जगा रही हैं। रावण लिखने वाले शैलेन्द्र तिवारी का मानना है, ‘‘महाकाव्य की जमीन बहुत विस्तृत है। कई तरह की बारीकियां हैं जो लेखकों को कहानी बुनने में मददगार होती हैं।’’ विवेक कुमार की अर्थला पुराण की जमीन पर है लेकिन फिर भी वह पुराण के बाहर की कहानी है। वे कहते हैं, ‘‘कोई भी मिथक अपनी सभ्यता के प्रारूप के संकेत बिंदु होते हैं।’’ अश्वत्थामा और इंद्र लिखने वाले आशुतोष गर्ग कहते हैं, ‘‘जब आप किसी रोचक घटना का वर्णन करते हैं तो अनजाने ही उससे जुड़ते चले जाते हैं। उस पात्र के सहारे आप खुद की भावनाओं पर प्रकाश डालते हैं।’’

मंजुल प्रकाशन के कपिल सिंह कहते हैं, “हमने जब नीलकंठ छापी तो इसका बहुत अच्छा रेस्पॉन्स रहा। हमें इंद्र पर लिखी किताब पर भी अच्छ रेस्पॉन्स मिला। यही वजह है कि हम इन्हें ई-बुक फॉर्मेट में भी लाए। मूल हिंदी में लिखी इंद्र का दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी में भी अनुवाद हो रहा है।’’ प्रकाशक मानते हैं कि हिंदी में किताबों की वैसी मार्केटिंग नहीं होती, जैसी अंग्रेजी में होती है।

अंग्रेजी में न सिर्फ मार्केटिंग होती है, बल्कि इस दौर में अंग्रेजी पाठक वर्ग में नई दिलचस्पी भी पैदा हुई है। इसलिए लेखक भी खूब आ रहे हैं। देवदत्त पटनायक, अमीष त्रिपाठी, अश्विन सांघी, आनंद नीलकंठन के साथ नई पीढ़ी भी कदमताल कर रही है। आनंद नीलकंठन वही हैं, जिनकी किताब पर बाहुबली का पहला भाग आधारित था। अमेरिका वासी रोशनी चौकसी बहुत कम उम्र में ही लिखना शुरू कर चुकी थीं। पांडव श्रृंखला पर उनकी किताब से उन्हें बहुत शोहरत मिली। अनुजा चंद्रमौली की द गॉड ऑफ डिजायर ऐंड शक्ति: द डिवाइन फेमेनिन और गंगा: द कॉन्सटेंट गॉडेसेस के अलावा अर्जुन: सागा ऑफ ए पांडव वॉरियर प्रिंस अर्जुन के अलग पक्ष को सामने लाती है। इरावरती कर्वे के युगांत, कृष्णा उदयशंकर की त्रयी गोविंदा, कौरव और कुरुक्षेत्र के अलावा कृतिका नायर की किताब अंटिल द लॉयंस: इकोज फ्रॉम महाभारत और कविता काणे की कर्णन्स वाइफ: द आउटकास्ट क्वीन की भी खूब चर्चा रही।

मिथकीय और पौराणिक पात्रों की लोकप्रियता का ग्राफ सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी तक ही सीमित नहीं है। ऐसा ही रुझान दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में भी बढ़ा है। अलबत्ता, क्षेत्रीय भाषाओं में अपने नए लेखकों का अभी टोटा है। अमीष की 2011 की किताब इममॉर्टल मेलुहा का कन्नड़ में अनुवाद करने वाले मैसूर स्थित लेखक एस. उमेश का करीब दशक भर बाद कहना है, “अगर आप पौराणिक कथाओं को नए संदर्भों में पेश करेंगे तो युवाओं में उसका बाजार अच्छा है।”

धारवाड़ स्थित मनोहर ग्रंथ माला के समीर जोशी भी कहते हैं कि देवदत्त पटनायक की कुछ साल पहले जय और इस साल जून में सीता के कन्नड़ अनुवाद की बिक्री अच्छी हुई। आनंद नीलकंठन के असुर और राइज ऑफ शिवगामी के कन्नड़ अनुवादों की बिक्री भी अच्छी हुई। लेकिन एक समस्या है। अंकिता पुस्तक के प्रकाश कंबठहाली कहते हैं, “कन्नड़ में ऐसे मूल लेखक नहीं के बराबर हैं। बाजार तो है मगर बहुतों को शायद इसके बारे में जानकारी नहीं है।”

यह भी सही है कि कन्नड़ में पौराणिक पात्रों के साहित्य की कभी कमी नहीं रही है। मसलन एस.एल. भैरप्पा महाभारत पर आधारित पर्व (1979), ए.आर. कृष्णाशास्त्री  का वंचना भारता, कुवेम्पु का रामायण दर्शनम वगैरह। इसके अलावा आधुनिक दौर के शिवराम कारंथ, यू.आर. अनंतमूर्ति, लंकेश जैसे अनेक नामवर लेखकों के महत्वपूर्ण काम हैं।

इसी तरह तमिलनाडु में भी अमीष और देवदत्त के तमिल अनुवाद अब बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। हालांकि चेन्नै में किताबों की सबसे बड़ी दुकान ओडिशी के मालिक अश्विन का कहना है कि अंग्रेजी की मूल किताबें ही ज्यादा बिकती हैं, तमिल अनुवाद के ग्राहक थोड़े ही हैं। तमिलनाडु में बड़े प्रकाशन समूह में एक एलायंस पब्लिकेशंस के मालिक श्रीनिवासन कहते हैं कि राजाजी और चो रामस्वामी के महाभारत और रामायण ही पौराणिक साहित्य में सबसे अधिक बिकते हैं। वे कहते हैं, दिसंबर-जनवरी में सालाना पुस्तक मेले में भी उन्हीं की किताबें बिकीं। 60 के दशक में कि.वा. जगन्नाथन और पी. श्री जैसे लेखकों के निधन के बाद उस कोटि के लेखक नहीं उभरे।

इसी तरह ओडिया में पौराणिक कथा-वस्तु पर लिखी किताबों का टोटा नहीं है। सबसे चर्चित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखिका प्रतिभा राय यज्ञसेनी, रमाकांत रथ की श्रीराधा और हरिप्रसाद दास की बंशा 70 और 80 के दशक की हैं। रामचंद्र बेहरा की गोपापुरा, प्रदीप दास की चारु चिबरा चरज्ञ और अर्चन नायक की रानी श्यामबती भी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। लेकिन 2016 में अंबा से चर्चित लक्ष्मीप्रिया आचार्य इस रुझान को नया कहने से सहमत नहीं हैं, "रामायण और महाभारत 5000 साल पुराने हैं। उनसे हर दौर में लेखकों को प्रेरणा मिलती है।" ओडिया में इसका चलन भी नहीं है।

हिंदी में मुख्यधारा के अलावा लोकप्रिय साहित्य में नरेन्द्र कोहली के राम और दूसरे पौराणिक पात्रों की कहानियां भी खूब पढ़ी गईं। एक वक्त बेहद सस्ती गीता प्रेस, गोरखपुर की किताबें और पत्रिका कल्याण हर घर की शोभा हुआ करती थीं, लेकिन वह दौर सिमटता गया है तो नए युवाओं के लिए ये नए तरह का साहित्य कुछ उसकी भरपाई कर रहा है। दूसरी वजह टीवी, मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में खासकर हिंदी प्रकाशकों की सिकुड़ती दुनिया भी नए बाजार की तलाश के लिए बाध्य कर रही है। ज्यादातर प्रकाशक अपनी किताबों की खरीद के लिए सरकारी और कॉलेज-विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियों पर आश्रित हो गए थे और खुली बिक्री के लिए किताबें बहुत ही कम छपने लगी थीं। सरकार तथा सत्ता प्रतिष्ठान का रुख बदला तो संभव है, उन्हें अपने प्रकाशनों का रंग-ढंग भी बदलना पड़ा हो। लेकिन क्या यह दौर भी गुजर जाएगा? एका (वेस्टलैंड) की मीनाक्षी ठाकुर कहती हैं, हमारे पौराणिक साहित्य में युद्घ, प्रेम, षड्यंत्र, जासूसी, बहुविवाह, राक्षसी कारनामों और जितने ही तरह के जादुई असर की आप कल्पना कर सकते हैं, सब कुछ है। जाहिर है, 'मिलेनियल' पीढ़ी की दिलचस्पी के लिए बहुत कुछ है।

गीता प्रेस का गुजरा जमाना

गोरखपुर में गीता प्रेस का द्वार

आजादी के दौरान 1923 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में शुरू हुए गीता प्रेस महात्मा गांधी की प्रेरणा से राष्ट्र और अपनी संस्‍कृति के प्रति लोगों में अलख जगाने के महती कार्य में जुटा तो उत्तर भारत और हिंदी पट्टी के लोगों के घरों की देहरी उसकी किताबों और कल्याण पत्रिका से सजती गई। गांधी ने इसके संस्‍थापकों हनुमान प्रसाद पोद्दार और जय दयाल गोयंदका के सामने शर्त रखी थी कि दाम इतने सस्ते हों कि एकदम नीचले पायदान का आदमी खरीद सके और कोई विज्ञापन न छापा जाए। यही गीता प्रेस की आज भी कसौटी है। वरना आज भी 5 रुपये में किताबें आप कहां पाएंगे।

लेकिन इससे यह न जानिए कि बिक्री के आंकड़े कोई थोड़े हैं। तुलसीदास के रामचरितमानस की ही सालाना बिक्री तकरीबन 200 करोड़ रुपये की रही है। गीता प्रेस से छपी रामायण, महाभारत देश ही नहीं, दुनिया भर में भारतवंशियों के लिए कम से कम एक पीढ़ी पहले तक अनिवार्य सी रही हैं। उसकी 1926 में शुरू हुई पत्रिका कल्याण के ग्राहकों की संख्या भी लाखों में रही है। अब भी उसका सर्कुलेशन दो लाख के करीब बताया जाता है। बेशक, गीता प्रेस के प्रकाशन लागत से आधे या 90 फीसदी कम पर बेचे जाते हैं और यह गांधी की शर्त के मुताबिक सरकारी मदद भी नहीं लेता, लेकिन किताबों के बिकने की वजह तो उसका मिशन ही रहा है, जो लोगों में आस्‍था जगाता रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय से नई पीढ़ी की दिलचस्पी घटने से गीता प्रेस में संकट की खबरें भी आईं। संभव है, मूल शास्‍त्रों-ग्रंथों में घटती दिलचस्पी का ही यह नतीजा हो। इसी की वजह से नए पौराणिक 'पॉप' साहित्य का रुझान भी परवान चढ़ा हो सकता है।

गीता प्रेस हिंदी के अलावा 15 भाषओं में किताबें प्रकाशित करता है। अंग्रेजी में पत्रिका का नाम कल्याण-कल्पतरु है। इसका सर्कुलेशन भी करीब एक लाख है। गीता प्रेस पर पुस्तक लिखने वाले पत्रकार और शोधार्थी अक्षय मुकुल कहते हैं कि संस्था हर वक्त नए तरीकों से भी परहेज नहीं करती। संस्था की वेबसाइट से ऑनलाइन किताबें मंगवाई जा सकती हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या नई पीढ़ी इससे आकर्षित होगी या 'पॉप' में ही रमी रहेगी।

लेखकों की राय

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साथ में चेन्नै से जी.सी. शेखर, भुवनेश्वर से संदीप साहू और बेंगलूरू से अजय सुकुमारन

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