जदयू में कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

पटना से गंगेश मिश्र
खेमेबंदीः जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर (बाएं), मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, और (दाएं से दूसरे) आरसीपी सिंह
खेमेबंदीः जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर (बाएं), मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, और (दाएं से दूसरे) आरसीपी सिंह
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पटना से गंगेश मिश्र
जंग नीतीश का उत्तराधिकारी बनने की, बढ़ रही खटास एनडीए में, मुमकिन है अगला विधानसभा चुनाव जदयू अकेले लड़े

बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसके घटक दलों में रोजाना दोतरफा तरीके से खटास बढ़ रही है, बाहरी स्तर पर एक-दूसरे के साथ शक्ति प्रदर्शन में, तो खुद घटक दलों के अंदर। इसलिए कि बिहार में एनडीए के दो सबसे मजबूत घटक दलों- भाजपा और जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व ही नहीं है। इसकी तीसरी पार्टी- लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा)-इस मायने में थोड़ा भाग्यशाली है कि परिवारवाद से ही सही, लेकिन रामविलास पासवान के बाद नेतृत्व के लिए चिराग हैं। इसके उलट बिहार भाजपा में जहां ज्यादा जोगी मठ उजाड़ चल रहा है, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में पहले से दसवें नंबर तक वे खुद हैं। बिहार एनडीए में चल रही खींचतान की पृष्ठभूमि मूल रूप से यही है।

नीतीश कुमार (68 वर्ष) की उम्र काफी हो गई है और मुख्यमंत्री के नाते 2020 का चुनाव उनके लिए आखिरी भी हो सकता है। इस बार चुनाव का नेतृत्व करने के बाद वे अपनी भूमिका सीमित करने के मूड में हैं। उसके बाद पार्टी कौन संभालेगा? इस समय दौड़ में नीतीश के पुराने सहयोगी आरसीपी सिंह और ललन सिंह के अलावा प्रशांत किशोर सबसे आगे माने जा रहे हैं। पर दिक्कत यह है कि इन तीनों क्या, चौथे-पांचवें नंबर तक के नेताओं में किसी का जनाधार नहीं है। इसके लिए नीतीश कुमार की कार्यशैली भी जिम्मेदार है। सो, जदयू में ड्रॉइंग रूम पॉलिटिक्स जोरों पर है। इसमें नए खिलाड़ी के तौर पर इंट्री ली है संजय कुमार झा ने। विधान परिषद के सदस्य और कम बोलने वाले झा पिछले दिनों जल संसाधन मंत्री बनाए गए हैं और नीतीश के पदचिह्नों पर चल रहे हैं।

भावी नेतृत्व की दौड़ में शामिल नेताओं को यकीन है कि अगले साल नीतीश जीत भी जाते हैं, तो उत्तराधिकारी चुनने का फैसला वे नहीं टाल सकते। उत्तराधिकारी का सपना मुख्यमंत्री के पुराने सहयोगी आरसीपी सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का खेमा दोनों समान रूप से देख रहा है। तीसरे, ललन सिंह पहले आरसीपी विरोधी माने जाते थे, लेकिन प्रशांत किशोर के बढ़ते कद और आक्रामक रणनीति को देख वे उनके समर्थक हो गए हैं। वैसे भी इन दोनों नेताओं को लगता है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली वर्तमान केंद्र सरकार में जदयू की ओर से मंत्री नहीं बनने देने के पीछे का खेल प्रशांत किशोर खेमे का ही है। इसीलिए पार्टी के वरिष्ठ नेता आरसीपी सिंह और ललन सिंह उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। दरअसल, इस बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में जब अंत में जदयू से दो सांसदों को शामिल करने पर भाजपा तैयार हो गई थी, तब यही प्रतिद्वंद्विता सामने आ गई थी। जदयू को एक कैबिनेट और एक राज्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव मिला था। अमित शाह जदयू से आरसीपी सिंह को कैबिनेट और ललन सिंह को राज्यमंत्री बनाने के पक्षधर थे। इसी बीच प्रशांत किशोर खेमे से नीतीश कुमार को एकतरफा सूचना दे दी गई कि राज्यमंत्री के प्रस्ताव से ललन सिंह नाराज हो गए हैं। दोनों ही केंद्रीय मंत्री बनते-बनते रह गए। हो गया एक तीर से दो शिकार।

यही कारण है कि कल जो शिकार हुए, वे आज शिकारी की भूमिका में आ गए हैं। दोनों ओर से शह-मात का खेल चरम पर है। इसका पहला संकेत तत्काल तीन तलाक बिल पर पार्टी के बदलते रुख से मिला। प्रशांत किशोर खेमे की सलाह पर जदयू ने पहले इसका विरोध किया, लेकिन संसद से पारित होने के बाद रुख पलटने वाला बयान आरसीपी सिंह की ओर से आया।

प्रतिद्वंद्वी गुट की काट में प्रशांत किशोर खेमे के हाथ आ गया झारखंड चुनाव का हथियार। वहां विधानसभा का चुनाव भाजपा से अलग होकर लड़ने का तत्काल ऐलान करा दिया। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, खुद नीतीश कुमार ऐसा नहीं चाहते थे। सवाल उठता है कि फिर क्यों ऐसा किया, तो उसकी वजह यह है कि जदयू को भाजपा की छाया से निकालकर राष्ट्रीय फलक पर ले जाने की नीतीश कुमार की अभिलाषा पुरानी है। उन्हें लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा, तृणमूल और टीडीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के हश्र को देखते हुए फिर से इस पर गंभीरता से काम करने की जरूरत समझा दी गई। विपक्षी दलों के इस तरह हाशिए पर चले जाने से उन्हें भी राष्ट्रीय स्तर पर जदयू के लिए नई संभावनाएं दिखने लगी हैं।

यह खेमा नीतीश को समझाने में सफल रहा कि झारखंड के जरिए जदयू को क्षेत्रीय से राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसके लिए पार्टी झारखंड में साढ़े चार प्रतिशत वोट पाने या कम से कम छह विधायक जिताने की कोशिश करे, ताकि आने वाले समय में जदयू को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने में मदद मिले। अरुणाचल में पार्टी के पास चार विधायक हैं। अब अन्य राज्यों में दायरा बढ़ाना ही होगा। इसी रणनीति के तहत नीतीश ने झारखंड में जदयू के सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया। लेकिन चुनाव आयोग ने रंग में भंग कर डाला। उसने राज्य में पहले से ही मौजूद समान चुनाव चिह्न के आधार पर जदयू को नए चुनाव चिह्न पर लड़ने का आदेश दिया। यानी पार्टी झारखंड में कितनी भी सीटें जीत ले, जदयू के खाते में दर्ज नहीं होगी।

इससे ठंडी पड़ गई टीम प्रशांत ने तोप का मुंह वापस बिहार की ओर मोड़ लिया। चुनाव से पहले झारखंड में पराजित हो जाने के गम को बिहार भाजपा के खिलाफ दम में तब्दील करने की कोशिश हो रही है। सवाल है कि ऐसी तलवारबाजी के बाद भी क्या गठबंधन कायम रह सकेगा। नहीं रहेगा। गठबंधन से अलग होने की बात होने लगी है। टीम प्रशांत यह पता लगाने में जुट गई है कि पार्टी विधानसभा में कम से कम 120 से 150 तक सीट जीत सकती है या नहीं। इसके आसपास सीटें आ जाने पर नीतीश कुमार के दोनों हाथों में लड्डू होगा। फिर उनकी मर्जी होगी कि वे राजद के साथ दोबारा जाएं या भाजपा को छोटे भाई की भूमिका में रखें। राज्य में अपने बूते सरकार बनाना इन तीनों में से किसी के लिए अभी मुमकिन नहीं है। 

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में जदयू के अकेले मैदान में जाने का सबसे बड़ा कारण होगा टिकट का बंटवारा। लोजपा कम से कम 40 मांगेगी ही। 243 में से लोजपा के लिए 40 निकाल दें तो बचती हैं 203 सीटें। 2019 के लोकसभा चुनाव वाला 50-50 प्रतिशत सीटों का ही फार्मूला लागू हुआ तो जदयू के हिस्से सौ के आसपास सीटें आएंगी। अब अगर लोजपा के सामने भाजपा और जदयू में से एक को चुनना होगा तो पासवान फिर भाजपा को प्राथमिकता देंगे। ऐसे में 75-80 सीटें भी मिल जाएं तो बहुत है। इससे होगा नुकसान। यही बात समझाने में प्रशांत किशोर सफल हैं। यही कारण है कि 2020 का विधानसभा चुनाव जदयू अकेले लड़ेगी। बहुत होगा तो कांग्रेस को साथ मिला लिया जाएगा।

यूं ही नहीं है बिहारी बहुल राज्यों में सक्रियता

राष्ट्रीय फलक पर जदयू को ले जाने की बात के पीछे टीम प्रशांत का लंबा खेल है। इसे इससे समझा जा सकता है कि सबके मना करने के बावजूद प्रशांत किशोर ने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के साथ काम करने का फैसला किया। महाराष्ट्र में शिवसेना और तमिलनाडु में कमल हासन के साथ प्रशांत की कंपनी पहले से काम कर रही है। पार्टी के अंदर जब इस पर सवाल उठाया जाता है तो कह दिया जाता है कि राजनीति और व्यवसाय अलग-अलग है। दूसरे दलों के साथ प्रशांत किशोर नहीं, बल्कि उनकी कंपनी अपना कारोबार कर रही है। लेकिन दोनों एक सिक्के के ही पहलू हैं। इतना ही नहीं, टीम प्रशांत जिन राज्यों में काम कर रही है वहां बिहार के मतदाताओं की संख्या काफी है। उन राज्यों में अन्य पार्टियों के साथ काम करके जो अनुभव हासिल हो रहा है, उसका लाभ विस्तार के समय जदयू के काम आएगा। यानी जहां-जहां टीम प्रशांत कदम रखेगी, वहां-वहां जदयू की पहुंच भी होगी। इसलिए यह भी तय मानिए कि झारखंड के बाद जदयू देर-सबेर इन राज्यों में भी अपने बलबूते ही चुनाव लड़ेगी। हालांकि अन्य राज्यों में वह भाजपा से अलग होकर पहले भी लड़ती रही है, लेकिन संकेत के तौर पर ही। अब लड़ाई ज्यादा दिलचस्प होगी।

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