मौलिक शैली में विडंबनाओं की कथा

वास्को डी गामा की साइकिल
वास्को डी गामा की साइकिल

अगर किसी लेखक का पहला कहानी संग्रह ‘हिट’ हो जाए, तो जाहिर सी बात है, पाठकों की उससे अपेक्षा बढ़ती है और यही अपेक्षा लेखक की चुनौती को बढ़ाती है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं कि प्रवीण कुमार अपनी कहानियों में अलग शिल्प, कहन-कथन को लाने से जरा नहीं घबराते। उनका नया संग्रह वास्को डी गामा की साइकिल इस बात की तसदीक करता है। सात कहानियों वाले इस संग्रह में वे हर कहानी और उसके कहने के अलग ढंग को सामने रखते हैं।  

पिछले दिनों उनकी बहुत चर्चित हुई कहानी, ‘बसई-दारापुर की संतानें’ इस संग्रह में है और यह इस संग्रह की सबसे मजबूत कहानी है। इस कहानी को पढ़ते हुए उस देहाती बूढ़े के चश्मे का होना जरूरी है, क्योंकि उसी के चश्मे में वह नजर है, जो बढ़ती हुई दिल्ली और घटते हुए गांव को देख सकती है। एक बूढ़ा, जो हर हाल में अपनी जमीन की रक्षा करना चाहता है। लेकिन उस बूढ़े नायक के साथ-साथ यह कहानी नई पीढ़ी के उन बच्चों की भी कहानी है, जो आज के रंग में ढल गए हैं। यह कहानी बूढ़े के संघर्ष, जमीन बेचने के लिए उसे मनाने या कहें दबाव की कहानी है, जो बहुत दिलचस्प ढंग से चलती है। थोड़े से दबाव में टूट जाने वाली नई पीढ़ी के लिए वह बूढ़ा वाकई प्रेरणादायी हो सकता है, जो तमाम दबावों के बाद भी खड़ा रहता है।

इसके बाद शीर्षक कहानी, ‘वास्को डी गामा की साइकिल’ का नाम लिया जाना चाहिए। वैसे प्रवीण चाहते तो, ‘बसई-दारापुर की संतानें’ को भी शीर्षक बना सकते थे। लेकिन, ‘वास्को डी गामा की साइकिल’ दिलचस्प शीर्षक है। गांव से दिल्ली आए मजदूर की कहानी कहते हुए, प्रवीण कहीं भी भावनाओं में नहीं बहे, यही बात इस कहानी की मजबूती है। अकसर मजदूरों की कथा कहते हुए लेखक कब नायक बन जाता है, खुद लेखक को पता नहीं चल पाता। यह भी अच्छी बात है, कि इस कहानी में वह जरूरत भर की राजनीति लाए हैं। वरना इसके पूरी तरह राजनैतिक या आंदोलन की कहानी बनते देर नहीं लगती। इस कहानी का नायक अपनी साइकिल छोड़ता है, राजनीति को करीब से जानता है, लेकिन अंत में जब वह अपने लोगों के साथ खड़ा दिखता है, तो आशा जागती है कि राजनीति समाज को इतनी आसानी से नहीं बांट पाएगी, जितनी आशंका हर मन में है।

किताब पर लिखा गया है, ‘लोककथा, मिथक और फैंटेसी को फेंटकर विकसित हुई कथा-शैली।’ लेकिन इस कथा शैली, जिसमें लोककथा और फैंटेसी मिली हो उसके दर्शन, ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता था’ नाम की कहानी में ही होते हैं। इस कहानी में फैंटेसी और लोक का मिश्रण मिलता है। ऐसी कहानियों में सुविधा यह होती है, कि लेखक अपने ढंग से ‘लिबर्टी’ ले सकता है। इससे कुछ घटनाएं कहना आसान हो जाती हैं और कथा का करारापन भी कहीं गुमता नहीं है।

वास्को डी गामा की साइकिल

प्रवीण कुमार

प्रकाशक | राजपाल प्रकाशन

पृष्ठः 175 | मूल्यः 250 रुपये

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