कांग्रेस की नई डगर की रणनीति

लखनऊ से कुमार भवेश चंद्र
सधी चाल की दरकारः अगले चुनाव में कांग्रेस को प्रियंका का उपयोग संभलकर करना होगा
सधी चाल की दरकारः अगले चुनाव में कांग्रेस को प्रियंका का उपयोग संभलकर करना होगा

लखनऊ से कुमार भवेश चंद्र
कांग्रेस में जान फूंकने की तैयारी मगर पुरानों की उपेक्षा और बाहर से आने वालों की बढ़ती धमक पार्टी के लिए बड़ी चुनौती

देशव्यापी लॉकडाउन के दूसरे ही दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखकर प्रियंका गांधी ने सरकार से संवादहीनता तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने लिखा कि प्रदेश में कोरोना जैसी भीषण आपदा में लोगों की मदद के लिए जिला स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की टीम प्रशासन के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। कांग्रेस का यह रुख नया है। उत्तर प्रदेश में लगभग बेअसर हो चुकी कांग्रेस की इस सियासी लाइन को ‘मास्टर स्ट्रोक’ तो नहीं लेकिन संजीवनी की तलाश की तरह देखा जा रहा है। जाहिर है, कांग्रेस महासचिव उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी को मजबूत करने की नई राह तलाश रही हैं।

2017 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस केवल सात सीटों पर अपने उम्मीदवार जिता पाई थी। लेकिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने अतीत की नाकामियों को भुलाकर प्रियंका गांधी की अगुआई में 2022 के लिए बड़े ख्वाब बुनने शुरू कर दिए हैं। यूपी कांग्रेस के ट्विटर एकाउंट में सोनिया, राहुल और प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू की तसवीर के साथ प्रियंका की बड़ी तसवीर लगी है और लिखा है ‘22 की च्वाइस’ जिसकी टैगलाइन है 'यूपी की है ललकार, बदलेंगे सरकार।'

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कहते हैं, “हम जानते हैं कि यह लड़ाई बड़ी है, हमारी चुनौतियां बड़ी हैं। लेकिन हम इस लड़ाई के लिए मजबूत तैयारी में जुटे हैं। हम अपने संगठन को पुनर्जीवित करने पर तेजी से काम कर रहे हैं। बहुत जल्द वोटरों से भी नया रिश्ता कायम करने की दिशा में कदम बढ़ाएंगे।”

लेकिन सच्चाई यही है कि कांग्रेस के लिए जमीन पर कड़ा संघर्ष है और बड़ा इम्तहान है। 1989 के बाद से लगातार कमजोर हो रही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या है नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास की बड़ी खाई। संगठन में मौजूदा फेरबदल से असहज हुए पुराने कार्यकर्ताओं का विश्वास हासिल करना प्रदेश अध्यक्ष की सबसे बड़ी चुनौती है। लल्लू पहले अध्यक्ष हैं जिन्हें पद सौंपने के बाद नाराज कांग्रेसियों को पार्टी से बाहर निकाला गया या उन्हें दरकिनार किया गया। इससे पहले के अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी और राज बब्बर को ऐसी परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। पार्टी कार्यकर्ताओं में नए बदलाव को लेकर कई तरह की शंकाएं एक साथ उठ खड़ी हुई हैं।

 

नई ब्रिगेड बढ़ा रही शंका

बात सिर्फ इतनी नहीं है कि कुछ पुराने कांग्रेसियों को दरकिनार कर अजय कुमार को संगठन की बागडोर सौंपी गई है, कार्यकर्ता इस बात से भी सशंकित हैं कि प्रियंका के साथ जुड़े जेएनयू बैंकग्राउंड के नेताओं संदीप पांडेय, मोहित पांडेय की पार्टी में दखल लगातार बढ़ती जा रही है। पार्टी का आम कार्यकर्ता बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार किए जाने से भी आहत और उपेक्षित महसूस कर रहा है। एक तरफ पुराने कांग्रेसियों की उपेक्षा और दूसरी ओर बाहर से आने वालों की बढ़ती धमक पार्टी के भीतर अविश्वास की नई दीवार बना रही है। पुराने कांग्रेसी एक स्वतंत्र संगठन ‘रिहाई मंच’ से आए लोगों को अल्पसंख्यक सेल का मुखिया और सोशल मीडिया में प्रमुख भूमिका दिए जाने से भी नाराज दिख रहे हैं। एक पुराने कांग्रेसी नेता गोपनीयता की शर्त पर कहते हैं कि अल्पसंख्यक सेल के नए मुखिया शाहनवाज हुसैन मुसलमानों का नेता बनने की इतनी हड़बड़ी में हैं कि वे समान विचारधारा वाले दल के नेताओं पर ही तीखे हमले बोलने लगे हैं। उनका इशारा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर पार्टी के तीखे हमलों को लेकर है।

पार्टी अध्यक्ष के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है पार्टी के नए विचार के साथ नए-पुराने सभी कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य बिठाना। दलित वोटरों को आकर्षित करने के लिए पार्टी की पहल से कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में असमंजस है। वे कह रहे हैं कि कांग्रेस ने हमेशा दलित समस्याओं और दलित चेतना से खुद को संबद्ध रखा है लेकिन कभी भी मनुस्मृति को गाली देने की जरूरत नहीं समझी। इसे कांग्रेस के मूल चरित्र को बदलने की कोशिश से जोड़ कर देखा जा रहा है। कांग्रेस ने कभी अगड़े- पिछड़े की राजनीति पर इस तरह से जोर नहीं दिया।

 

आरक्षण और दलित मुद्दों पर नया रुख

हालांकि चुनाव विश्लेषक और वर्डिक्ट रिसर्च के निदेशक ओपी यादव कहते हैं, “कांग्रेस ने यूपी में अपनी सियासी जमीन को वापस पाने के लिए रणनीति में बदलाव किया है। मंडल विरोधी रही कांग्रेस आज ‘जय भीम’ और ‘आरक्षण बचाओ’ जैसे नारों के साथ संबद्ध हो रही है। वह सामाजिक न्याय की अवधारणा से जुड़ी राजनीति के जरिए जमीन पर शुरुआती हलचल मचाने में कामयाब भी दिख रही है।” पार्टी ने पिछड़े समाज से प्रदेश अध्यक्ष चुनकर भी यही संदेश दिया है लेकिन यह देखना होगा कि अपेक्षाकृत कम आबादी वाली पिछड़ी जाति से जुड़े अजय कुमार लल्लू पिछड़ों के वृहद समाज में किस तरह अपना कनेक्शन पैदा कर पाते हैं। कांग्रेस दलित समाज को लेकर भी अधिक उत्सुकता और उत्साह के साथ काम करती हुई दिख रही है। लेकिन पार्टी की असली चुनौती यही है कि उसके तमाम फॉर्मूलों पर प्रदेश की दूसरी पार्टियां भी काम कर रही हैं। दलित समाज के लिए काम करने वाले भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ने भी सियासी पार्टी बना ली है। पश्चिम के नौजवानों में उनका खासा प्रभाव है। दलित समाज से गहराई से जुड़े बसपा के कुछ पुराने नेताओं ने समाजवादी पार्टी की ओर रुख किया है। यादव कहते हैं कि कांग्रेस सभी दिशाओं में हाथ पांव मारने के बजाय अपने क्षेत्र में मजबूती से काम करने वाले छोटे दलों को साथ लेने की कोशिश करे तो वह अच्छे नतीजे दे सकती है। संगठन और नीतियों में कांग्रेस को सावधानी से सधे हुए प्रयास करने होंगे, तभी  वह कोई प्रभावी भूमिका बना सकेगी।

प्रियंका के नेतृत्व का बड़ा इम्तहान

बेशक प्रियंका गांधी ऐसा चेहरा है जो दूसरे दलों के शीर्ष नेताओं की बराबरी कर सकता है। लेकिन कांग्रेस को यह सियासी तीर बहुत ही संभल कर चलाना होगा। 2019 के चुनाव के कुछ समय पहले ही प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया गया। प्रियंका ने पूरी ताकत से चुनाव प्रचार की कमान भी संभाली। प्रियंका ने गंगा यात्रा के जरिए एक सियासी माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहे। अब 2022 उनका पहला बड़ा इम्तहान है।

 

अतीत के सबक, भविष्य की चुनौतियां

अतीत की तमाम कड़वी सच्चाइयों को पीछे छोड़कर मजबूती के साथ आगे बढ़ने की कांग्रेस की कोशिश के लिए अतीत पर नजर डालना भी जरूरी है। 2017 में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। चुनाव के बेहद करीब आने पर बड़े ही उत्साह के माहौल में राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने ‘यूपी को साथ पसंद है’ के नारे के साथ चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन जनता ने ‘यूपी के इन दोनों ही लड़कों’ को ठुकरा दिया। कांग्रेस को भूलना नहीं चाहिए कि 1996 में बसपा के साथ गठबंधन की भी उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय लोकदल का विलय कराकर पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा था। बसपा की 296 सीटों के मुकाबले 126 सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस को महज 33 सीटें मिलीं। इसके अलावा राष्ट्रीय लोकदल के साथ खटपट के बाद चौधरी अजीत सिंह ने भी किनारा कर लिया। इसके बाद 2002 के चुनावों में कांग्रेस को इसका खामियाजा उठाना पड़ा और उसकी आठ सीटें और घट गईं। 2017 में महज 114 सीटों पर चुनाव लड़ने की वजह से बाकी विधानसभा क्षेत्रों में उसका आधार बहुत कमजोर हो चुका है। इसलिए चुनौती काफी बड़ी है।

 

संगठन के सामने बड़ी चुनौती

75 जिलों और 403 सीटों वाले इस प्रदेश में विधानसभा स्तर पर संगठन को चाक चौबंद करना बड़ा काम है। केवल सात सीटों वाली कांग्रेस 2022 में क्या करिश्मा कर पाएगी, इस सवाल पर कांग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, “जब 47 सीटों वाली भाजपा मेहनत के बल पर 325 पहुंच गई तो हमें पूरा भरोसा है कि हमारी मेहनत और प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू का नेतृत्व दोनों मिलकर यूपी में कांग्रेस की तकदीर और तसवीर दोनों बदल देंगे। हम आगे चल रहे हैं। किसान यात्रा निकाल रहे हैं। समर्थन मूल्य की बात कर रहे हैं। ओलावृष्टि से किसानों के नुकसान पर आवाज उठा रहे हैं। कांग्रेस आज किसान के साथ भी खड़ी है और नौजवान और महिलाओं के साथ भी। हमें पूरा भरोसा है कि यूपी की जनता इस बार हमें ताकत देगी। सरकार बनाने का मौका देगी।”

 

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प्रियंका ने कोरोना से निपटने में सहयोग के लिए सीएम योगी को पेशकश करके कांग्रेस की सक्रियता का संकेत दिया है। वे 2022 के चुनाव के लिए अभी से तैयारी कर रहीं

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