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यूपीवुड के हसीन सपने

उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार की मुंबई के बॉलीवुड के टक्कर में नई मायानगरी बसाने की योजना की आर्थिक-राजनैतिक वजहें भी स्पष्ट
लखनऊ में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के साथ फिल्मोद्योग से जुड़े लोगों की बैठक

लखनऊ चलो अब रानी, बंबई का बिगड़ा पानी। 1951 की फिल्म संसार का गीता दत्त और जी.एम. दुर्रानी की आवाज में यह गीत जैसे आज मौजूं हो गया है। कोरोना महामारी के दौर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-21 में नई फिल्म सिटी बनाने के ऐलान के पीछे बेशक अपनी आर्थिक और राजनैतिक वजहें बदस्तूर हो सकती हैं। यह भी पुराने ख्वाबों की तरह कहीं ख्वाब ही न रह जाए, जैसा कि उस गीत में आगे यह भी है कि जान गई तेरी चतुराई। दरअसल इसके पहले 1986 में कांग्रेस सरकार के दौर में नोएडा के सेक्टर-16ए में बनी फिल्म सिटी अब नाम भर की रह गई है और मोटे तौर पर मीडिया सिटी बन गई है। फिर, 2015 में समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दो फिल्म सिटी, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे और ट्रांस गंगा सिटी प्रोजेक्ट, उन्नाव में तीन-तीन सौ एकड़ में बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन वह धरातल पर नहीं उतर पाई। बहरहाल, आदित्यनाथ सरकार ने बाकायदा फिल्मोद्योग के कई निर्माताओं-निर्देशकों से बैठक की और कई प्रोजेक्ट बनाए हैं।

योजना के मुताबिक, जनसंख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े सूबे के गौतमबुद्ध नगर जिले में यमुना एक्सप्रेस-वे से सटे ग्रेटर नोएडा सेक्टर-21 में 1,000 एकड़ में यह फिल्म सिटी बननी है। इसका विशेष आकर्षण जेवर में बन रहे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से नजदीकी भी हो सकती है, जो महज 6 किलोमीटर की दूरी पर है। घोषणाओं पर यकीन करें तो सिंगापुर की एक मीडिया कंपनी ने इस प्रोजेक्ट में करीब 73 करोड़ रुपये के शुरुआती निवेश की पेशकश की है। विस्टास मीडिया के संदीप सिंह ने एक फिल्म एकेडमी स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा है। 22 सितंबर को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपने लखनऊ आवास पर कई फिल्म डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, गीतकार, संगीतकार और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के साथ बैठक की। उसमें हाल ही में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आइसीसीआर) में सदस्य नियुक्त हुए विवेक अग्निहोत्री, अशोक पंडित, अनुपम खेर, उदित नारायण, सतीश कौशिक, मनोज मुंतशिर, मधुर भंडारकर और आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई वगैरह शामिल हुए।

राज्य के पर्यटन मंत्री नीलकंठ तिवारी आउटलुक से कहते हैं, “उद्योग से जुड़े लोग प्रोजेक्ट की प्रस्तुति से आकर्षित थे। सरकार राज्य में फिल्मों की शूटिंग पर पहले से सब्सिडी दे रही है।” फिल्म निर्माता अशोक पंडित कहते हैं कि इस बात की कई साल से जरूरत थी कि कोई विकल्प मिले ताकि इंडस्ट्री की नई पारी की शुरुआत हो।

आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई ने मुंबई में स्थापित फिल्मी दुनिया के समरूप फिल्म सिटी स्थापित करने की पेशकश की है। राज्य सरकार इस प्रोजेक्ट को रोजगार के अवसर से भी जोड़कर देख रही है। देसाई का कहना है कि उत्तर प्रदेश के 80 फीसदी से अधिक लोग मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में टेकनीशियन और अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं। इसलिए, राज्य में स्थापित हो रहे उद्योग में काम करने वालों की कमी नहीं होगी। गीतकार मनोज मुंतशिर ने कहा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हिंदी भाषी बेल्ट में स्थापित किया जाना महत्वपूर्ण फैसला है।

विवेक अग्निहोत्री ने आउटलुक से कहा, “इंडस्ट्री के लोगों का राज्य से पुराना लगाव है। चाहे बुंदेलखंड-झांसी, मथुरा, काशी हो या लखनऊ, गोरखपुर। प्रदेश में फिल्म सिटी की स्थापना होने से कई अवसर खुलेंगे। कला-संस्कृति से जुड़ी नई कहानियां निकल कर सामने आएंगी।”

कंप्लिट सिनेमा के एडिटर अतुल मोहन के मुताबिक 2019 में बॉलीवुड का कारोबार 4,350 करोड़ रुपये और 2018 में 3,300 करोड़ रुपये का हुआ। हालांकि बीते कुछ महीनों से सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले के बाद से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अस्थिरता-सी आन पड़ी है। फिलहाल, ड्रग्स मामले को लेकर पूरी इंडस्ट्री जांच एजेंसियों के रडार पर है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में फिल्म सिटी की स्थापना होने से मुंबई का एक विकल्प तैयार होगा। लेकिन, जैसा कि अतुल मोहन कहते हैं, “इससे पहले भी नोएडा में फिल्म सिटी बनाई गई और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने जमीनें बेहद सस्‍ती दरों पर खरीदकर मीडिया घरानों और कॉर्पोरेट सेक्टर को बेच दी। उम्मीद है कि ये गलती इस बार नहीं होगी।” नोएडा सेक्टर 16ए की फिल्म सीटी में आदित्य चोपड़ा, संदीप मारवाह, अनिल कपूर, सुभाष चंद्रा और गुलशन कुमार समेत फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने सस्ती दर पर जमीने खरीदी थीं।  

सूबे में फिल्म सिटी बनाने की पिछली योजनाएं कामयाब नहीं हो पाईं। शायद इसीलिए नई योजना के ऐलान के बाद अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, “अब सपा काल की फिल्म सिटी का श्रेय लेने के लिए प्रदेश की भाजपा सरकार कैंची लेकर फीता काटने के लिए खड़ी है।” इस पर पर्यटन मंत्री तिवारी कहते हैं, “कोई सिर्फ सपने देखता रहे तो इसमें हम क्या कह सकते हैं। वे बताएं कि योजना पर काम हुआ या जमीन का अधिग्रहण हुआ, तो वह कहां है?”

हालांकि, राज्य में भाजपा सरकार का कार्यकाल महज डेढ़ साल का ही बचा है लेकिन पर्यटन मंत्री को उम्मीद है कि 2021 तक इसे पूरा कर लिया जाएगा। राज्य में 2022 में चुनाव होने हैं। इसलिए जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया भी जल्द शुरू होगी। वैसे, अभी कैबिनेट मंजूरी और बजट वगैरह तय किया जाना है। फिल्म सिटी में एक विश्वस्तरीय फिल्म म्यूजियम, फिल्म विश्वविद्यालय बनाने का भी प्रस्ताव है, जिसमें निर्देशन, स्क्रिप्ट राइटिंग, सिनेमैटोग्राफी, साउंड रिकॉर्डिंग और एनीमेशन जैसे पाठ्यक्रम होंगे। यही नहीं, एक हजार एकड़ के इस प्रोजेक्ट में 220 एकड़ में कमर्शियल एक्टिविटी केंद्र की योजना भी है।

यह प्रस्तावित फिल्म सिटी आगरा से 100 किलोमीटर और मथुरा-वृंदावन से 60 किलोमीटर दूर है। बॉलीवुड की ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी मथुरा से सांसद हैं। उनका सपना मथुरा में फिल्म सिटी बनाने का था मगर वे कहती हैं कि नई योजना से मथुरा रोजगार के अवसर और अन्य फिल्मी सांस्कृतिक नजरिए से लाभान्वित हो सकता है। डॉ. तिवारी का मानना है कि फिल्म सिटी के निर्माण से राज्य में पर्यटन और संस्कृती का विकास होगा। कुछ इसी तरह की बातें विवेक अग्निहोत्री भी कहते हैं, “इन दिनों सिर्फ बॉलीवुड सेलिब्रेटी की चाल-ढाल और स्टाइल के बारे में चर्चा होती है। लेकिन, अब हमारी संस्कृति और सभ्यता के इर्द-गिर्द भी पर्दे पर बातें होंगी। बॉलीवुड का मतलब ग्लैमर, मस्ती और सेक्स हो गया है।”

विवेक अग्निहोत्री कहते हैं, “मुंबई से हिंदी फिल्माद्योग की सत्ता हटनी चाहिए। अब वहां का वातावरण इंडस्ट्री के लायक नहीं बचा है। अगर यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाता है, तो इंडस्ट्री के लोगों को एक नई राह मिलेगी।” उनका सवाल है कि जब हर भाषा की फिल्मों के लिए उन राज्यों में इंडस्ट्री हैं, तो हिंदी के लिए क्यों नहीं? मुंबई की अपनी भाषा है। वहां गांव से पहुंचे युवाओं में टैलेंट होने के बावजूद सौतेला व्यवहार किया जाता है। हालांकि अशोक पंडित कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि मुंबई इंडस्ट्री बंद हो जाएगी। हम लोग अन्य राज्यों में शूटिंग के लिए जाते ही रहे हैं। यूपी में भी स्टूडियो और सेट तैयार किए जा सकेंगे तो उद्योग से जुड़े लोगों को फायदा ही होगा। ख्वाब तो यकीनन शानदार है, यह जमीन पर उतरे तो कोई बात बने। वरना कहीं पहले की तरह यह भी सिर्फ जमीन हासिल करने का मामला बनकर न रह जाए।

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