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नजरियाः गरीब बढ़ रहे, आंकड़े सच नहीं

कोविड-19 के दौरान अनेक मध्यवर्गीय परिवार कंगाल हो गए, परिवारों की जीवन भर की बचत चली गई, इसलिए यह कहना गलत कि गरीबी कम हुई है
मुफ्त अनाज बंद हुआ तो गरीबों को खाने के लाले पड़ेंगे

इस बार महंगाई कुछ अलग है। थोक महंगाई एक साल से 10 फीसदी के ऊपर है। मुझे नहीं लगता कि इतनी महंगाई 20 साल में कभी रही। इसके कई कारण हैं। सप्लाई की समस्या विश्व स्तर पर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इन देशों से कई महत्वपूर्ण चीजों की सप्लाई बाधित हो गई, जिससे  कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी के दाम बढ़े हैं। रुपया कमजोर होने से भी आयात महंगा हो गया है। उर्वरक महंगे होने से कृषि क्षेत्र में उत्पादन की लागत बढ़ गई है। यूक्रेन और रूस से हम करीब 1.5 अरब डॉलर का सूरजमुखी तेल आयात करते थे, वह बाधित हुआ है। पाम ऑयल की भी कमी हो गई है क्योंकि इसके सबसे बड़े निर्यातक इंडोनेशिया में ही इसकी किल्लत हो गई है। इससे खाद्य तेलों के दाम आगे भी बढ़ने के आसार हैं। चीन में कोरोना की पाबंदी के चलते निर्यात प्रभावित हुआ जिससे पूरी दुनिया में चिप की कमी हो गई। महंगे चिप का असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ा है।

हमारे यहां असंगठित क्षेत्र को जो परेशानी हुई उससे संगठित क्षेत्र को बहुत फायदा हुआ। डिमांड संगठित क्षेत्र में शिफ्ट हो गई जिसने दाम बेतहाशा बढ़ाए हैं। कॉरपोरेट के पास ज्यादा प्राइसिंग पावर आ गई है। कंपनियां दाम बढ़ाकर ज्यादा मुनाफा कमा रही हैं।

आने वाले समय में स्थिति और बिगड़ेगी क्योंकि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से व्यापार प्रभावित होगा, सप्लाई की दिक्कतें और बढ़ेंगी। चीन, रूस का सीधा समर्थन कर रहा है तो उस पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है। चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब है। ऐसा हुआ तो सभी मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट के दाम बढ़ जाएंगे। इसलिए मुझे लगता है कि महंगाई अभी बढ़ी हुई रहेगी। रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है। लेकिन महंगाई मौद्रिक कारणों से नहीं, सप्लाई की दिक्कतों के कारण है। इसलिए रिजर्व बैंक के कर्ज महंगा करने से महंगाई कम नहीं होगी। अगर महंगाई ज्यादा मांग के कारण होती तब ब्याज दरें बढ़ाने का असर होता।

जहां तक गरीबी घटने की बात है तो आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक के नतीजे मैक्रो इकोनॉमी के आंकड़ों पर आधारित हैं। यहां आप व्यक्तिगत रूप से किसी से यह नहीं पूछते कि कमाई कितनी घटी या बढ़ी है। मैक्रो आंकड़ों के अनुसार अरबपतियों और कॉरपोरेट सेक्टर की आमदनी तेजी से बढ़ी है। इससे प्रति व्यक्ति आय तो बढ़ी हुई दिखेगी, लेकिन उस आमदनी का गरीब और अमीर के बीच वितरण कैसा है, वह पता नहीं चलेगा।

गरीबी में सर्वे के नतीजे ज्यादा बेहतर होते हैं। पिछले दिनों प्राइस के सर्वे के आंकड़े आए थे। उसमें पता चला कि 2015-16 से 2020-21 तक सबसे निचले 60 फीसदी लोगों की आमदनी घट गई। सबसे निचले 20 फीसदी लोगों की आमदनी तो 50 फीसदी गिर गई लेकिन सबसे ऊपर के 20 फीसदी लोगों की कमाई 39 फीसदी बढ़ गई। आमदनी घटने से एक बड़ा वर्ग गरीबी रेखा के आसपास पहुंच गया है।

दिल्ली में महामारी से पहले 2019 में एक सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण आया था। उसमें पता चला कि दिल्ली में 98 फीसदी परिवार प्रतिमाह 50 हजार रुपये से कम खर्च करते हैं। 90 फीसदी परिवार तो 25 हजार रुपये से भी कम खर्च करते हैं। दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय भारत के औसत का लगभग तीन गुना है। इस हिसाब से देखा जाए तो पूरे देश के स्तर पर 98 फीसदी परिवार महीने में 20 हजार से भी कम खर्च करते हैं और 90 फीसदी परिवारों का खर्च 10 हजार से भी कम हैं। अगर पांच लोगों का परिवार महीने में 10 हजार रुपये से भी कम खर्च करे तो इसका मतलब है वह गरीबी रेखा से नीचे है। ये सब आंकड़े बताते हैं कि गरीबी तो बहुत ज्यादा है।

गरीबी स्थान और समय के हिसाब से अलग होती है। सामाजिक न्यूनतम आवश्यक खपत स्थान और समय के हिसाब से बदलती रहती है। अगर आप लद्दाख में हैं, जहां भीषण ठंड पड़ती है, वहां आपके पास अच्छा खाने-रहने की सुविधा और लकड़ियां नहीं हैं तो आप जाड़े का एक भी मौसम नहीं झेल पाएंगे। दूसरी तरफ तमिलनाडु में कोई व्यक्ति एक छप्पर के घर में वेस्टी पहनकर रह सकता है। दोनों जगहों की जरूरतें अलग हैं, इसलिए गरीबी का स्तर और परिभाषा भी अलग है।

यह तर्क भी दिया जाता है कि रिक्शा वाले के पास मोबाइल फोन है, इसलिए वह गरीब नहीं है। उसे अपने परिवार के साथ संपर्क बनाए रखने के लिए फोन चाहिए। यह उसकी सामाजिक न्यूनतम आवश्यकता है। हमें यह देखना पड़ेगा कि व्यक्ति के पास खाने-पीने और बच्चों की शिक्षा का साधन है या नहीं, चिकित्सा सुविधाएं हैं या नहीं।

एक सर्वे में पता चला कि स्वास्थ्य और शिक्षा में निजीकरण बढ़ने से गरीब परिवारों का खर्च बढ़ गया। पर्यावरण क्षरण से सबसे ज्यादा प्रभावित तो गरीब ही होते हैं। उन्हें कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। अगर उनके परिवार में कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो पूरे परिवार की स्थिति बिगड़ जाती है।

हमने देखा कि कोविड-19 महामारी के दौरान अनेक मध्यवर्गीय परिवार कंगाल हो गए। परिवारों की जीवन भर की बचत चली गई। अनेक परिवारों ने अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी स्कूलों में डाला है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि गरीबी कम हुई है।

मुफ्त अनाज वितरण स्कीम से लोगों को मदद जरूर मिली, लेकिन इससे गरीबी दूर नहीं होती। बल्कि इससे यह पता चलता है कि आप इतने गरीब हैं कि आपको मुफ्त अनाज की जरूरत पड़ती है। कल अगर यह बंद हो जाए तो आपको खाने के लाले पड़ जाएंगे।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में मैल्कम आदिशेषैया चेयर प्रोफेसर हैं, लेख एस.के. सिंह से बातचीत पर आधारित)

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