प्रथम दृष्टि: जांबाजों का साल

गिरिधर झा
कोरोना से अभी अंतिम लड़ाई बाकी
कोरोना से अभी अंतिम लड़ाई बाकी

गिरिधर झा
बीता वर्ष काले, भयावह वर्ष के रूप में याद किया जायेगा, वहीं इसे इतिहास में ऐसे कालखंड के रूप में भी देखा जायेगा जब संपूर्ण मानवता इसका मुकाबला करने के लिए एक साथ उठकर खड़ी हुई

कोई भी जंग तब तक नहीं जीती जा सकती, जब तक शत्रुओं के आखिरी किले पर फतह न किया जाए, चाहे उसे कितना भी अभेद्य बनाया गया हो। मैदान-ए-जंग में यही वह मुश्किल चुनौती है, जो जीत और हार के फैसले निर्धारित करती है। दुनिया भर में कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई भी अब अंतिम मुकाम पर है। अमेरिका और इंग्लैंड सहित कई देशों में आम जनता के लिए बचाव के टीके उपलब्ध हो गए हैं और भारत में भी इसका क्लिनिकल ट्रायल अंतिम चरण में है। अभी तक इनके परिणाम संतोषजनक रहे हैं और सब कुछ ठीक रहा तो उम्मीद है, जल्द वैक्सीन सबके लिए उपलब्ध हो जाएगा। नए वर्ष में इससे बेहतर खबर और क्या हो सकती है? यह साल, जिसके जाने में चंद रोज ही शेष हैं, दुख और दर्द देने वाला रहा। पिछले नौ महीनों में हजारों लोग इस वायरस रूपी अदृश्य दुश्मन के हाथों काल के गाल में असमय समा गए, जिनमें विभिन्न क्षेत्रों की ऐसी अनेक अजीम शख्सियतें शामिल हैं, जिनकी कमी हमें वर्षों तक सालती रहेगी। लेकिन क्या खास और क्या आम, कोविड-19 ने किसी को नहीं बख्‍शा। राष्ट्राध्यक्षों से लेकर रेहड़ी वाले तक सभी इसके किसी न किसी रूप में शिकार हुए। इससे बचने के तमाम उपाय किये गए, महीनों तक देशव्यापी बंदी भी की गई, लेकिन इस वायरस के संक्रमण ने गतिशील और प्रगतिशील विश्व को इस साल अपनी रफ्तार कम करने पर मजबूर कर दिया।

लेकिन इस त्रासदी का एक दूसरा पहलू भी है। एक ओर जहां 2020 को काले, भयावह वर्ष के रूप में याद किया जायेगा, वहीं इसे इतिहास में ऐसे कालखंड के रूप में भी देखा जायेगा जब संपूर्ण मानवता इसका मुकाबला करने के लिए एक साथ उठकर खड़ी हुई। अगर इस महामारी के प्रकोप को अंधेरी सुरंग के रूप में देखा जायेगा, जिसकी दूसरी छोर पर दूर-दूर तक कोई रोशनी लंबे समय तक नजर नहीं आ रही थी, तो यह उन महामानवों के लिए भी स्मरणीय रहेगा जो ऐसे समय में उम्मीद की मशाल जलाये दूसरों की मदद को आगे आये। संक्रमण के खतरे को दरकिनार कर, किसी सरकार या स्वयंसेवी संस्थान के इंतजाम का इंतजार किये बगैर, हजारों लोग ने दूसरों को बचाने में अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। चाहे कोरोना योद्धाओं के लिए अस्पतालों में पीपीई किट की व्यवस्था करनी हो, प्रवासी मजदूरों को लॉकडाउन के दौरान घर भेजना हो या इलाज के लिए निःशुल्क ऑक्सीजन सिलिंडर और प्लाज्मा का इंतजाम करना हो, उनके बुलंद हौसलों ने उनके कदम को तनिक भी डिगने न दिया। इसमें बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद या फिल्म निर्माता मनीष मुद्रा जैसी हस्तियां ही नहीं थीं, इनमें ज्यादातर तो वैसे अनाम, गुमनाम लोग थे जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से इस घोर संकट के दौरान मानवता की सेवा की। यह साल ऐसे लोगों के नाम लिखा जायेगा।

इनके अलावा, यह वर्ष दुनिया भर के चिकित्सकों, अन्य स्वास्थ्यकर्मियों और जल्दी से जल्दी कोविड-19 से बचाव के लिए टीके उपलब्ध कराने में जुटे तमाम संक्रामक रोग विशेषज्ञ, शोधकर्ता, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल कंपनियां, सरकारें और गैर-सरकारी संस्थाओं के नाम भी रहेगा। साल के खत्म होते-होते दुनिया भर में एक से अधिक प्रभावी वैक्सीन का उपलब्ध हो जाना अपने आप में ऐसी उपलब्धि होगी, जिसके लिए नोबेल प्राइज नाकाफी होगा। 2021 का आगाज हम उम्मीद से कर सकते हैं कि अब टीके की बदौलत कोरोना को इस जंग में शिकस्त दी जा सकती है। लेकिन, टीकाकरण के बाद भी तब तक सावधानियां बरतने की जरूरत है जब तक कोरोनावायरस को निष्प्रभावी न बना दिया जाए।

अभी अंतिम लड़ाई के लिए कमर कसे रखने की आवश्यकता है। ब्रिटेन में आम लोगों के लिए वैक्सीन उपलब्ध होने के महज कुछ दिन बाद ही कोरोनावायरस के एक नए रूप में आने की खबर आई है, जिसे पहले से सत्तर प्रतिशत ज्यादा संक्रामक समझा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के वायरस के गुण और लक्षण बदलते रहते हैं और उनमें कुछ और खतरनाक होकर उभरने की क्षमता रखते हैं। ब्रिटेन और भारत सहित कई देशों ने इस नए अदृश्य दुश्मन से टक्कर लेने के लिए एहतियातन कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। जानकारों का मानना है कि इस नए वायरस के कारण टीके तैयार करने के अंतिम चरण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल असर नहीं होगा। यह सुकून देने वाली खबर है, लेकिन यह हमें बताने के लिए काफी है कि खतरा टला नहीं है, और न ही हमारा दुश्मन कमजोर हुआ है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलोजी के सहयोग से भारत बॉयोटेक का स्वदेशी को-वैक्सिन टीका जल्द ही उपलब्ध हो सकता है। इसके तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल एम्स, दिल्ली सहित देश के विभिन्न केंद्रों में चल रहे हैं, ताकि टीकाकरण के पूर्व यह आश्वस्त कर लिया जाए कि यह लोगों के लिए कितना प्रभावी और सुरक्षित है। दुश्मन कितना भी शक्तिशाली हो, उसके खात्मे से पहले खुद का बचाव करना ही निर्णायक जंग का पहला उसूल होता है। नए वर्ष में हमारे लिए यही नया संदेश होगा।

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